Career Tips: मोटापे के कारण नौकरी मिलने के अवसर हुए कम, पुरुषों के करियर पर पड़ रहा है सबसे भारी असर
Career Tips: मोटापे के कारण नौकरी मिलने के अवसर हुए कम, पुरुषों के करियर पर पड़ रहा है सबसे भारी असर
Career Tips: जिस्मानी सेहत को लेकर होने वाली चर्चाओं में अमूल्य रूप से मधुमेह और दिल की बीमारियों का ही जिक्र सबसे पहले आता है। मगर हाल ही में सामने आए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस दायरे को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अब तक वजन के बढ़ने को सिर्फ अस्पताल के पर्चे और दवाइयों तक सीमित माना जाता था, पर हकीकत यह है कि यह किसी इंसान के दफ्तर और उसकी रोजी-रोटी पर भी सीधा प्रहार कर रहा है।
हाल ही में मेक्सिको में आयोजित ‘इंटरनेशनल कांग्रेस ऑन ओबेसिटी’ के दौरान एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। ब्रिटेन स्थित ‘यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क’ के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा डेटाबेस सामने रखा है जिसने पूरी दुनिया के श्रम बाजारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
Career Tips: क्या कहती है यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क की यह स्टडी?
इस बड़े अध्ययन को अंजाम देने वाले प्रमुख शोधकर्ता डॉ. अहरोन काट्ज और उनकी पूरी टीम ने मिलकर लगभग दो लाख चौरासी हजार लोगों के जीवन से जुड़े आंकड़ों की गहरी छानबीन की। इस दौरान केवल वजन मापने तक बात सीमित नहीं रखी गई, बल्कि हर शख्स के सामाजिक और आर्थिक बैकग्राउंड को भी कसौटी पर परखा गया ताकि तस्वीर बिल्कुल साफ उभर कर सामने आ सके।
नतीजों ने हर किसी को हैरान कर दिया। विश्लेषण में यह बात सामने आई कि जिन वयस्कों का वजन सामान्य श्रेणी में आता है, उनकी तुलना में अत्यधिक वजन यानी मोटापे से जूझ रहे लोगों के हाथ में नौकरी होने की संभावना करीब 4.2 प्रतिशत तक कम हो जाती है। सिर्फ ब्रिटेन के मौजूदा आंकड़ों का अगर आकलन किया जाए, तो वहां लगभग छह लाख ऐसे नागरिक हैं जो शारीरिक क्षमता या अन्य कारणों से नहीं, बल्कि सिर्फ अपने बढ़े हुए वजन के चलते रोजगार से दूर बैठे हैं।
कार्यस्थल पर भेदभाव और दो बड़े कारण
आखिर अधिक शारीरिक वजन किसी व्यक्ति के पेशेवर जीवन में इतनी बड़ी बाधा कैसे बन जाता है? इस सवाल का जवाब तलाशते हुए वैज्ञानिकों ने दो मुख्य बिंदुओं को रेखांकित किया है, जो इस पूरे संकट के पीछे सबसे बड़ी वजह हैं।
सबसे पहले आती हैं शारीरिक चुनौतियां। भारी शरीर के साथ काम करना अपने आप में एक थकाने वाली प्रक्रिया बन जाती है। शरीर में लगातार बना रहने वाला दर्द, जल्दी ऊर्जा खत्म होना, चलने-फिरने में कठिनाई और रातों की पूरी नींद न मिलना आम शिकायतें बन जाती हैं। इसके साथ ही कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएं व्यक्ति की कार्यक्षमता और एकाग्रता को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।
दूसरी और सबसे चिंताजनक बात वर्कप्लेस पर होने वाले पूर्वाग्रह और भेदभाव की है। नियुक्तियां करने वाले प्रबंधक अक्सर बिना किसी तथ्यात्मक आधार के यह धारणा बना लेते हैं कि भारी भरकम शरीर वाले लोग कम फुर्तीले या अपने काम के प्रति कम जिम्मेदार होते हैं। इसी नकारात्मक और पूर्वाग्रह से भरी सोच के कारण लोगों को न सिर्फ चयन प्रक्रिया में, बल्कि आगे चलकर प्रमोशन के मौकों पर भी पीछे धकेल दिया जाता है।
महिलाओं के मुकाबले पुरुषों पर भारी पड़ रही मार
इस पूरी रिसर्च का सबसे अप्रत्याशित पहलू यह रहा कि इस रोजगार संकट का सबसे बुरा प्रभाव महिलाओं पर नहीं, बल्कि पुरुषों पर पड़ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, जहां महिलाओं के मामले में मोटापे के कारण नौकरी मिलने की संभावनाओं में 2.1 प्रतिशत की कमी दर्ज की जाती है, वहीं पुरुषों के लिए यह भारी नुकसान सीधे तौर पर 6.6 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। हालांकि वैज्ञानिक अभी इस बात की गहराई से पड़ताल कर रहे हैं कि लिंग आधारित इस अंतर के पीछे सामाजिक या जैविक रूप से कौन से सटीक कारक काम कर रहे हैं, लेकिन यह चौकाने वाला फासला अपने आप में बहुत बड़ा संदेश देता है।
Career Tips: अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव
स्थिति की नजाकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंग्लैंड और वेल्स जैसे क्षेत्रों में काम करने की उम्र वाले प्रत्येक चार में से एक वयस्क आज मोटापे की चपेट में है। वर्तमान में ब्रिटेन की कुल रोजगार दर लगभग 75.5 प्रतिशत है, ऐसे में इस मोर्चे पर आने वाली जरा सी भी गिरावट अर्थव्यवस्था के पहिये को धीमा कर देती है।
मोटापे से ग्रस्त कर्मचारी अक्सर अधिक स्वास्थ्य अवकाश लेते हैं, जिससे उनकी व्यक्तिगत कमाई तो घटती ही है, साथ ही औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार भी मंद पड़ जाती है। ब्रिटेन की ‘नेशनल पहले से ही मोटापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज पर पानी की तरह पैसा बहा रही है, और रोजगार का यह संकट इस आर्थिक बोझ को कई गुना और अधिक बढ़ा रहा है।
Career Tips: क्या मेडिकल साइंस के पास है इसका कोई समाधान?
इस विकराल होती समस्या से पार पाने के लिए अब चिकित्सा जगत की निगाहें नई पीढ़ी की दवाइयों पर टिकी हैं। हाल ही में चर्चा में आई जीएलपी-1 जैसी वजन घटाने वाली आधुनिक दवाएं इस दिशा में एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी हैं। इसी कड़ी में मैनचेस्टर की सरकार ने एक बड़ा ट्रायल भी शुरू किया है, जिससे यह परखा जा सके कि क्या इन मेडिकल उपचारों के जरिए लोगों को उनका रोजगार बचाने या दोबारा काम पर लौटने में कोई मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों का अब यह साफ तौर पर कहना है कि मोटापे को केवल खानपान की लापरवाही या बुरी जीवनशैली का नतीजा मान लेना भूल होगी। यह एक गंभीर क्रॉनिक बीमारी का रूप ले चुका है, जिसका इलाज महज ‘कम खाओ और कसरत करो’ जैसे उपदेशों से संभव नहीं है। इसके लिए मरीजों को सही चिकित्सा परामर्श, आधुनिक दवाइयों और लंबी अवधि की मेडिकल देखरेख की आवश्यकता है ताकि न सिर्फ उनका शरीर स्वस्थ हो सके, बल्कि उनका करियर भी सुरक्षित रह सके।
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