One Nation One Election: JPC बैठक में पी. चिदंबरम ने उठाए संवैधानिक सवाल, 2029 से लागू करने के रोडमैप पर सत्ता-विपक्ष आमने-सामने

पी. चिदंबरम ने संघवाद पर सवाल उठाए, 2029 से लागू करने की योजना पर बढ़ी सियासी बहस

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One Nation One Election: देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के उद्देश्य से लाए जा रहे ‘एक देश, एक चुनाव’ (Simultaneous Elections) विधेयक पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की महत्वपूर्ण बैठक में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार वैचारिक व संवैधानिक टकराव देखने को मिला। पूर्व केंद्रीय वित्त व गृह मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने समिति के समक्ष पेश होकर इस प्रस्तावित कानून का कड़ा विरोध किया और इसे असंवैधानिक, मनमाना तथा भारतीय संसदीय लोकतंत्र के मूल ढांचे पर सीधा प्रहार करार दिया।

भाजपा सांसद पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली इस संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष पेश होकर चिदंबरम ने संविधान के अनुच्छेदों का हवाला देते हुए दलील दी कि जनता द्वारा पांच वर्षों के लिए चुनी गई राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को बीच में समाप्त करना या कृत्रिम रूप से बढ़ाना जनादेश का खुला अपमान होगा। वहीं दूसरी ओर समिति के समक्ष अपने विचार रखने वाले विभिन्न कानूनी विशेषज्ञों, नीति विश्लेषकों और पद्म पुरस्कार से सम्मानित प्रबुद्ध नागरिकों ने इसे राष्ट्रीय हित में उठाया जाने वाला ऐतिहासिक प्रशासनिक सुधार बताते हुए वर्ष 2029 के आम चुनावों से लागू करने की जोरदार वकालत की। इस बैठक के बाद राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ चुनाव कराने की समय-सीमा और उसकी संवैधानिक वैधता को लेकर सियासी बहस नए सिरे से गरमा गई है।

पी चिदंबरम की तीखी आपत्तियां: ‘संविधान के मूल ढांचे और संघीय व्यवस्था का उल्लंघन’

जेपीसी की बैठक में आमंत्रित किए गए पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने समिति के सदस्यों के समक्ष अपने विस्तृत कानूनी और संवैधानिक तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा कि उनका अंतःकरण और संवैधानिक समझ इस विधेयक का समर्थन करने की अनुमति नहीं देती है। चिदंबरम ने कहा कि भारत का संविधान राज्यों का एक संघ (Union of States) है और यहां प्रत्येक राज्य की विधानसभा का अपना स्वतंत्र संवैधानिक अस्तित्व और पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल होता है।

उन्होंने सवाल उठाया कि केवल एक निश्चित तारीख पर पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने की जिद में किसी राज्य सरकार का कार्यकाल एक या दो साल पहले कैसे भंग किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था सीधे तौर पर संविधान के संघात्मक ढांचे (Federal Structure) को चोट पहुंचाती है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में संविधान का अहस्तांतरणीय ‘मूल ढांचा’ घोषित किया है। चिदंबरम के अनुसार, यदि संसद साधारण या विशेष बहुमत से भी राज्यों के अधिकारों को सीमित करती है, तो यह कानून न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर टिक नहीं पाएगा।

त्रिशंकु संसद और मध्यावधि संकट पर सवाल: 2029 में बहुमत न मिलने पर क्या होगा

वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने एक साथ चुनाव की व्यावहारिकता पर अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी सवाल खड़ा किया। उन्होंने पूछा कि मान लिया जाए कि वर्ष 2029 में पूरे देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ सफलतापूर्वक संपन्न करा लिए जाते हैं, लेकिन केंद्र में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता और त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति बनती है, तो उस परिस्थिति में क्या किया जाएगा।

