पत्नी की मानसिक बीमारी को तलाक का आधार नहीं बना सकते, पति की अपील खारिज
झारखंड हाईकोर्ट ने CISF जवान की तलाक याचिका खारिज करते हुए कहा कि केवल मानसिक बीमारी का आरोप तलाक के लिए पर्याप्त नहीं है।
Jharkhand High Court: झारखंड उच्च न्यायालय ने वैवाहिक संबंधों और तलाक के आधारों से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि विवाह केवल सुख और अच्छे दिनों का समझौता नहीं है, बल्कि जीवन की विपरीत परिस्थितियों, संकटों और गंभीर बीमारियों में भी एक-दूसरे का संबल बनकर खड़े रहने का पवित्र बंधन है। पत्नी पर गंभीर मानसिक बीमारी और क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग करने वाले सीआईएसएफ (CISF) जवान की अपील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी जीवनसाथी की बीमारी अपने आप में विवाह विच्छेद का वैधानिक आधार नहीं बन सकती।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने इस मामले में चतरा प्रधान पारिवारिक न्यायालय (फैमिली कोर्ट) द्वारा पूर्व में दिए गए निर्णय को पूरी तरह न्यायसंगत ठहराते हुए बरकरार रखा है। पीठ ने रेखांकित किया कि जब तक किसी मानसिक विकार का स्वरूप इतना असाध्य और गंभीर न हो कि साथ रहना पूरी तरह असंभव हो जाए, तब तक कानूनन तलाक की अनुमति नहीं दी जा सकती।
Jharkhand High Court: शादी के आठ साल बाद मानसिक विकार और क्रूरता का आरोप
यह कानूनी विवाद चतरा जिले के एक दंपती से संबंधित है, जिनका विवाह हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार 31 जनवरी 2016 को संपन्न हुआ था। दांपत्य जीवन के दौरान दोनों का एक पुत्र भी हुआ। याचिकाकर्ता पति केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में सेवारत था और उसकी पदस्थापना राजस्थान के कोटा में थी। पति ने आरोप लगाया था कि विवाह के प्रारंभिक दिनों से ही उसकी पत्नी का व्यवहार असामान्य और विक्षिप्त जैसा था। याचिका में दावा किया गया कि वह बिना किसी प्रसंग के अचानक जोर-जोर से हंसने लगती थी, एकांत में स्वयं से बातें करती थी और सगे-संबंधियों के सामने अप्रत्याशित आचरण करती थी।
पति का यह भी गंभीर आरोप था कि विवाह तय करते समय ससुराल पक्ष ने जानबूझकर पत्नी की इस तथाकथित मानसिक व्याधि के तथ्य को छिपाया था। इन्हीं आधारों का हवाला देते हुए उसने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैवाहिक संबंध समाप्त करने की गुहार लगाई थी। इसके विपरीत, पत्नी ने अदालत में इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पति और उसके ससुराल वाले लगातार पांच लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग कर रहे थे और मांग पूरी न होने पर उसे प्रताड़ित कर घर से निकाल दिया गया।
फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचा था पति
पति ने चतरा की पारिवारिक अदालत में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) (मानसिक एवं शारीरिक क्रूरता) और धारा 13(1)(iii) (असाध्य मानसिक विकार अथवा विकृतचित्तता) के अंतर्गत तलाक की अर्जी दाखिल की थी। भारतीय वैवाहिक कानून के तहत ये दोनों धाराएं तलाक के वैध आधार हैं, बशर्ते इनके समर्थन में अकाट्य साक्ष्य प्रस्तुत किए जाएं।
लंबी सुनवाई के उपरांत चतरा फैमिली कोर्ट ने 7 सितंबर 2024 को पति की याचिका को आधारहीन पाते हुए निरस्त कर दिया था। प्रधान न्यायाधीश ने माना था कि वादी पति अपने दावों की पुष्टि के लिए आवश्यक कानूनी साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा है। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश के विरुद्ध झारखंड उच्च न्यायालय में प्रथम अपील दाखिल की थी, जिस पर खंडपीठ ने दोनों पक्षों के विधिक तर्कों, गवाहों के बयानों और मेडिकल दस्तावेजों का सूक्ष्म विश्लेषण किया।
