Bombay History: मुंबई कैसे बना, सात द्वीपों को जोड़कर ब्रिटिश काल में गढ़ा गया सपनों का शहर

Bombay History: मुंबई कैसे बना, सात द्वीपों को जोड़कर ब्रिटिश काल में गढ़ा गया सपनों का शहर

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Bombay History: मुंबई को आज देश की वित्तीय राजधानी और सपनों का शहर कहा जाता है। फिल्मों, समुद्र तटों और व्यस्त सड़कों के बीच कम लोग यह पूछते हैं कि यह महानगर पहले द्वीपों का समूह था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मुंबई महिम, वरली, परेल, मजगांव, बॉम्बे, लिटिल कोलाबा और कोलाबा जैसे सात द्वीपों को मिलाकर बना। इन द्वीपों के बीच पानी था। ब्रिटिश शासन ने 1782 में इन्हें जोड़ने का बड़ा काम शुरू किया। परियोजना का नाम हॉर्नबी वेलार्ड बताया गया है। गवर्नर विलियम हॉर्नबी के नेतृत्व में यह काम 1838 तक पूरा हुआ और खर्च एक लाख पाउंड आया। उससे पहले 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स की शादी पुर्तगाल की राजकुमारी कैटरीना डे ब्रगेंजा से हुई। दहेज में बंबई मिला, जो बाद में मुंबई कहलाया। 1668 में यह इलाका ईस्ट इंडिया कंपनी के पास चला गया। यही क्रम आज के जुड़े हुए शहर की नींव बना।

सात द्वीपों वाला पुराना स्वरूप

आज जो मुंबई एक फैला हुआ महानगर दिखता है, वह शुरू से एक टुकड़े में नहीं था। महिम, वरली, परेल, मजगांव, बॉम्बे, लिटिल कोलाबा और कोलाबा अलग-अलग टापू थे। कई स्थानीय लोग भी इस बात से अनजान रहते हैं।

इन द्वीपों के बीच समुद्री पानी भरा रहता था। आवाजाही नावों और छोटे रास्तों पर निर्भर थी। ज्वार आने पर कुछ हिस्से और कट जाते थे। इसलिए बस्ती सीमित रहती थी और व्यापार भी मौसम के हिसाब से चलता था।

बाद में यही सात नाम शहर के प्रमुख इलाकों में बदल गए। कोलाबा और बॉम्बे दक्षिणी छोर से जुड़े। वरली और महिम पश्चिम की ओर पहचाने गए। परेल और मजगांव भी आज घने शहरी क्षेत्र हैं। नाम बचे रहे, पानी सिमट गया।

पुर्तगाली अधिकार और दहेज में मिला बंबई

सत्रहवीं सदी में इस क्षेत्र पर पुर्तगालियों का नियंत्रण बताया जाता है। स्रोत जानकारी के अनुसार 1662 के आसपास पुर्तगाली कब्जा था। यूरोपीय शक्तियां समुद्री व्यापार के लिए ऐसे बंदरगाहों को महत्व देती थीं।

1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स ने पुर्तगाल की राजकुमारी कैटरीना डे ब्रगेंजा से विवाह किया। इस विवाह में दहेज के रूप में बंबई अंग्रेजों को मिला। यही बंबई बाद में मुंबई के नाम से जाना गया।

दहेज में शहर मिलना आज अजीब लगता है, उस काल में यह कूटनीति का हिस्सा था। यूरोपीय राजघराने व्यापारिक ठिकाने इसी तरह हाथों में लेते थे। बंबई की भौगोलिक स्थिति बंदरगाह के लिए अनुकूल मानी गई। कुछ वर्षों बाद स्वामित्व फिर बदला।

ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में गया शहर

1668 में मुंबई ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में चला गया। कंपनी व्यापार के साथ प्रशासन भी संभालने लगी। बंदरगाह को उपयोगी बनाने के लिए जमीन और संपर्क जरूरी थे। बिखरे द्वीप इस राह में बाधा थे।

कंपनी को गोदाम, छावनी और आबादी के लिए सतत भूमि चाहिए थी। ज्वार का पानी बस्तियों में घुसता था। इसलिए बाद के दशकों में द्वीपों को जोड़ने की योजना जन्म ले सकी। राजनीतिक अधिकार के बाद भौतिक निर्माण आया।

यह बदलाव शहर की दिशा तय करने वाला सिद्ध हुआ। जो इलाका पहले बिखरा हुआ द्वीप समूह था, वह धीरे-धीरे एक प्रशासनिक इकाई बनने लगा। व्यापार बढ़ने के साथ आबादी भी उन्हीं जुड़े हिस्सों में सिमटती गई।

हॉर्नबी वेलार्ड परियोजना की शुरुआत

1782 में गवर्नर विलियम हॉर्नबी ने सात द्वीपों को जोड़ने का काम शुरू कराया। परियोजना हॉर्नबी वेलार्ड के नाम से जानी गई। द्वीपों के बीच भरे पानी की जगह रेत और मिट्टी डालकर भूमि तैयार की गई।

