कौन थीं स्वयंप्रभा? जिन्होंने मायावी गुफा में फंसी वानर सेना को बचाया, जानें रामायण की अनसुनी कथा

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में स्वयंप्रभा का उल्लेख मिलता है।

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Swayamprabha Story: सनातन धर्म के महान महाकाव्य रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता जानकी, लक्ष्मण और भक्त शिरोमणि हनुमान जी के दिव्य चरित्रों के साथ-साथ कई ऐसे विशिष्ट और तपस्वी पात्रों का भी उल्लेख मिलता है, जिनकी भूमिका भले ही संक्षिप्त रही हो किंतु उनका प्रभाव अत्यंत निर्णायक और युगान्तकारी रहा। इन्हीं विस्मृत किंतु परम तेजस्वी पात्रों में से एक हैं योगिनी तपस्विनी स्वयंप्रभा। जब माता सीता की खोज में निकली वानर सेना भूख-प्यास से व्याकुल होकर एक अभेद्य और मायावी अंधकारमयी गुफा में दिशाहीन होकर फंस गई थी और उनका जीवन संकट में पड़ गया था, तब स्वयंप्रभा ने ही अपने तपोबल और योगशक्ति से वानरों को सुरक्षित बाहर निकालकर प्रभु श्री राम के कार्य को गति प्रदान की थी। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण के किष्किंधा कांड में इस दिव्य घटना का अत्यंत रोचक और सजीव वर्णन प्राप्त होता है।

Swayamprabha Story: माता सीता की खोज में दक्षिण दिशा की ओर वानर दल का प्रस्थान

महाकाव्य के अनुसार, लंकापति रावण द्वारा माता सीता के छलपूर्वक हरण के उपरांत जब भगवान श्री राम की वानरराज सुग्रीव से मित्रता हुई, तब सुग्रीव ने चारों दिशाओं में अपनी विशाल वानर सेना के अलग-अलग दलों को सीता जी की खोज के लिए भेजा। दक्षिण दिशा को सबसे संवेदनशील और संभावित क्षेत्र माना गया था, जिसका नेतृत्व युवराज अंगद के हाथों में सौंपा गया। इस दल में महाबली हनुमान, बुद्धिमान जामवंत, नल-नील और सुषेण जैसे पराक्रमी योद्धा सम्मिलित थे। सुग्रीव ने सभी वानर वीरों को एक मास के भीतर माता सीता का सुराग लगाकर लौटने का कठोर निर्देश दिया था।

दक्षिण के घने जंगलों, बीहड़ों और पर्वत शिखरों पर कई सप्ताह तक अथक प्रयास करने के उपरांत भी जब माता सीता का कोई संकेत नहीं मिला, तो पूरी वानर सेना शारीरिक रूप से अत्यंत शिथिल और प्यास से व्याकुल हो गई। भूख और थकान से त्रस्त वानर जब विंध्याचल की कंदराओं में जल की तलाश कर रहे थे, तभी उन्हें जमीन के भीतर एक विशाल गुफा दिखाई दी। उस गुफा के मुख से जलपक्षी, चकवा और हंस बाहर निकल रहे थे तथा उनकी पंखों से शीतल जल की बूंदें टपक रही थीं। पक्षियों को देखकर वीर हनुमान और अंगद ने अनुमान लगाया कि इस अंधेरी गुफा के भीतर अवश्य ही कोई गहरा जलस्रोत अथवा जलाशय विद्यमान है, जिसके बाद पूरी वानर सेना ने उस रहस्यमयी गुफा में प्रवेश कर लिया।

मय दानव की रची स्वर्णमयी मायावी नगरी और वानरों का असमंजस

गुफा में प्रवेश करते ही चारों ओर घोर अंधकार छा गया और वानर मीलों तक हाथ पकड़कर आगे बढ़ते रहे। अचानक कुछ दूर चलने के पश्चात अंधकार समाप्त हो गया और उनके सम्मुख एक स्वर्णिम, अलौकिक और जादुई संसार प्रकट हुआ। वहां स्वर्ण और मणियों से बने विशाल भवन, कल्पवृक्षों से लदे सुंदर उपवन, स्फटिक के जलाशय और स्वादिष्ट फल-फूलों के वृक्ष शोभायमान थे। यह बाहरी संसार से पूरी तरह कटा हुआ एक दिव्य नगर था।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, इस अद्भुत कंदरा का नाम ‘ऋक्षबिल’ था, जिसका निर्माण महान असुर शिल्पी मय दानव ने किया था। मय दानव ने अप्सरा हेमा के लिए इस गुप्त स्वर्णमयी नगरी को अपनी तपोभूमि और विहार स्थल के रूप में गढ़ा था। यद्यपि गुफा के भीतर विपुल संपदा और जल उपलब्ध था, किंतु बाहर निकलने का मार्ग पूरी तरह बंद और अदृश्य हो चुका था। कई दिनों तक भटकने के बाद भी जब वानर दल को बाहर जाने की कोई राह नहीं दिखी, तो सब पर निराशा छा गई। समय-सीमा समाप्त होने पर सुग्रीव के दंड का भय और माता सीता का संधान न मिल पाने की चिंता ने वानर सेना को आत्मग्लानि से भर दिया।

कौन थीं तपस्विनी स्वयंप्रभा और क्या था उनका परिचय?