मेडिकल बोर्ड की क्लीनचिट और साक्ष्यों की कमी बनी आधार
झारखंड उच्च न्यायालय ने पत्रावली के परीक्षण के दौरान पाया कि पति और उसके गवाह अदालत में ऐसा कोई ठोस विवरण या साक्ष्य नहीं दे सके, जिससे पत्नी द्वारा किसी स्पष्ट शारीरिक हमले, गाली-गलौज अथवा अनवरत मानसिक प्रताड़ना की पुष्टि होती हो। अदालत ने कहा कि लगाए गए आरोप अत्यंत सामान्य और अस्पष्ट प्रकृति के हैं, जिनके आधार पर क्रूरता का वैधानिक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
मानसिक अस्वस्थता के दावे की पड़ताल करते हुए खंडपीठ ने प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्टों का अवलोकन किया। पति ने वर्ष 2018 की एक निजी मनोवैज्ञानिक जांच रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें केवल सिजोफ्रेनिया के लक्षणों की संभावना जताई गई थी, परंतु उसमें रोग के स्थायी अथवा लाइलाज होने का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं था।
इसके उलट, रांची स्थित प्रतिष्ठित मानसिक स्वास्थ्य संस्थान रिनपास (RINPAS) के विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड द्वारा की गई व्यापक चिकित्सकीय जांच रिपोर्ट ने पूरे मामले की दिशा बदल दी। विशेषज्ञ बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट प्रमाणित किया कि महिला के भीतर किसी भी प्रकार की गंभीर अथवा असाध्य मानसिक विकृति के लक्षण नहीं पाए गए हैं। उच्च न्यायालय ने रिनपास के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए पति के दावों को खारिज कर दिया।
बीमारी में सहारा बनना वैवाहिक दायित्व, सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों का संदर्भ देते हुए कहा कि भारतीय समाज में विवाह एक संस्कार है, न कि कोई साधारण संविदा। जीवन की गाड़ी में जब एक साथी अस्वस्थ हो, तो दूसरे का कर्तव्य उसकी सेवा और उपचार कराना होता है, न कि उसे लाचार छोड़ देना।
पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत धारा 13(1)(iii) के अंतर्गत तलाक का डिक्री केवल तभी दी जा सकती है जब दो शर्तें अनिवार्य रूप से सिद्ध हों: पहला, मानसिक विकार असाध्य (Incurable) हो, और दूसरा, वह इस स्तर का हो कि याचिकाकर्ता से दूसरे साथी के साथ रहने की युक्तिसंगत अपेक्षा न की जा सके। केवल मामूली भावनात्मक असंतुलन या असामान्य व्यवहार को तलाक का हथियार नहीं बनाया जा सकता।
Jharkhand High Court: बच्चे का पालन-पोषण और भरण-पोषण से मुंह मोड़ने पर भी टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने इस मानवीय पहलू पर भी गंभीरता से विचार किया कि पत्नी विगत कई वर्षों से विपरीत आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद अपने बेटे का भरण-पोषण अकेले कर रही है। उसने अदालत के समक्ष बार-बार अपने पति के साथ फिर से वैवाहिक जीवन शुरू करने और घर बसाने की इच्छा व्यक्त की थी। वहीं दूसरी ओर, पति ने एक सरकारी बल में नियमित आय होने के बावजूद अपनी पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण के प्रति घोर उदासीनता दिखाई।
सभी कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं के समग्र मूल्यांकन के पश्चात झारखंड हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पति न तो क्रूरता साबित कर सका और न ही असाध्य मानसिक बीमारी का प्रमाण दे पाया। इसी के साथ अदालत ने पति की प्रथम अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए चतरा फैमिली कोर्ट के निर्णय पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी।
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