Online Security Alert: एआई वॉयस असिस्टेंट के बढ़ते इस्तेमाल के बीच बुजुर्गों के बैंक खातों पर मंडराया बड़ा खतरा
Online Security Alert: AI वॉयस असिस्टेंट, बुजुर्गों के बैंक खातों पर बड़ा खतरा
Online Security Alert: आज के डिजिटल युग में एआई तकनीक बहुत तेजी से हमारे दादा-दादी और माता-पिता के जीवन का अहम हिस्सा बनती जा रही है। विशेषकर पचास साल से अधिक उम्र के लोगों में एलेक्सा, सिरी और गूगल असिस्टेंट जैसे वॉयस-आधारित स्मार्ट टूल्स का चलन पिछले कुछ समय में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ा है। बुजुर्गों के लिए इन एआई असिस्टेंट्स को इस्तेमाल करना बेहद आसान होता है क्योंकि इसमें किसी जटिल टाइपिंग या कीबोर्ड की जरूरत नहीं पड़ती। केवल अपनी सामान्य आवाज में कमांड देकर वे अपनी जरूरी दवाइयों का रिमाइंडर लगा लेते हैं, दूर बैठे बच्चों को वीडियो कॉल मिला देते हैं, सुबह की ताजा खबरें सुन लेते हैं या फिर सिर्फ बोलकर अपने बैंक अकाउंट का बैलेंस जान लेते हैं।
इस बढ़ती निर्भरता का एक दूसरा पहलू भी है जो बेहद चिंताजनक है। तकनीकी सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि जैसे-जैसे वरिष्ठ नागरिकों में इन स्मार्ट स्पीकर्स और एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे साइबर अपराधियों ने भी बुजुर्गों को निशाना बनाने के लिए एआई आधारित नए-नए हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं। इंटरनेट सुरक्षा से जुड़ी संस्थाओं के पास ऐसी कई शिकायतें आ रही हैं जहां तकनीक की कम समझ रखने वाले बुजुर्गों को झांसा देकर उनकी मेहनत की कमाई पर डाका डाला गया है। घर के शांत माहौल में रहने वाले बुजुर्ग अक्सर इन एआई टूल्स को पूरी तरह सुरक्षित मान बैठते हैं, जबकि यही भरोसा उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत का कारण बन रहा है।
Online Security Alert: नकली आवाज के जरिए होने वाले एआई वॉयस क्लोनिंग स्कैम क्या हैं
हाल के दिनों में साइबर ठगों ने एआई तकनीक का इस्तेमाल करके ठगी का एक बेहद खतरनाक तरीका खोज निकाला है जिसे वॉयस क्लोनिंग कहा जाता है। इस नए किस्म के फ्रॉड में अपराधी एआई सॉफ्टवेयर की मदद से परिवार के किसी छोटे बच्चे, बेटे या पोते-पोती की हूबहू नकली आवाज तैयार कर लेते हैं। इसके बाद घर के बुजुर्गों को किसी अनजान नंबर से इमरजेंसी कॉल की जाती है। फोन आते ही रोने या घबराने की आवाज सुनाई देती है जिसमें कहा जाता है कि वे किसी बड़ी मुसीबत में फंस गए हैं, उनका एक्सीडेंट हो गया है या पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया है और उन्हें तुरंत पैसों की जरूरत है।
अचानक आई इस मुसीबत और अपने बच्चे की जानी-पहचानी आवाज सुनकर बुजुर्ग पूरी तरह घबरा जाते हैं। वे बिना सोचे-समझे और बिना किसी जांच-पड़ताल के ठगों द्वारा बताए गए बैंक खाते या यूपीआई आईडी पर तुरंत मोटी रकम ट्रांसफर कर देते हैं। इस तरह के मामलों में बाद में पता चलता है कि जिस बच्चे के नाम पर पैसे भेजे गए, वह तो अपने स्कूल या दफ्तर में पूरी तरह सुरक्षित था। साइबर थानों के अधिकारियों के मुताबिक इस एआई घोटाले से बचने का सबसे सीधा नियम यह है कि जब भी ऐसी कोई संदिग्ध या डराने वाली कॉल आए, तो तुरंत पैसे भेजने के बजाय पहले फोन काट दें। इसके बाद अपने बच्चे के उस नंबर पर दोबारा फोन लगाकर सच्चाई का पता करें जो आपके फोन में पहले से सेव है। कई जागरूक परिवारों ने अब आपस में एक ‘सेफ वर्ड’ यानी एक गुप्त कोड शब्द भी तय करना शुरू कर दिया है, ताकि आपातकाल के समय असली और नकली कॉल की पहचान की जा सके।
