Linga Purana Shivling Story: सनातन धर्म में शिवलिंग को केवल एक पत्थर या मूर्ति नहीं माना जाता है, बल्कि इसे संपूर्ण ब्रह्मांड की असीम ऊर्जा और निराकार चेतना का प्रतीक माना गया है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग का वास्तविक अर्थ ‘अनंत’ होता है, यानी जिसका न तो कोई आदि (शुरुआत) है और न ही कोई अंत। यह भगवान शिव और माता पार्वती के आदि-अनादि एकल रूप को दर्शाता है। हिंदू धर्म ग्रंथों में कई ऐसे शिवलिंगों का वर्णन मिलता है जो ‘स्वयंभू’ हैं, अर्थात जिन्हें किसी मनुष्य ने नहीं बनाया, बल्कि वे स्वयं धरती पर प्रकट हुए हैं।
लिंग महापुराण की पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में ही ब्रह्मांड के सबसे पहले शिवलिंग की उत्पत्ति हुई थी। आइए जानते हैं कि ब्रह्मांड का सबसे पहला शिवलिंग कहां, कब और किस रूप में प्रकट हुआ था और इसकी स्थापना से जुड़ी क्या मान्यताएं हैं।
Linga Purana Shivling Story: कैसे शुरू हुई शिवलिंग की पूजा? जानिए पौराणिक कथा
लिंग महापुराण के अनुसार, सृष्टि के निर्माण के शुरुआती समय में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर एक बड़ा विवाद पैदा हो गया था। दोनों स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश कर रहे थे। उसी समय दोनों देवों के मध्य भगवान शिव एक विशाल और अंतहीन ‘ज्योतिर्लिंग’ के रूप में प्रकट हुए।
इस दिव्य ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने के बाद भगवान शिव ने ब्रह्मा जी और विष्णु जी के सामने एक चुनौती रखी। महादेव ने कहा कि आप दोनों में से जो भी इस ज्योतिर्लिंग के शुरुआती छोर (आदि) और अंतिम छोर (अंत) को सबसे पहले खोज निकालेगा, वही ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कहलाएगा।
भगवान शिव की इस चुनौती को स्वीकार करते हुए भगवान विष्णु ने ‘वाराह’ का रूप धारण किया और वे ज्योतिर्लिंग का अंत ढूंढने के लिए ब्रह्मांड की गहराइयों (पाताल लोक) की ओर चले गए। दूसरी ओर, ब्रह्मा जी ने ‘हंस’ का रूप धारण किया और वे ज्योतिर्लिंग का ऊपरी सिरा (शुरुआत) खोजने के लिए आकाश की ओर उड़ चले।
जब ब्रह्मा और विष्णु को हुआ असीम ऊर्जा का ज्ञान
धार्मिक कथा के अनुसार, बहुत लंबे समय तक प्रयास करने के बाद भी भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी में से किसी को भी उस विशाल ज्योतिर्लिंग का कोई छोर या किनारा नहीं मिला। वे दोनों इस बात को जान गए कि इस दिव्य ज्योतिर्लिंग की सीमाओं का पता लगाना पूरी तरह से असंभव है।
अपनी हार स्वीकार करने के बाद जब वे वापस लौटे, तो उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ कि यह ज्योतिर्लिंग असीम और अनंत है। इसके बाद उन्होंने उस दिव्य ज्योतिर्लिंग के भीतर से आ रही ‘ॐ’ (ओम) की पवित्र ध्वनि की आराधना और स्तुति करना शुरू कर दिया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी ऐतिहासिक घटना के बाद से संसार में महादेव की शिवलिंग के रूप में पूजा करने की परंपरा की शुरुआत हुई थी।
उत्तराखंड का ‘लाखामंडल शिव मंदिर’ और प्रथम शिवलिंग की मान्यता
ब्रह्मांड के सबसे पहले शिवलिंग की स्थापना को लेकर देश में अलग-अलग स्थानों पर कई तरह की धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। हालांकि, लिंग महापुराण में वर्णित कथा के आधार पर देवभूमि उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित ‘लाखामंडल शिव मंदिर’ को प्रथम शिवलिंग का स्थान माना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि लाखामंडल वही पवित्र स्थान है जहां ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने के बाद ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस स्थान पर शिवलिंग के स्थापित होने के बाद स्वयं भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने मिलकर इसकी सबसे पहले पूजा-अर्चना की थी। लाखामंडल मंदिर में मौजूद इस प्राचीन शिवलिंग को आज ‘महामुंडेश्वर’ के नाम से जाना जाता है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
Linga Purana Shivling: प्रथम शिवलिंग से जुड़े देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थल
उत्तराखंड के लाखामंडल के अलावा भारत के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में भी दुनिया के पहले और सबसे पुराने शिवलिंग से जुड़ी कुछ अन्य महत्वपूर्ण स्थानीय मान्यताएं मौजूद हैं, जो इस प्रकार हैं:
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गुप्तेश्वर महादेव मंदिर, मध्य प्रदेश: एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के मंडलेश्वर में स्थित गुप्तेश्वर महादेव मंदिर को दुनिया का पहला शिवलिंग माना जाता है। इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती ने मिलकर की थी।
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गुप्तेश्वर महादेव मंदिर, छत्तीसगढ़: इसके अतिरिक्त, कुछ अन्य क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित गुप्तेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग को दुनिया का सबसे पुराना शिवलिंग माना जाता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का मानना है कि यह शिवलिंग पूरी तरह से स्वयंभू है और प्राचीन काल से यहां स्थापित है।
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