चिदंबरम ने आगे तर्क दिया कि यदि केंद्र में बनी अल्पमत या गठबंधन सरकार अविश्वास प्रस्ताव के कारण दो या तीन वर्षों के भीतर गिर जाती है, तो क्या पूरे देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं को भी समय से पहले भंग कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार यदि किसी एक राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के चलते सरकार गिरती है, तो क्या वहां शेष कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति शासन थोप दिया जाएगा या फिर वहां की जनता को अगले राष्ट्रीय चुनाव चक्र तक अपनी चुनी हुई सरकार से वंचित रखा जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत जैसी बहुदलीय और विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था में कृत्रिम राजनीतिक स्थिरता थोपना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

समर्थकों का राष्ट्रीय हित और आर्थिक बचत का तर्क: विकास कार्यों में बार-बार आचार संहिता की बाधा

जेपीसी की बैठक के दौरान नई दिल्ली के कई प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों और पद्म पुरस्कार विजेताओं ने भी अपने विचार समिति के पटल पर रखे। इनमें पूर्व राज्यसभा सांसद तरलोचन सिंह, प्रख्यात वैज्ञानिक नवीन खन्ना, इतिहासकार मीनाक्षी जैन और सामाजिक कार्यकर्ता नीरू कुमार शामिल रहे। इन सभी प्रबुद्ध नागरिकों ने एक साथ चुनाव कराने के विचार का पुरजोर समर्थन किया और इसे देश के आर्थिक व प्रशासनिक विकास के लिए अनिवार्य बताया।

समर्थक पक्ष की मुख्य दलील यह रही कि भारत में हर वर्ष किसी न किसी राज्य में विधानसभा या स्थानीय निकायों के चुनाव होते रहते हैं। बार-बार चुनाव होने के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में महीनों तक आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू रहती है, जिससे विकास योजनाएं, कल्याणकारी नीतियां और नई बुनियादी ढांचा परियोजनाएं पूरी तरह ठप हो जाती हैं। इसके अलावा पुलिस बल, केंद्रीय अर्धसैनिक बल और प्रशासनिक मशीनरी लगातार चुनाव ड्यूटी में उलझी रहती है, जिससे कानून-व्यवस्था और शासन की नियमित कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। एक साथ चुनाव कराने से सरकारी खजाने के हजारों करोड़ रुपये की बचत होगी और मतदाता भी बार-बार की चुनावी प्रक्रिया से मुक्त होकर एक ही बार में अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे।

2029 से लागू करने का संभावित रोडमैप: राज्यों के कार्यकाल का जटिल समायोजन

संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने बैठक के उपरांत संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि समिति का प्राथमिक दायित्व सभी पक्षों, राजनीतिक दलों, संविधानविदों और जनता की राय को संकलित करके एक संतुलित और समग्र रिपोर्ट तैयार करना है। इसे किस वर्ष से लागू किया जाएगा, इसका अंतिम नीतिगत निर्णय संसद और केंद्र सरकार को लेना है। हालांकि राजनीतिक और नीतिगत गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि सरकार इसे वर्ष 2029 के 19वें लोकसभा चुनाव से पूरे देश में एक साथ लागू करने की तैयारी में है।

यदि 2029 के आम चुनावों से एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था लागू की जाती है, तो इसके लिए एक बेहद जटिल ट्रांजीशन फॉर्मूला तैयार करना होगा। वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश जैसी बड़ी विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। वहीं वर्ष 2028 में कर्नाटक, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रस्तावित हैं। यदि इन सभी राज्यों को 2029 के चुनावी चक्र में शामिल करना है, तो वर्ष 2027 और 2028 में चुनी जाने वाली सरकारों के कार्यकाल को संविधान में विशेष संशोधन करके क्रमशः दो वर्ष और एक वर्ष के लिए सीमित करना होगा, अथवा 2029 तक के लिए कोई अंतरिम व्यवस्था बनानी होगी। यह प्रक्रिया राजनीतिक और संवैधानिक दोनों दृष्टिकोणों से अत्यधिक संवेदनशील और विवादास्पद मानी जा रही है।

