Global weight loss study 2026: वजन की टेंशन खत्म, क्या अब वाकई दुबले होने लगे हैं लोग? ग्लोबल स्टडी में सामने आया चौंकाने वाला बदलाव

Global weight loss study 2026: मोटापे पर ग्लोबल स्टडी, क्या अब दुबले हो रहे हैं लोग?

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Global weight loss study 2026: पिछले कई दशकों से मोटापा पूरी दुनिया के लिए एक लाइलाज महामारी की तरह बना हुआ था। हर साल आंकड़े बढ़ते जा रहे थे और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे लेकर बेहद चिंतित थे। लेकिन अब साल 2026 की एक नई और विस्तृत ग्लोबल स्टडी ने दुनिया को बड़ी राहत दी है। इस ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कई विकसित और अमीर देशों में मोटापे की बढ़ती दर न केवल स्थिर हो गई है, बल्कि कुछ स्थानों पर तो इसमें गिरावट के स्पष्ट संकेत भी मिलने लगे हैं। ‘नेचर’ जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि अब लोग वजन घटाने के प्रति जागरूक हो रहे हैं और सरकारी नीतियों का असर भी जमीन पर दिखने लगा है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर दुनिया में यह बड़ा बदलाव कैसे आ रहा है और किन देशों ने इस जंग में बाजी मारी है।

Global weight loss study 2026: 23 करोड़ लोगों के डेटा से हुआ बड़ा खुलासा

इस ऐतिहासिक रिसर्च को इंपीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने अंजाम दिया है। इस अध्ययन की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें साल 1980 से लेकर 2024 तक के करीब 45 सालों के डेटा का गहन विश्लेषण किया गया है। वैज्ञानिकों की टीम ने लगभग 4050 जनसंख्या आधारित अध्ययनों को खंगाला, जिसमें दुनिया भर के 23.2  करोड़ लोगों की सेहत का रिकॉर्ड शामिल था। रिपोर्ट के निष्कर्षों ने स्वास्थ्य जगत को चौंका दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साढ़े चार दशकों में लगभग हर देश में मोटापे की समस्या बढ़ी थी, लेकिन अब हाई-इनकम यानी उच्च आय वाले देशों में यह खतरनाक ट्रेंड बदलता नजर आ रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि मोटापे को रोकना अब ‘असंभव’ नहीं रह गया है।

अमीर देशों में थम गई मोटापे की रफ्तार

स्टडी के अनुसार, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में, जो कभी मोटापे के सबसे बड़े गढ़ माने जाते थे, अब वहां इसकी रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2024 में अमेरिका में मोटापे की दर 40 से 43 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई है, जबकि ब्रिटेन में यह 27  से 30 प्रतिशत के आसपास है। भले ही ये आंकड़े अभी भी ऊंचे दिख रहे हों, लेकिन पिछले वर्षों की तुलना में इनकी बढ़त की गति अब लगभग रुक सी गई है। सबसे सुखद परिणाम फ्रांस जैसे देशों से आए हैं, जहां अब केवल 11-12
प्रतिशत वयस्क ही मोटापे की श्रेणी में आते हैं। जर्मनी में भी यह आंकड़ा 20-23 प्रतिशत पर आकर ठहर गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों में हेल्दी लाइफस्टाइल और खान-पान को लेकर आई जागरूकता ने इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई है।

एक्सपर्ट की राय: देश एक जैसे पर नतीजे अलग

इंपीरियल कॉलेज लंदन में ग्लोबल एनवायरमेंट हेल्थ के प्रोफेसर और इस स्टडी के प्रमुख लेखक माजिद एज्जती ने इस विविधता पर गहरा प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि यह देखना बहुत महत्वपूर्ण है कि समान आर्थिक और तकनीकी स्थिति वाले देशों में भी मोटापे के आंकड़े अलग-अलग हैं। इसका मतलब यह है कि सिर्फ पैसा या तकनीक ही मोटापे का कारण नहीं है, बल्कि उस देश की विशिष्ट नीतियां और पर्यावरण भी मायने रखते हैं। प्रोफेसर एज्जती के अनुसार, रिसर्च यह साबित करती है कि मोटापे के पीछे सिर्फ व्यक्तिगत खान-पान ही जिम्मेदार नहीं होता, बल्कि उस देश की आर्थिक स्थिति, स्वस्थ भोजन की आसान उपलब्धता और सरकार द्वारा उठाए गए कदम भी समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

बच्चों की सेहत में दिखा सबसे पहले सुधार

इस स्टडी की एक और बेहद दिलचस्प और सकारात्मक बात यह है कि वयस्कों की तुलना में बच्चों के मोटापे की दर में सुधार बहुत पहले ही शुरू हो गया था। विकसित देशों में बच्चों के बीच मोटापे की बढ़ती दर 2000 के दशक के मध्य तक ही स्थिर होनी शुरू हो गई थी। डेनमार्क जैसे देशों ने तो 1990 के दशक में ही इस दिशा में बड़ी सफलता हासिल कर ली थी। बच्चों के मामले में जापान ने दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की है। जापान में बच्चों में मोटापे की दर सबसे कम, मात्र ३ से ७ प्रतिशत के बीच है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बचपन में ही वजन पर नियंत्रण पा लिया जाए, तो आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ भविष्य दिया जा सकता है और वयस्क आबादी की सेहत में भी स्वतः ही सुधार होने लगेगा।

Global weight loss study 2026: गरीब और मध्यम आय वाले देशों के लिए बढ़ी चुनौती

जहां एक तरफ अमीर और विकसित देशों में हालात सुधर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह स्टडी मिडिल और लो-इनकम वाले देशों के लिए एक चेतावनी भी लेकर आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों में अभी भी मोटापे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इन देशों में प्रोसेस्ड फूड और जंक फूड की बढ़ती पहुंच, शारीरिक श्रम की कमी और जागरूकता के अभाव के कारण मोटापा एक बड़ा संकट बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमीर देशों ने जिस तरह से अपनी नीतियों में बदलाव किया है, वैसा ही मॉडल अब विकासशील देशों को भी अपनाना होगा ताकि वे इस आने वाली बड़ी स्वास्थ्य चुनौती से खुद को बचा सकें।

Global weight loss study 2026: आखिर कैसे संभव हुआ यह बड़ा बदलाव?

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सकारात्मक बदलाव रातों-रात नहीं आया है। इसके पीछे कई सालों की मेहनत और सही नीतियों का हाथ है। स्कूल लेवल पर जंक फूड पर पाबंदी, मीठे पेय पदार्थों पर शुगर टैक्स का लगाया जाना, शहरों में पैदल चलने और साइकिलिंग के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार करना और खाद्य उत्पादों पर स्पष्ट लेबलिंग जैसी सरकारी पहलों ने लोगों की आदतों को बदला है। साथ ही, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में लोग अब अपनी फिटनेस और डाइट को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग हुए हैं। अब लोग न केवल वजन कम करने के लिए बल्कि एक लंबी और स्वस्थ जिंदगी जीने के लिए एक्सरसाइज और पौष्टिक आहार को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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