सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: सिर्फ वैवाहिक विवाद के आधार पर 26 सप्ताह का गर्भपात नहीं, पिता के अधिकारों पर भी चर्चा
पति-पत्नी के विवाद के बीच 26 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई।
Supreme Court on Abortion: देश की शीर्ष अदालत में छह महीने (24 सप्ताह) से अधिक की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति मांगने वाली एक विवाहिता की याचिका पर सुनवाई के दौरान कई गंभीर कानूनी, नैतिक और सामाजिक प्रश्न उभरकर सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए दो टूक टिप्पणी की है कि केवल पति-पत्नी के आपसी वैवाहिक मतभेद, पारिवारिक कलह या तलाक का इरादा किसी स्वस्थ भ्रूण के गर्भपात का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बन सकता। अदालत ने सुनवाई के दौरान अजन्मे बच्चे के जीवन के अधिकार और जैविक पिता की पैतृक जिम्मेदारियों व अधिकारों के संतुलन को लेकर भी अहम टिप्पणियां की हैं।
Supreme Court on Abortion: 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की मांग और पति का विरोध
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ कर रही है। याचिकाकर्ता महिला ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए दलील दी कि उसके और उसके पति व ससुराल पक्ष के बीच गहरे वैवाहिक विवाद चल रहे हैं, जिसके चलते वह इस शादी को आगे जारी नहीं रखना चाहती और तलाक की अर्जी दाखिल करने की तैयारी में है। महिला का कहना है कि टूटे हुए वैवाहिक संबंधों और मानसिक तनाव के बीच वह इस 26 सप्ताह की गर्भावस्था को आगे नहीं खींचना चाहती, इसलिए उसे मेडिकल टर्मिनेशन की अनुमति दी जाए।
इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के पति ने अदालत में उपस्थित होकर अपनी पत्नी की इस मांग का कड़ा विरोध किया। पति की ओर से पेश वकील ने पीठ को अवगत कराया कि पति बच्चे के जन्म के बाद उसकी परवरिश, लालन-पालन और संपूर्ण कानूनी व वित्तीय जिम्मेदारियां उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है। पति ने अदालत से गुहार लगाई कि गर्भस्थ शिशु पूर्णतः स्वस्थ है और विकसित हो चुका है, इसलिए उसे जीवन का अधिकार मिलना चाहिए और महिला को गर्भपात की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
पिता के अधिकार और अजन्मे बच्चे के जीवन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए महिला के तर्कों पर सवाल उठाए और कहा कि गर्भ में पल रहा शिशु केवल मां की इच्छा या अनिच्छा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके अस्तित्व से पिता का जैविक और भावनात्मक नाता भी जुड़ा हुआ है। अदालत ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि केवल पति-पत्नी के बीच अनबन या आपसी झगड़े के आधार पर परिपक्व गर्भावस्था को समाप्त करने की सामान्य अनुमति दी जाने लगी, तो इससे समाज में एक अत्यंत खतरनाक परिपाटी स्थापित हो जाएगी।
न्यायमूर्ति नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत 24 सप्ताह के बाद गर्भपात की अनुमति केवल असाधारण और जीवन-संकट वाली परिस्थितियों में ही दी जा सकती है, जैसे कि महिला यौन हिंसा (दुष्कर्म) की पीड़िता हो, गर्भधारण से महिला के जीवन को सीधा खतरा हो, या फिर मेडिकल बोर्ड द्वारा भ्रूण में गंभीर व लाइलाज शारीरिक या मानसिक विकृतियों की पुष्टि की गई हो। चूंकि मौजूदा मेडिकल जांच में भ्रूण पूरी तरह स्वस्थ पाया गया है और मां के जीवन को कोई तात्कालिक चिकित्सकीय जोखिम नहीं है, ऐसे में केवल घरेलू कलह को आधार बनाकर गर्भपात की इजाजत नहीं दी जा सकती।
पति को चरित्र पर लगाए आरोप वापस लेने और हलफनामा देने का निर्देश
सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि पति द्वारा महिला के चरित्र पर लांछन लगाए जाने के कारण दोनों के बीच कटुता इस चरम सीमा तक पहुंची है, तो पीठ ने पति के रुख पर भी सख्त नाराजगी जताई। अदालत ने पति को निर्देश दिया कि यदि वह वास्तव में बच्चे का पिता होने का दायित्व निभाना चाहता है और मामले का मानवीय समाधान चाहता है, तो वह सबसे पहले अदालत में बिना शर्त हलफनामा दाखिल कर अपनी पत्नी के खिलाफ लगाए गए सभी अनर्गल आरोप वापस ले।
सर्वोच्च अदालत ने दोनों पक्षों के बीच सुलह और संवाद की संभावनाएं तलाशने पर भी बल दिया। पीठ का मानना था कि अत्यधिक तनाव या गुस्से में लिया गया ऐसा अपरिवर्तनीय निर्णय भविष्य में दोनों पक्षों के लिए आजीवन मानसिक पश्चाताप का कारण बन सकता है। अदालत ने दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं से कहा कि वे दंपती को बैठकर बातचीत करने और बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखकर निर्णय लेने के लिए प्रेरित करें।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट 2021 के कानूनी प्रावधान
भारत में गर्भपात की प्रक्रिया ‘गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम’ (Medical Termination of Pregnancy Act, 1971) और इसमें वर्ष 2021 में किए गए संशोधनों द्वारा शासित होती है। कानून के अनुसार, 20 सप्ताह तक की गर्भावस्था को एक पंजीकृत चिकित्सक (आरएमपी) की राय के आधार पर समाप्त किया जा सकता है। वहीं, 20 से 24 सप्ताह के बीच की गर्भावस्था के लिए दुष्कर्म पीड़िताओं, नाबालिगों, दिव्यांगों या वैवाहिक स्थिति में आए आकस्मिक बदलाव (जैसे विधवा या तलाकशुदा होने) जैसी विशेष श्रेणियों की महिलाओं को दो चिकित्सकों की सहमति से गर्भपात का अधिकार मिलता है।
हालांकि, 24 सप्ताह से अधिक की अवधि बीत जाने के बाद कानून अत्यधिक सख्त हो जाता है। 24 सप्ताह के उपरांत गर्भपात की अनुमति केवल राज्य स्तरीय वैधानिक मेडिकल बोर्ड की विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर तभी संभव है, जब भ्रूण में कोई अत्यधिक गंभीर जन्मजात विसंगति पाई जाए अथवा मां का जीवन गंभीर खतरे में हो। सामान्य वैवाहिक विवाद कानून की इस धारा के अंतर्गत गर्भपात की स्वीकार्य श्रेणी में नहीं आते।
Supreme Court on Abortion: बुधवार को तय होगी अगली रूपरेखा, फैसले पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में दोनों पक्षों को आत्ममंथन का अवसर देते हुए अगली सुनवाई बुधवार के लिए निर्धारित की है। अदालत पति द्वारा दाखिल किए जाने वाले शपथ पत्र का अवलोकन करने के बाद ही यह तय करेगी कि मामले को मध्यस्थता केंद्र भेजा जाए या कानूनी प्रावधानों के तहत अंतिम आदेश पारित किया जाए। यह मामला देश में महिला के प्रजनन संबंधी आत्मनिर्णय के अधिकार, गर्भस्थ शिशु के जीने के अधिकार और पिता के पैतृक दावों के बीच चल रहे कानूनी व दार्शनिक विमर्श को एक नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।
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