उस समय इसे बहुत बड़ा अभियान माना गया। समुद्र से जमीन छीनना आसान नहीं था। ज्वार, कीचड़ और लगातार पानी की आवक काम रोकती थी। फिर भी योजना जारी रही क्योंकि बंदरगाह शहर को एक होना जरूरी था।

यह काम केवल सड़क बनाने जितना सरल नहीं था। पानी के रास्ते बंद करने थे, किनारे मजबूत करने थे और नई भूमि को बसने लायक बनाना था। पूरा उपक्रम वर्षों तक चला। स्रोत के अनुसार यह दुनिया के बड़े कार्यों में गिना गया।

1838 तक जुड़ गए द्वीप और एक लाख पाउंड खर्च

हॉर्नबी वेलार्ड 1838 तक पूरा हुआ। आधा शताब्दी से कुछ कम समय में सातों द्वीप एक-दूसरे से जुड़ गए। अब नाव की बजाय जमीन पर चलकर एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुंचना संभव हुआ।

पूरे प्रोजेक्ट पर एक लाख पाउंड खर्च बताया गया है। उस दौर के हिसाब से यह बड़ी राशि थी। खर्च भूमि भरने, बांध बनाने और लंबे समय तक मजदूरी कराने में गया होगा। नतीजा यह निकला कि शहर का नक्शा स्थायी रूप से बदल गया।

जुड़ने के बाद व्यापार, प्रशासन और आबादी एक ही भूभाग पर फैलने लगी। जो जगह पहले पानी थी, वह बाद में सड़क, बस्ती और गोदाम बनती गई। आज का घनत्व उसी जुड़े हुए आधार पर खड़ा है।

सपनों का शहर बनने की नींव

मुंबई को कला नगरी, ग्लैमरस शहर और भारत का मैनहटन तक कहा जाता है। यह छवि अचानक नहीं बनी। बंदरगाह, बाद में उद्योग और फिर सिनेमा ने लोगों को खींचा। मगर भौतिक रूप से शहर पहले जुड़ना था।

सात द्वीप एक न होते तो आज जैसी लगातार सड़कें और घनी आबादी संभव नहीं होती। पर्यटक समुद्र तट, मंदिर, रेस्तरां और फिल्म सिटी देखने आते हैं। उनके पैर उसी भूमि पर पड़ते हैं जो कभी पानी के टुकड़ों में बंटी थी।

महानगर की भागदौड़ उसी इतिहास की अगली परत है। सपनों का शहर कहने के पीछे अवसरों की भीड़ है। अवसर तभी केंद्रित हुए जब बिखरे द्वीप एक बाजार और एक बंदरगाह बन गए।

इतिहास से आज के मुंबई तक

आधुनिक मुंबई की भीड़, लोकल ट्रेन और ऊंची इमारतें बाद की सदियों की कहानी हैं। स्रोत जानकारी का केंद्र बिंदु यह है कि आधार ब्रिटिश काल की जोड़ परियोजना और उससे पहले के यूरोपीय हस्तांतरण में है। पुर्तगाली दहेज, कंपनी शासन और हॉर्नबी वेलार्ड तीन पड़ाव हैं।

शहर के नाम भी बदलते रहे। बंबई से मुंबई तक की यात्रा भाषा और पहचान से जुड़ी है। भूगोल वही रहा जो रेत भरकर तैयार किया गया। कोलाबा से महिम तक का फैलाव उसी पुराने नक्शे की याद दिलाता है।

आज जब लोग मुंबई को तैयारशुदा महानगर मानकर पहुंचते हैं, तब यह जानना जरूरी है कि इसकी जमीन भी बनाई गई थी। द्वीप प्रकृति ने दिए, जोड़ इंसानों ने किया। यही फर्क मुंबई को अन्य पुराने नगरों से अलग करता है।

मुंबई के वर्तमान रूप के पीछे सात द्वीपों की कहानी है। महिम, वरली, परेल, मजगांव, बॉम्बे, लिटिल कोलाबा और कोलाबा पहले अलग थे। 1661 के विवाह में बंबई दहेज में गया, 1668 में ईस्ट इंडिया कंपनी के पास आया और 1782 में शुरू हुआ हॉर्नबी वेलार्ड 1838 में पूरा हुआ। एक लाख पाउंड के उस काम ने पानी के अंतराल पाट दिए। सपनों का शहर उसी जुड़े हुए भूभाग पर आगे बढ़ा। पर्यटक और नए बसने वाले जब समुद्र किनारे खड़े होते हैं, तब उनके नीचे की जमीन इतिहास की उस परियोजना की देन है जिसने बिखरे टापुओं को एक मुंबई बनाया।

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