AI Technology Impact: सरकारी स्कूलों में एआई तकनीक का बड़ा असर, बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों में हुआ भारी सुधार
AI Technology Impact: सरकारी स्कूलों में AI का असर, बोर्ड रिजल्ट में सुधार
AI Technology Impact: देश के कई राज्यों के सरकारी स्कूलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई तकनीक की मदद से चलाई जा रही एक खास मुहिम के बाद बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों में ऐतिहासिक सुधार देखने को मिला है, जहां ‘संपूर्ण शिक्षा कवच’ कार्यक्रम के जरिए न केवल फेल होने वाले छात्रों की संख्या में सत्तर प्रतिशत तक की भारी कमी आई है बल्कि सुदूर ग्रामीण इलाकों के स्कूल भी राज्य की मेरिट लिस्ट में टॉप पर पहुंच रहे हैं।
AI Technology Impact: सरकारी स्कूलों में किस तरह काम कर रहा है यह नया एआई शिक्षा मॉडल
देश के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के स्तर और वहां के बुनियादी ढांचे को लेकर अक्सर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में आई एक रिपोर्ट ने इस पूरी तस्वीर को बदल कर रख दिया है। झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और राजस्थान जैसे आधे दर्जन से अधिक राज्यों के सरकारी स्कूलों में इन दिनों एक खास तरह का बदलाव देखा जा रहा है। इन राज्यों में ‘संपूर्ण शिक्षा कवच’ यानी एसएसके नाम से एक अनूठा शैक्षणिक कार्यक्रम चलाया जा रहा है। यह पूरी मुहिम राज्य सरकारों और प्रमुख एआई एजुकेशन प्लेटफॉर्म ‘फिलो’ के आपसी सहयोग से जमीन पर उतारी गई है। इस डिजिटल व्यवस्था का मुख्य फोकस केवल होनहार बच्चों को आगे बढ़ाना या टॉपर तैयार करना नहीं है, बल्कि उन कमजोर छात्रों का हाथ थामना है जो आर्थिक तंगी के कारण महंगी कोचिंग या प्राइवेट ट्यूशन का खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
इस एआई आधारित मॉडल की सबसे व्यावहारिक और बड़ी खूबी यह है कि इसमें नामांकित छात्रों को चौबीसों घंटे लाइव पर्सनल ट्यूटर यानी व्यक्तिगत शिक्षक का सपोर्ट मिलता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि गांव का कोई छात्र रात के दस या ग्यारह बजे भी गणित या विज्ञान का कोई मुश्किल सवाल हल कर रहा है और उसे वह समझ नहीं आ रहा, तो वह स्मार्टफोन के जरिए तुरंत मदद ले सकता है। ऐप पर एआई तकनीक और लाइव शिक्षक दोनों मिलकर छात्र के उस संशय को बेहद आसान भाषा में दूर करते हैं। इस पूरी व्यवस्था की सबसे राहत देने वाली बात यह है कि सरकारी स्कूलों के गरीब परिवारों को इस बेहतरीन और आधुनिक सुविधा के लिए अपनी जेब से एक भी पैसा फीस के रूप में नहीं देना पड़ता। इस तकनीकी सहायता ने अमीर और गरीब बच्चों के बीच की दूरी को काफी हद तक कम कर दिया है।
बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों में जिला स्तर पर क्या बड़े बदलाव दिखे हैं
सरकारी स्कूलों में लागू की गई इस तकनीक का सीधा और सकारात्मक असर अब राज्यों के बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों में साफ तौर पर रिफ्लेक्ट होने लगा है। केवल एक साल के भीतर ही कई स्कूलों के फेलियर रेट यानी फेल होने वाले बच्चों की संख्या में सत्तर फीसदी तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। अगर जिला स्तर के आंकड़ों पर नजर डालें, तो झारखंड के आदिवासी बहुल गुमला जिले का पास प्रतिशत पहले जहां सत्तासी प्रतिशत हुआ करता था, वह अब इस तकनीक के आने के बाद बढ़कर सीधे निन्यानवे दशमलव तीन प्रतिशत तक पहुंच गया है। वहीं लातेहार जिला, जिसे पहले शिक्षा के मामले में काफी पिछड़ा और कमजोर क्षेत्र माना जाता था, उसने इस बार पूरे राज्य की साइंस रैंकिंग में पहला स्थान हासिल करके सबको चौंका दिया है।
इसी तरह दुमका जिले से आई रिपोर्ट बताती है कि जिन स्कूलों में संपूर्ण शिक्षा कवच कार्यक्रम के जरिए पढ़ाई कराई जा रही थी, वहां का रिजल्ट सामान्य सरकारी स्कूलों की तुलना में लगभग बीस प्रतिशत ज्यादा बेहतर रहा। रामगढ़ जिले के जो स्कूल हमेशा से बोर्ड नतीजों में फिसड्डी माने जाते थे, वहां भी इस बार रिकॉर्ड सुधार देखने को मिला है। स्थानीय स्तर पर इन नतीजों के आने के बाद अभिभावकों और शिक्षकों के बीच एक अलग ही उत्साह का माहौल देखा जा रहा है। गांवों के लोग अब अपने बच्चों को निजी स्कूलों से निकालकर दोबारा सरकारी स्कूलों में भेजने के लिए प्रेरित हो रहे हैं, जो कि हमारी पूरी स्कूली शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बहुत ही सुखद संकेत है।
AI Technology Impact: महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में कैसा रहा इस मुहिम का अनुभव
झारखंड के अलावा पश्चिमी और मध्य भारत के राज्यों में भी इस एआई ट्यूटरिंग व्यवस्था ने बेहतरीन नतीजे दिए हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले में शिक्षा विभाग ने जब इस पायलट प्रोजेक्ट की समीक्षा की, तो पाया कि जिन सरकारी स्कूलों के बच्चों ने इस एआई प्लेटफॉर्म का नियमित रूप से और ज्यादा इस्तेमाल किया था, उनके अंक बाकी आम स्कूलों की तुलना में काफी अच्छे थे। वहीं मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में जब इस योजना को शुरुआती तौर पर लागू किया गया, तो वहां के बच्चों ने हजारों की संख्या में लाइव स्टडी सेशंस में भाग लिया। इस तकनीक की मदद से पढ़ने वाले कई सामान्य छात्रों ने बोर्ड परीक्षा में नब्बे प्रतिशत से भी अधिक अंक हासिल करके अपने माता-पिता का नाम रोशन किया है।
इस योजना की सफलता और इसकी लोकप्रियता को देखते हुए अब हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों, मेघालय के सुदूर उत्तर-पूर्वी गांवों और राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में भी इस मॉडल को बहुत तेजी के साथ लागू किया जा रहा है। शिक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि सुदूर और पहाड़ी क्षेत्रों में अक्सर शिक्षकों की कमी एक बड़ी समस्या होती है। ऐसे में यह एआई आधारित सिस्टम शिक्षकों की कमी को पूरा करने और बच्चों को घर बैठे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का एक बहुत ही शानदार विकल्प साबित हो रहा है। सोशल मीडिया पर भी इस व्यवस्था को लेकर लोग काफी सकारात्मक चर्चा कर रहे हैं और इसे शिक्षा के क्षेत्र में एक मूक क्रांति का नाम दे रहे हैं।
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