Shri Devkinandan Thakur Ji: पीरियड्स में मंदिर जाना चाहिए या नहीं? मशहूर कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने दिया शास्त्रों और सेहत से जुड़ा ये बड़ा जवाब

Shri Devkinandan Thakur Ji: पीरियड्स में मंदिर जाना चाहिए या नहीं?

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Shri Devkinandan Thakur Ji: हिंदू धर्म और भारतीय समाज में मासिक धर्म यानी पीरियड्स (Periods) को लेकर सदियों से अनेकों परंपराएं, नियम और धार्मिक मान्यताएं चली आ रही हैं। अक्सर महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है कि इन दिनों में पूजा-पाठ करना या मंदिर जाना सही है या गलत? इसी कशमकश को दूर करने के लिए देश के मशहूर और लोकप्रिय कथावाचक श्रद्धेय देवकीनंदन ठाकुर जी (Shri Devkinandan Thakur Ji) ने इस विषय पर खुलकर बात की है और शास्त्रों के साथ-साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण से इसका सही जवाब दिया है। देवकीनंदन ठाकुर जी के अनुसार, सनातन धर्म की परंपराओं के मुताबिक मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर जाने, मूर्तियों को स्पर्श करने और प्रत्यक्ष पूजा-पाठ करने से बचना चाहिए। हालांकि, उन्होंने इन नियमों को किसी अंधविश्वास या हीन भावना से जोड़ने के बजाय इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक, शारीरिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों को समझने पर जोर दिया है, ताकि आज की आधुनिक पीढ़ी इन परंपराओं को नकारात्मक नजरिए से न देखकर एक सही और सकारात्मक दृष्टिकोण से समझ सके।

Shri Devkinandan Thakur Ji: पीरियड्स के पारंपरिक नियमों के पीछे क्या है असली वजह?

आज के बदलते दौर में भले ही कुछ लोग पीरियड्स के दौरान बनाए गए नियमों को रूढ़िवादिता का नाम देते हों, लेकिन प्राचीन समय में ऋषियों-मुनियों ने इन नियमों को महिलाओं की सेहत की सुरक्षा के लिए बेहद वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया था। पहले के समय में मासिक धर्म के ये कड़े नियम इसलिए बनाए गए थे ताकि महिलाओं को उन 3 से 4 दिनों में घरेलू जिम्मेदारियों से पूरी तरह आराम (Rest) मिल सके।

हम सभी जानते हैं कि पीरियड्स के दिनों में महिलाओं का शरीर हार्मोनल बदलावों के कारण काफी कमजोर और थका हुआ महसूस करता है। पुराने जमाने में संयुक्त परिवारों में घर की जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा होती थीं। सुबह तड़के कुएं से पानी भरने, भारी बर्तन मांजने से लेकर रात तक महिलाएं लगातार शारीरिक श्रम करती रहती थीं। ऐसे में महिलाओं को इस शारीरिक कष्ट के समय जबरन आराम देने के लिए इन नियमों को धार्मिक शुचिता से जोड़ा गया ताकि वे बिना किसी संकोच के आराम कर सकें।

चौथे और पांचवें दिन का क्या है धार्मिक गणित?

पारंपरिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, मासिक धर्म के शुरू होने के बाद शुरुआती तीन दिन पूरी तरह विश्राम के होते हैं। चौथे दिन पवित्र स्नान (शुद्धि स्नान) करने के बाद महिला अपने सामान्य घरेलू कार्यों जैसे रसोई का काम संभालना, बच्चों और परिवार की देखभाल आदि में आसानी से लौट सकती है। लेकिन, जब बात पूरी तरह से धार्मिक कार्यों, यज्ञ, अनुष्ठान या नियमित पूजा-पाठ की आती है, तो महिलाओं को पांचवें दिन से ही इसमें शामिल होने की सलाह दी जाती है।”

