West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 38 लाख लंबित अपीलों का मांगा पूरा ब्योरा; नए चुनाव के आदेश पर भी उठाया कानूनी सवाल

38 लाख लंबित अपीलों पर कोर्ट सख्त, नए चुनाव के आदेश की कानूनी प्रक्रिया पर सवाल

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West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलों पर सुनवाई करते हुए सख्त संवैधानिक व कानूनी प्रश्न खड़े किए।
अदालत ने सवाल किया कि क्या न्यायपालिका केवल इस गणितीय आधार पर विधानसभा सीटों पर नए चुनाव कराने का निर्देश दे सकती है कि वहां जीत-हार का अंतर मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या से कम था।
सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव परिणामों को पलटने या पुनः मतदान कराने की एक निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया होती है, जिसे केवल ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) के माध्यम से ही उच्च न्यायालयों के समक्ष चुनौती दी जा सकती है। इसके साथ ही पीठ ने अपीलीय ट्रिब्यूनल में लंबित लगभग 38 लाख अपीलों की धीमी गति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से इसका विस्तृत श्रेणीवार ब्योरा तलब किया है।

West Bengal SIR: 31 विधानसभा क्षेत्रों में जीत के अंतर से कहीं ज्यादा वोट काटे गए

टीएमसी सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत में पक्ष रखते हुए दावा किया कि राज्य की 31 विधानसभा सीटों पर चुनाव परिणाम सीधे तौर पर एसआईआर प्रक्रिया से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने दलील दी कि इन सीटों पर विजयी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवारों की जीत का अंतर उन मतदाताओं की संख्या से बेहद कम था, जिनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे।
कल्याण बनर्जी ने उदाहरण पेश करते हुए बताया कि एक विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवार की हार का अंतर महज 401 वोट था, जबकि वहां 8,785 मतदाताओं के नाम सूची से बाहर कर दिए गए थे। इसी प्रकार एक अन्य सीट पर 316 वोटों का अंतर था और दूसरी जगह 15,000 वोटों से हार हुई जबकि 27,000 नाम हटाए गए थे।
टीएमसी का आरोप है कि इस पुनरीक्षण अभियान के जरिए एक विशेष समुदाय और वैध नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित किया गया, जिससे लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ा। उन्होंने मांग की कि इस विसंगति को देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में न्यायसंगत राहत दी जाए।

CJI सूर्यकांत और जस्टिस बागची के तीखे सवाल: प्रक्रियागत और कानूनी आधार क्या है?

अभिषेक बनर्जी और टीएमसी सदस्यों की अर्जी पर टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मौखिक रूप से कहा कि आप इस संबंध में अपनी अंतरिम अर्जी दाखिल कर सकते हैं, किंतु क्या अदालत केवल इन आंकड़ों के आधार पर सीधे नए सिरे से चुनाव कराने का आदेश दे सकती है।
सीजेआई ने पूछा कि क्या प्रभावित उम्मीदवारों ने इन 31 निर्वाचन क्षेत्रों में घोषित नतीजों को चुनौती देने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत औपचारिक ‘चुनाव याचिकाएं’ दायर की थीं। इस पर अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने स्वीकार किया कि कुछ सीटों पर याचिकाएं दाखिल की गई हैं, लेकिन सभी 31 सीटों पर नहीं।
पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने मामले के कानूनी पहलुओं को रेखांकित करते हुए कहा कि यह देखना सबसे महत्वपूर्ण है कि नाम हटाए जाने के बाद कितने वास्तविक नागरिकों ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर की।
जस्टिस बागची ने समझाया कि यदि किसी सीट पर सौ लोगों के नाम काटे गए और जीत का अंतर पचास था, लेकिन किसी ने अपील ही नहीं की और निर्णय स्वीकार कर लिया, तो परिणाम को चुनौती देना महज सैद्धांतिक रह जाता है। इसके विपरीत, यदि हटाए गए साठ या सत्तर लोगों ने औपचारिक अपील की है और उनकी अपीलें लंबित हैं, तब यह चुनौती कानूनी रूप से ठोस और विचारणीय बन जाती है।

West Bengal SIR: 38 लाख लंबित अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, आयोग से मांगा अलग-अलग वर्गीकरण

मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने आरटीआई (RTI) से मिले आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि अपीलीय ट्रिब्यूनलों के समक्ष कुल 38.1 लाख अपीलें प्राप्त हुई थीं। इनमें से अब तक केवल लगभग 83,000 अपीलों का ही निस्तारण हो पाया है, जिसमें से 75,443 लोगों के नाम मतदाता सूची में दोबारा बहाल किए गए हैं।
उन्होंने यह चौंकाने वाला तथ्य रखा कि कुल 38 लाख अपीलों में से मात्र 7 लाख अपीलें उन नागरिकों की हैं जिनके नाम हटाए गए हैं (Exclusion), जबकि शेष 31 लाख अपीलें दूसरों के नाम जोड़े जाने पर आपत्ति (Objection to Inclusion) से संबंधित हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस धीमी प्रगति पर नाराजगी जताई और कहा कि किसी भी नागरिक को बिना निष्पक्ष सुनवाई के उसके बुनियादी राजनीतिक अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता। पीठ ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह अगली सुनवाई तक पूरा डेटा अलग-अलग वर्गीकृत करके प्रस्तुत करे।
अदालत यह तय करेगी कि क्या नाम हटाए जाने वाले 7 लाख नागरिकों की अपीलों को प्राथमिकता के आधार पर पहले सुना जाए, ताकि उनका व्यक्तिगत वोटिंग अधिकार सुरक्षित हो सके। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि आगामी बड़े चुनावों से पहले सभी लंबित अपीलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित किया जाएगा और यदि आवश्यकता पड़ी तो और अधिक ट्रिब्यूनल गठित किए जाएंगे।

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