Power Crisis Strategy: प्रचंड गर्मी से टूटे बिजली मांग के सारे रिकॉर्ड जून और जुलाई के लिए सरकार का मेगा एक्शन प्लान तैयार
Power Crisis Strategy: जून-जुलाई के लिए सरकार का मेगा प्लान
Power Crisis Strategy: देश भर में जारी भीषण लू और रिकॉर्डतोड़ तापमान के बीच बिजली की घरेलू मांग ने इतिहास के सारे पुराने आंकड़ों को ध्वस्त कर दिया है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने संसद की स्थायी समिति के समक्ष देश के मौजूदा बिजली संकट और आगामी महीनों की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि मई के महीने में जहां पीक डिमांड 265 गीगावाट तक पहुंच चुकी है, वहीं आगामी जुलाई तक इसके बढ़कर 283 गीगावाट के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। इस अप्रत्याशित संकट से निपटने और नेशनल ग्रिड को ठप होने से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने युद्धस्तर पर एक व्यापक राष्ट्रीय एक्शन प्लान तैयार कर लिया है, जिसके तहत सभी पावर प्लांट्स को अपनी पूरी क्षमता से उत्पादन करने के कड़े निर्देश जारी किए गए हैं।
देश के कई राज्यों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है, जिसके चलते घरों और दफ्तरों में एयर कंडीशनिंग और कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल अपनी चरम सीमा पर है। बिजली की मांग में आई इस ऐतिहासिक तेजी ने देश के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव डाल दिया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और राजस्थान समेत कई राज्यों के ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों से लगातार अघोषित बिजली कटौती और लोड शेडिंग की शिकायतें सामने आ रही हैं। संसद भवन में हुई इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान सांसदों ने स्थानीय स्तर पर जनता को होने वाली परेशानियों को लेकर तीखे सवाल उठाए, जिसके बाद मंत्रालय ने आश्वस्त किया कि वर्तमान संकट से निपटने के लिए कोयले के स्टॉक को फुल करने से लेकर मेंटेनेंस शटडाउन पर पूरी तरह रोक लगाने जैसे कड़े नीतिगत कदम उठाए जा चुके हैं।
Power Crisis Strategy: संसद की स्थायी समिति में गूंजा अघोषित कटौती का मुद्दा सांसदों ने उठाए तीखे सवाल
संसद की स्थायी समिति की यह विशेष बैठक मूल रूप से ‘आत्मनिर्भर बिजली भारत’ के निर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी पीएसयू की भूमिका की समीक्षा करने के लिए बुलाई गई थी। लेकिन जैसे ही बैठक शुरू हुई, देश भर में जारी भीषण गर्मी और स्थानीय स्तर पर हो रही भारी बिजली कटौती का मुद्दा पूरी चर्चा के केंद्र में आ गया। समिति के विभिन्न सदस्यों ने ऊर्जा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों को घेरते हुए सवाल किया कि जब सरकार लगातार सरप्लस बिजली का दावा करती है, तो जमीनी स्तर पर आम उपभोक्ताओं को इस भीषण तपिश में घंटों बिना बिजली के क्यों रहना पड़ रहा है। क्या देश का मौजूदा ट्रांसमिशन सिस्टम इस पीक लोड को संभालने के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह तैयार है?