समय के साथ भले ही आज इन नियमों को लेकर समाज में अलग-अलग मत और विचार सामने आए हैं, लेकिन मूल उद्देश्य हमेशा से महिला के स्वास्थ्य की रक्षा करना ही रहा है। आज के आधुनिक युग में यह बेहद जरूरी है कि हम इन परंपराओं को बिना किसी दबाव या अंधविश्वास के, उनकी समझदारी और सम्मान के साथ देखें।

कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर के अनुसार, पीरियड्स के दौरान भूलकर भी न करें ये 4 गलतियां

धार्मिक शुचिता और पारंपरिक मान्यताओं को बनाए रखने के लिए कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर जी ने कुछ मुख्य बातें बताई हैं, जिनका पालन मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को करना चाहिए:

1. प्रत्यक्ष पूजा-पाठ से बनाकर रखें दूरी

मान्यता और शास्त्रों के अनुसार, पीरियड्स के दिनों में घर के मंदिर में जाना, भगवान की मूर्तियों को स्पर्श करना या नियमित रूप से की जाने वाली आरती-पूजा को टालना चाहिए। इसके पीछे मुख्य कारण यही है कि इस समय शरीर को आध्यात्मिक ऊर्जा के भारी प्रवाह से बचाकर पूरी तरह विश्राम दिया जाए। हालांकि, मन में भगवान का नाम लेने या मानसिक जाप करने पर कोई रोक नहीं है।

2. मुख्य मंदिर परिसरों में प्रवेश से बचना

कई सनातनी परंपराओं में यह कड़ाई से माना जाता है कि पीरियड्स के दौरान मुख्य मंदिरों के गर्भगृह या मंदिर परिसर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। आज के समय में भी देश की अधिकांश महिलाएं अपनी व्यक्तिगत आस्था, श्रद्धा और पारिवारिक सुविधा के मुताबिक इस नियम का पूरी निष्ठा से पालन करती हैं।

3. भगवान के भोग और प्रसाद बनाने से परहेज

रसोई घर में रोजमर्रा का खाना बनाना या न बनाना पूरी तरह से आपके परिवार की स्थानीय परंपरा और आपकी शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। लेकिन, जहां तक धार्मिक दृष्टि का सवाल है, इन दिनों में भगवान के लिए विशेष भोग (प्रसाद) तैयार करने या पूजा की सामग्री को छूने से पूरी तरह दूरी रखने की सलाह दी जाती है।

4. पवित्र और धार्मिक वस्तुओं को स्पर्श न करना

मासिक धर्म के दौरान घर में रखी लड्डू गोपाल की मूर्ति, पूजा की थाली, पवित्र गंगाजल, रामायण-गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों या अन्य किसी भी पूजनीय वस्तु को सीधे छूने से बचना चाहिए। यह नियम भी प्राचीन शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा को बनाए रखने की पारंपरिक सोच का एक बेहद अहम हिस्सा है।

Shri Devkinandan Thakur Ji: परंपरा का सम्मान करें, रूढ़िवादिता का नहीं, आज के दौर की जरूरत

आज के आधुनिक समय में हर महिला की शारीरिक स्थिति, काम का माहौल, सेहत और सोच काफी अलग है। इसलिए किसी भी नियम को जबरदस्ती थोपने के बजाय महिलाओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपनी सुविधा और सेहत के अनुसार इन परंपराओं का पालन करें।

किसी भी विचार से जुड़ना या दूरी बनाना पूरी तरह से व्यक्तिगत समझ पर निर्भर करता है। हमें दूसरों की आस्था और पुरानी परंपराओं का सम्मान जरूर करना चाहिए, लेकिन किसी भी नियम को हीन भावना या अंधविश्वास का रूप नहीं देना चाहिए। देवकीनंदन ठाकुर जी की यह सीख हमें याद दिलाती है कि धर्म हमेशा इंसान की भलाई और उसके स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखता है।

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