Supreme Court: रेप पीड़िता को बार-बार कोर्ट बुलाना सही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपुरा हाईकोर्ट का फैसला पलटा, कहा- इससे मानसिक पीड़ा बढ़ती है

Supreme Court: रेप पीड़िताओं पर SC का बड़ा फैसला

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Supreme Court: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों और विशेष रूप से दुष्कर्म पीड़िताओं के कानूनी अधिकारों को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी दुष्कर्म पीड़िता को मुकदमे की सुनवाई (Trial) के दौरान बार-बार अदालत में पेश होने और जिरह (Cross-Examination) का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने नई दिल्ली में सुनवाई करते हुए त्रिपुरा उच्च न्यायालय (Tripura High Court) के उस पुराने आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की मांग पर पीड़िता को जिरह के 4 साल बाद दोबारा गवाही के लिए बुलाने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने माना कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़ितों को बार-बार कटघरे में खड़ा करना उन पर अनुचित मानसिक और भावनात्मक बोझ डालता है, जो न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

Supreme Court: क्या है पूरा मामला? क्यों सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा

यह पूरा कानूनी विवाद त्रिपुरा से शुरू हुआ था, जहां एक दुष्कर्म मामले के आरोपी ने कानूनी दांव-पेंच का फायदा उठाने की कोशिश की थी। मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता पहले ही चार अलग-अलग मौकों पर निचली अदालत के सामने अपनी गवाही दे चुकी थी और आरोपी के वकीलों की तीखी जिरह का सामना कर चुकी थी।

इतना ही नहीं, पुलिस जांच के दौरान और बाद में मजिस्ट्रेट के सामने भी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत उसके बयान दर्ज किए जा चुके थे। लेकिन पीड़िता की जिरह पूरी होने के पूरे चार साल बीत जाने के बाद, आरोपी ने अचानक कोर्ट में एक अर्जी दाखिल कर दी। इस अर्जी में मांग की गई कि कुछ नए बिंदुओं पर जिरह करने के लिए पीड़िता को दोबारा अदालत में समन भेजकर बुलाया जाए।

त्रिपुरा हाईकोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट की कड़ी आपत्ति

जब यह मामला त्रिपुरा हाईकोर्ट के पास पहुंचा, तो उच्च न्यायालय ने आरोपी की याचिका को स्वीकार कर लिया और सीआरपीसी की धारा 311 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए पीड़िता को दोबारा कोर्ट में हाजिर होने का आदेश जारी कर दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश से पीड़िता की मुश्किलें और मानसिक तनाव दोबारा बढ़ गया था।

त्रिपुरा सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि इतने लंबे समय (चार साल) के विलंब के बाद पीड़िता को दोबारा कोर्ट रूम के तनावपूर्ण माहौल में बुलाने का कोई ठोस या पर्याप्त आधार मौजूद नहीं है।

“इतनी पीड़ा के बाद बार-बार कोर्ट बुलाना अनुचित” – सुप्रीम कोर्ट

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अपने फैसले में पीड़ितों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखा। कोर्ट ने कहा कि एक महिला जो पहले से ही एक जघन्य अपराध का शिकार हुई है, उसे न्याय पाने के लिए बार-बार अपनी उस भयानक आपबीती को दोहराने के लिए मजबूर करना एक तरह का प्रशासनिक उत्पीड़न है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “गवाहों और खासकर दुष्कर्म जैसे जघन्य और बेहद संवेदनशील अपराधों के पीड़ितों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे बार-बार अदालत के चक्कर काटते रहें। अगर पीड़ितों को सालों बाद दोबारा उसी तीखी जिरह का सामना करने के लिए बुलाया जाएगा, तो यह उन पर एक असहनीय और अनुचित बोझ डालेगा, जिससे उन्हें भारी मानसिक और सामाजिक कठिनाई होगी।”

क्या कहती है सीआरपीसी की धारा 311 (Section 311 of CrPC)?

इस पूरे मामले में जिस कानूनी प्रावधान यानी ‘सीआरपीसी की धारा 311’ का जिक्र हुआ है, उसे भी समझना बेहद जरूरी है। भारतीय कानून के तहत इस धारा के पास अदालतों को एक विशेष शक्ति दी गई है। इसके अनुसार, कोई भी न्यायालय किसी भी जांच, मुकदमे या कानूनी कार्यवाही के किसी भी चरण में, किसी भी गवाह को समन भेजकर बुला सकता है।

भले ही उस व्यक्ति को पहले गवाह के रूप में न बुलाया गया हो, या उसकी गवाही पहले ही पूरी हो चुकी हो, कोर्ट मामले के ‘न्यायसंगत निर्णय’ के लिए उसे दोबारा बुलाकर पूछताछ कर सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से यह साफ कर दिया है कि इस धारा का इस्तेमाल आरोपी की सहूलियत या ट्रायल को लंबा खींचने के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर जब मामला किसी संवेदनशील पीड़िता से जुड़ा हो।

Supreme Court: इस फैसले का देश के कानूनी सिस्टम पर क्या असर होगा?

सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रुख देश की तमाम निचली अदालतों और हाईकोर्ट्स के लिए एक नजीर की तरह काम करेगा। अक्सर देखा जाता है कि रसूखदार आरोपी और उनके वकील कानूनी खामियों का फायदा उठाकर गवाहों और पीड़िताओं को परेशान करने के लिए तरह-तरह की याचिकाएं लगाते हैं ताकि वे थक-हारकर मामला छोड़ दें या समझौता कर लें।

इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब अदालतों के लिए किसी भी यौन उत्पीड़न या दुष्कर्म पीड़िता को दोबारा गवाही के लिए समन जारी करना आसान नहीं होगा। इससे न केवल मुकदमों की सुनवाई तेज गति से पूरी हो सकेगी, बल्कि पीड़ितों का देश की न्याय प्रणाली पर भरोसा भी मजबूत होगा।

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