बैठक के दौरान भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सांसद जगदंबिका पाल ने अपने संसदीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर का उदाहरण देते हुए बिजली की अनियमित आपूर्ति का मुद्दा बेहद आक्रामक तरीके से उठाया। उन्होंने बताया कि हाल ही में जब उन्होंने अपने क्षेत्र का दौरा किया, तो पाया कि ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति की स्थिति बेहद खराब थी और बार-बार लोड शेडिंग की जा रही थी। इसके साथ ही समिति के सामने यह बात भी आई कि उत्तर प्रदेश सरकार ने मौजूदा संकट को देखते हुए केंद्र सरकार से अतिरिक्त बिजली के कोटे की मांग की है। हालांकि, इन तीखे सवालों का जवाब देते हुए ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि देश में बिजली की कोई मूल कमी नहीं है। उन्होंने दलील दी कि जहां भी कटौती हो रही है, वे घटनाएं केंद्रीय सिस्टम की विफलता नहीं हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर ट्रांसफार्मर के जलने, तारों के टूटने या लोकल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क की तकनीकी कमियों के कारण उत्पन्न हुई स्थानीय समस्याएं हैं, जिन्हें राज्य सरकारों के साथ मिलकर तुरंत ठीक किया जा रहा है।
मेंटेनेंस शटडाउन पर पूरी तरह रोक और थर्मल पावर प्लांटों में कोयले का बंपर स्टॉक
बढ़ती मांग के बीच ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने और उत्पादन में एक मेगावाट की भी कमी न आने देने के लिए ऊर्जा मंत्रालय ने कई कड़े और कूटनीतिक फैसले लिए हैं। सरकार ने आदेश जारी किया है कि जून और जुलाई के इस पीक सीजन के दौरान देश के किसी भी हिस्से में स्थित पावर प्लांट में किसी भी प्रकार का ‘मेंटेनेंस शटडाउन’ यानी नियमित मरम्मत के लिए काम बंद नहीं किया जाएगा। आमतौर पर कंपनियां तकनीकी जांच के लिए गर्मियों में कुछ समय के लिए प्लांट बंद करती हैं, लेकिन इस बार इस पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है। प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक, इस एक अकेले फैसले से नेशनल ग्रिड को तुरंत 15 हजार मेगावाट यानी 15 गीगावाट की अतिरिक्त बैकअप क्षमता मिल जाएगी, जो संकट के समय किसी संजीवनी से कम नहीं होगी।
इसके साथ ही, पिछले वर्षों में हुई कोयले की किल्लत से सबक लेते हुए सरकार ने इस बार फ्यूल सप्लाई चेन को पूरी तरह चुस्त-प्रस्त कर दिया है। देश के सभी प्रमुख थर्मल पावर प्लांटों के लिए आगामी 18 दिनों तक का कोयला स्टॉक एडवांस में सुनिश्चित कर दिया गया है। कोयला मंत्रालय और रेलवे के साथ मिलकर एक विशेष टास्क फोर्स बनाई गई है, जो कोयले से लदी मालगाड़ियों के मूवमेंट की चौबीसों घंटे निगरानी कर रही है ताकि देश के किसी भी कोने में स्थित बिजली संयंत्र में ईंधन की कमी से उत्पादन न रुके।
Power Crisis Strategy: वैकल्पिक ऊर्जा का सहारा दिन में सोलर तो रात के संकट को थामेगा हाइड्रोपावर
गर्मियों के इस मौसम में जब पारंपरिक कोयला आधारित बिजली पर दबाव अपने चरम पर होता है, तब सरकार ने अपनी रणनीति में वैकल्पिक और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को प्रमुखता से शामिल किया है। दिन के समय जब सूरज की तपिश के कारण बिजली की मांग सबसे ज्यादा होती है, तब देश के सौर ऊर्जा यानी सोलर प्लांट्स पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं, जिससे ग्रिड को एक बड़ी राहत मिल रही है। इसके अलावा, मौसम विभाग के अनुमानों के अनुसार जून के महीने में तटीय और मैदानी इलाकों में हवाओं की गति बेहतर रहने की उम्मीद है, जिससे पवन ऊर्जा के माध्यम से ग्रिड में लगभग 20 गीगावाट अतिरिक्त बिजली मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती शाम और रात के वक्त आती है, जिसे तकनीकी भाषा में ‘न नून पीक ऑवर्स’ कहा जाता है। इस समय सूरज ढलने के कारण सौर ऊर्जा पूरी तरह शून्य हो जाती है, जबकि घरों में एसी और कूलर चलने के कारण बिजली की मांग अचानक से आसमान छूने लगती है। इस कूटनीतिक संकट से निपटने के लिए ऊर्जा मंत्रालय ने जल विद्युत परियोजनाओं यानी हाइड्रोपावर प्लांट्स को रणनीतिक रूप से तैनात करने का फैसला किया है। दिन के समय पानी को रोककर रखा जाएगा और जैसे ही शाम को बिजली की मांग बढ़ेगी, हाइड्रोपावर प्लांट्स से भारी मात्रा में बिजली का उत्पादन शुरू कर दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, देश के गैस आधारित पावर प्लांटों को सक्रिय रखने के लिए भारत सरकार नाइजीरिया और अन्य अफ्रीकी देशों से गैस की निरंतर और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए राजनयिक स्तर पर प्रयास कर रही है।
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