विपक्षी दलों की आपत्तियां: चुनाव आयोग के अधिकार और चुनावी खर्च की जमीनी हकीकत

संसदीय समिति में कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी वाड्रा, मनीष तिवारी, रणदीप सिंह सुरजेवाला और मुकुल वासनिक जैसे वरिष्ठ सांसद प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इन नेताओं ने चिदंबरम के तर्कों का समर्थन करते हुए कहा कि स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दों के नीचे दबाने की यह एक सुनियोजित कोशिश है। तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने भी इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि इस व्यवस्था को संचालित करने के लिए निर्वाचन आयोग को असीमित विवेकाधीन अधिकार मिल जाएंगे, जो किसी भी स्वतंत्र लोकतांत्रिक संस्था के लिए उचित नहीं है।

चिदंबरम ने चुनावी खर्च के तर्क को भी खारिज करते हुए कहा कि सरकार जिस सरकारी खर्च की बात करती है, वह चुनाव आयोग द्वारा बूथ प्रबंधन और सुरक्षा पर खर्च किया जाने वाला मामूली हिस्सा है। उन्होंने कहा कि चुनाव में असली और बेहिसाब खर्च राजनीतिक दलों और व्यक्तिगत उम्मीदवारों द्वारा किया जाता है, जो चुनाव आयोग द्वारा तय की गई आधिकारिक खर्च सीमा से कई गुना अधिक होता है। सरकार को वास्तव में काले धन के उपयोग और चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने पर कड़े नियम बनाने चाहिए, न कि पूरे देश के लोकतांत्रिक चक्र को बाधित करना चाहिए।

One Nation One Election: देशव्यापी दौरों में राज्यों का रुख और आगे की विधायी राह

संयुक्त संसदीय समिति ने इस महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक आम सहमति बनाने के उद्देश्य से देश के विभिन्न राज्यों का दौरा किया है। समिति ने अब तक महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और गोवा के विभिन्न हितधारकों, बार काउंसिलों और नागरिक संगठनों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित किया है। इन दौरों के दौरान विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों ने इसे गैर-लोकतांत्रिक बताते हुए खारिज किया है, जबकि एनडीए शासित राज्यों ने इसके पक्ष में अपनी सहमति दर्ज कराई है।

इस महत्वाकांक्षी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए केंद्र सरकार को संसद के दोनों सदनों में उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई विशेष बहुमत (Two-Thirds Majority) की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त संविधान के संघीय ढांचे से जुड़ा विषय होने के कारण देश के कम से कम 50 प्रतिशत राज्यों की विधानसभाओं से भी इस संशोधन की पुष्टि (Ratification) कराना अनिवार्य होगा। वर्तमान राजनीतिक अंकगणित में बिना विपक्षी दलों और क्षेत्रीय क्षत्रपों के समर्थन के इस विधेयक को कानूनी जामा पहनाना सरकार के लिए एक बड़ी विधायी चुनौती साबित होने वाला है।

One Nation One Election: भारतीय लोकतंत्र और संघवाद की दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़

‘एक देश, एक चुनाव’ का यह प्रस्ताव केवल एक प्रशासनिक या चुनावी सुधार भर नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढांचे, विविधता और संविधान की मूल भावना से जुड़ा एक ऐतिहासिक प्रश्न बन चुका है। एक तरफ जहां प्रशासनिक गति, वित्तीय बचत और विकास की निरंतरता का राष्ट्रीय तर्क है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों की स्वायत्तता, जन-जवाबदेही और क्षेत्रीय अस्मिता की सुरक्षा का लोकतांत्रिक पक्ष खड़ा है।

जेपीसी की आने वाली अंतिम रिपोर्ट और संसद में होने वाली विस्तृत बहस यह तय करेगी कि क्या 2029 में भारत अपनी संपूर्ण चुनावी प्रणाली को एक साझा चक्र में बांधने में सफल होता है, अथवा यह विषय दीर्घकालिक आम सहमति के अभाव में भविष्य के विमर्श का हिस्सा बना रहता है। आने वाले महीनों में इस मुद्दे पर होने वाली राजनीतिक हलचल भारतीय राजनीति और संविधान की दिशा को गहराई से प्रभावित करने वाली साबित होगी।

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