इसी दिव्य प्रासाद के भीतर एक स्वच्छ सरोवर के तट पर वानरों की दृष्टि एक तेजस्वी, चीर वस्त्र धारण किए हुए तपस्विनी पर पड़ी, जो ध्यान मुद्रा में बैठी थीं। यह परम विदुषी और संयमी तपस्विनी कोई और नहीं बल्कि स्वयंप्रभा थीं। किष्किंधा कांड के 51वें सर्ग के अनुसार, स्वयंप्रभा महान प्रजापति मेरुसावर्णि की सुपुत्री थीं। वे अप्सरा हेमा की परम सखी थीं और हेमा द्वारा ब्रह्मलोक गमन के पश्चात उनके इस पावन और गुप्त तपोवन की संरक्षक के रूप में रहकर अखंड तपस्या कर रही थीं।

वानरों के पदचाप और उनकी दीन दशा देखकर तपस्विनी स्वयंप्रभा ने अपना ध्यान तोड़ा और उनके इस अगम्य स्थान पर आने का प्रयोजन पूछा। पवनपुत्र हनुमान जी ने आगे बढ़कर विनम्रतापूर्वक अपना परिचय दिया और उन्हें अयोध्यापति भगवान श्री राम के वनवास, माता सीता के हरण तथा सुग्रीव द्वारा दिए गए खोज अभियान की पूरी कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि प्रभु कार्य में संलग्न वानर दल जल की खोज में इस मायावी गुफा में आकर रास्ता भूल चुका है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का नाम सुनते ही स्वयंप्रभा का हृदय भक्ति और श्रद्धा से भर गया और उन्होंने इसे ईश्वरीय विधान मानकर वानरों की सहायता करने का संकल्प लिया।

योगशक्ति और तपोबल से पलक झपकते गुफा से बाहर पहुंची सेना

तपस्विनी स्वयंप्रभा ने सर्वप्रथम अतिथि धर्म का पालन करते हुए वानर सेना को अमृत तुल्य शीतल जल, स्वादिष्ट कंदमूल और दिव्य फल अर्पित किए, जिससे सभी वानरों की भूख और थकावट पूरी तरह शांत हो गई। इसके बाद जब अंगद और हनुमान ने उनसे गुफा से बाहर निकलने का सुरक्षित मार्ग पूछा, तो स्वयंप्रभा ने स्पष्ट किया कि मय दानव के इस मायावी जाल से किसी भी जीवित प्राणी का सामान्य रूप से बाहर निकलना सर्वथा असंभव है।

इसके उपरांत तपस्विनी ने अपनी कठोर तपस्या से अर्जित अमोघ योगशक्ति का स्मरण किया। उन्होंने हनुमान, अंगद और सभी वानर सैनिकों को अपनी-अपनी आंखें पूरी तरह बंद करने का निर्देश दिया और सचेत किया कि जब तक वे न कहें, कोई भी अपनी पलकें न खोले। जैसे ही समस्त वानर सेना ने नेत्र मूंदे, स्वयंप्रभा ने अपने योगबल से पूरे दल को अंतरिक्ष मार्ग से गुफा के बाहर सीधे समुद्र तट पर स्थित सह्य पर्वत के समीप पहुंचा दिया। जब वानरों ने अपनी आंखें खोलीं, तो वे स्वयं को विशाल नीले समुद्र के तट पर, खुली धूप और हवा के बीच पाकर विस्मयचकित रह गए, जबकि स्वयंप्रभा अपने योगबल से पुनः अंतर्ध्यान होकर अपने तपोवन लौट गईं।

Swayamprabha Story: श्री राम काज में स्वयंप्रभा के योगदान की युगांतरकारी प्रासंगिकता

मायावी गुफा से सकुशल बाहर आते ही वानर दल का मनोबल पुनः लौट आया। इसी समुद्र तट पर आगे चलकर उनकी भेंट गिद्धराज जटायु के ज्येष्ठ भ्राता संपाती से हुई, जिन्होंने अपनी दूरगामी दिव्य दृष्टि से लंका में अशोक वाटिका के नीचे बैठीं माता सीता की सटीक स्थिति का पता बताया। इसके पश्चात ही वीर हनुमान जी द्वारा सौ योजन विस्तृत समुद्र को लांघने की ऐतिहासिक घटना संभव हो सकी।

यदि उस संकटपूर्ण घड़ी में तपस्विनी स्वयंप्रभा ने वानर सेना को दिशा और आश्रय न दिया होता, तो वानर दल उसी मायावी ऋक्षबिल में प्राण त्याग चुका होता और सीता संधान का अभियान वहीं थम जाता। रामायण की यह अनकही कथा हमें यह गहरा आध्यात्मिक संदेश देती है कि जब उद्देश्य धर्म सम्मत और जनकल्याणकारी होता है, तो मार्ग में आने वाली जटिल से जटिल बाधाओं को दूर करने के लिए प्रकृति और ईश्वर किसी न किसी स्वयंप्रभा जैसी निस्वार्थ सत्ता को अवश्य माध्यम बना देते हैं। सेवा, संयम और परोपकार की साक्षात प्रतिमूर्ति स्वयंप्रभा का चरित्र रामायण की अखंड चेतना का एक अविभाज्य अंग है।

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