प्राइवेसी सेटिंग्स की अनदेखी करने से कैसे लीक हो रहा है संवेदनशील डेटा
वॉयस क्लोनिंग के अलावा स्मार्ट स्पीकर्स की प्राइवेसी सेटिंग्स की अनदेखी करना भी एक बड़ा सुरक्षा लूपहोल साबित हो रहा है। बाजार में मिलने वाले अधिकांश एआई वॉयस असिस्टेंट डिवाइस हमेशा एक्टिव मोड में रहते हैं ताकि वे यूजर की आवाज को कभी भी सुन सकें। विशेषज्ञों का कहना है कि चौबीसों घंटे चालू रहने के कारण ये डिवाइसेज कई बार घर के भीतर होने वाली बेहद निजी और संवेदनशील बातचीत को भी अनजाने में रिकॉर्ड कर लेते हैं। अगर इस बातचीत में बैंक के पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड के नंबर या किसी अन्य वित्तीय लेनदेन की चर्चा हो रही हो, तो वह डेटा क्लाउड सर्वर पर स्टोर हो जाता है।
यदि किसी एआई ऐप या डिवाइस का सर्वर हैक हो जाए, तो साइबर अपराधियों के हाथ यह पूरी वॉयस रिकॉर्डिंग लग सकती है। इसी वजह से तकनीकी जानकार यह सख्त सलाह देते हैं कि बुजुर्गों को अपने एआई असिस्टेंट को कभी भी सीधे अपने मुख्य बैंकिंग ऐप्स, क्रेडिट कार्ड या संवेदनशील ईमेल अकाउंट से लिंक नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही हर महीने डिवाइस की प्राइवेसी सेटिंग्स में जाकर पुरानी वॉयस रिकॉर्डिंग्स को मैनुअली डिलीट करना और माइक्रोफोन की परमिशन को केवल जरूरत के समय तक ही सीमित रखना बेहद जरूरी माना गया है।
Online Security Alert: डिजिटल सुरक्षा के लिए बुजुर्गों को अपनी कौन सी आदतें बदलनी होंगी
बुजुर्गों को डिजिटल रूप से पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए घर के युवा सदस्यों को भी आगे आना होगा। सबसे पहले उनके स्मार्टफोन और एआई ऐप्स के पासवर्ड को बेहद मजबूत और लंबा बनाना चाहिए, जिसमें नाम या जन्मतिथि जैसी आसान चीजों का इस्तेमाल न हो। जहां भी विकल्प उपलब्ध हो, वहां टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन यानी दोहरे स्तर की सुरक्षा प्रणाली को जरूर चालू करें, ताकि पासवर्ड पता होने पर भी कोई दूसरा व्यक्ति बिना ओटीपी के अकाउंट में दाखिल न हो सके।
इसके अलावा, आजकल के दौर में साइबर अपराधी व्हाट्सएप पर लुभावने लिंक्स या बैंक के नाम से फर्जी मैसेज भेजकर भी बुजुर्गों को फंसाते हैं। बुजुर्गों को यह स्पष्ट रूप से सिखाया जाना चाहिए कि किसी भी अनजान मैसेज में दिए गए लिंक पर क्लिक न करें, चाहे वह कितना भी आधिकारिक या जरूरी क्यों न दिखे। रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट या किसी अन्य सार्वजनिक स्थान पर मिलने वाले मुफ्त के यूएसबी चार्जिंग पॉइंट्स का इस्तेमाल करने से भी बचना चाहिए, क्योंकि इनके जरिए फोन में जासूसी सॉफ्टवेयर डालने का खतरा रहता है।
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