Petrol Diesel Price Hike: पेट्रोल डीजल महंगा होने के बाद भी तेल कंपनियों का संकट बरकरार, रोजाना हो रहा 750 करोड़ का भारी नुकसान

Petrol Diesel Price Hike: दाम बढ़ने के बाद भी तेल कंपनियों का घाटा बरकरार, रोज 750 करोड़ का नुकसान

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Petrol Diesel Price Hike: देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय सेहत में कोई बड़ा सुधार होता नहीं दिख रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक ऑयल मार्केटिंग कंपनियां अब भी रोजाना करीब 750 करोड़ रुपये का भारी घाटा उठा रही हैं। पश्चिम एशिया में जारी भीषण भू राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतों ने भारतीय ऊर्जा क्षेत्र की कमर तोड़ दी है, जिससे घरेलू स्तर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियों पर भारी वित्तीय दबाव बना हुआ है।

Petrol Diesel Price Hike: तेल कंपनियों को दाम बढ़ाने के बाद भी क्यों हो रहा है इतना बड़ा घाटा

केंद्र सरकार ने बीते 16 मई को देशभर में पेट्रोल और डीजल के दामों में 3 रुपये प्रति लीटर का इजाफा किया था। इस बढ़ोतरी से आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ जरूर बढ़ा, लेकिन सरकारी तेल कंपनियों को इससे मामूली राहत ही मिल सकी। दरअसल, पश्चिम एशिया संकट के चलते ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल के दाम लंबे समय से ऐतिहासिक ऊंचाई पर बने हुए हैं। इसके उलट भारतीय तेल कंपनियों ने फरवरी के आखिरी हफ्ते से लेकर 15 मई तक घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया था।

इतने लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखने का नतीजा यह हुआ कि कंपनियों का रोजाना का घाटा एक समय 1000 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच गया था। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि हालिया बढ़ोतरी के बाद दैनिक नुकसान घटकर 750 करोड़ रुपये जरूर हुआ है, लेकिन कंपनियां अब भी गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के साथ एलएनजी की कीमतों में आया उछाल कंपनियों की इनपुट कॉस्ट को लगातार बढ़ा रहा है।

पश्चिम एशिया का संकट कैसे बिगाड़ रहा है भारत का बजटीय गणित

पिछले करीब डेढ़ महीने से पश्चिम एशिया में जारी सैन्य और राजनीतिक गतिरोध के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह चरमरा गई है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशी बाजारों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों में पैदा हुई रुकावटों और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा और सबसे पहला असर भारत की सरकारी तेल कंपनियों पर पड़ता है।

दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के पेट्रोल पंपों पर सुबह से ही गाड़ियों की लंबी कतारें दिख रही हैं, जहां लोग बढ़े हुए दामों को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं। परिवहन क्षेत्र से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से माल ढुलाई महंगी होगी, जिसका असर आने वाले दिनों में रोजमर्रा की अन्य चीजों पर भी दिख सकता है। सोशल मीडिया पर भी ईंधन के बढ़ते दामों को लेकर आम जनता लगातार अपनी प्रतिक्रियाएं दे रही है, जिससे बाजार में एक तरह की अनिश्चितता का माहौल है।

क्या देश में ईंधन की किल्लत होने वाली है और सरकार का इस पर क्या रुख है

लगातार बढ़ते घाटे और अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के बीच देश में ईंधन की कमी को लेकर भी कई तरह की अफवाहें उड़ रही थीं। इन आशंकाओं को खारिज करते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय ने साफ किया है कि देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) की कोई किल्लत नहीं है। मंत्रालय की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि देश के सभी डिपो और रीफाइनरियों में पर्याप्त मात्रा में ईंधन का बफर स्टॉक मौजूद है।

रसोई गैस की आपूर्ति को लेकर संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने आंकड़े साझा करते हुए बताया कि पिछले 4 दिनों के भीतर देश में करीब 1.72 लाख एलपीजी सिलेंडरों की सफल डिलीवरी की गई है, जबकि इसी अवधि में लगभग 1.69 लाख नई बुकिंग दर्ज की गईं। इन आंकड़ों से साफ है कि मांग के मुकाबले देश में एलपीजी की सप्लाई चेन सुचारू रूप से काम कर रही है। सरकार और तेल विपणन कंपनियां संयुक्त रूप से हर राज्य के आपूर्ति नेटवर्क की पल-पल की निगरानी कर रही हैं ताकि कहीं भी सप्लाई चेन बाधित न हो।

Petrol Diesel Price Hike: क्या घाटे से उबरने के लिए कंपनियों को मिलेगा कोई विशेष राहत पैकेज

इस वित्तीय संकट के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या केंद्र सरकार इन घाटे में चल रही कंपनियों को उबारने के लिए कोई वित्तीय मदद देगी। सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, केंद्र सरकार फिलहाल ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को किसी भी तरह का बेलआउट या राहत पैकेज देने के मूड में नहीं है। सरकार का मानना है कि कंपनियों को मौजूदा बाजार स्थितियों के अनुरूप ही अपनी रणनीतियां तय करनी होंगी।

इस प्रशासनिक रुख के बाद आने वाले दिन तेल कंपनियों और आम उपभोक्ताओं दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं और पश्चिम एशिया का तनाव कम नहीं हुआ, तो आने वाले हफ्तों में तेल कंपनियों का घाटा फिर से बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में सरकारी तेल कंपनियों के पास खुद को वित्तीय रूप से सुरक्षित रखने के लिए घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।

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