कानपुर-लखनऊ में दिवाली पर क्यों भरी जाती है कुल्हिया-चुकिया? जानें मिट्टी के बर्तनों की अनोखी परंपरा

दिवाली पर अवध और कानपुर क्षेत्र के कई परिवारों में कुल्हिया-चुकिया और मिट्टी के घरौंदे सजाने की परंपरा निभाई जाती है।

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Diwali 2026: दीपावली का महापर्व आते ही देश भर में दीपों की जगमगाहट, रंगोली की छटा और माता लक्ष्मी व भगवान गणेश के विधि-विधान से पूजन की तैयारियां तेज हो जाती हैं। भारतीय संस्कृति में इस पर्व को सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य का उत्सव माना गया है। हालांकि, उत्तर प्रदेश के अवध और मध्य क्षेत्र, विशेष रूप से लखनऊ, कानपुर और इनके निकटवर्ती जनपदों में दिवाली का उल्लास एक विशिष्ट लोक परंपरा के बिना अधूरा समझा जाता है। यहां दीपावली की शाम लक्ष्मी पूजन के साथ ‘कुल्हिया-चुकिया’ भरने और मिट्टी के घरौंदे सजाने की प्राचीन रस्म बड़े भक्तिभाव व उमंग से निभाई जाती है। इस विधान में मिट्टी के लघु बर्तनों को धान के लावे, खील, बताशे, शक्कर की मिठाइयों और सिक्कों से भरा जाता है। यह परंपरा केवल एक धार्मिक विधान भर नहीं है, बल्कि यह हमारे लोक-जीवन, कृषि संस्कृति और गृहस्थ जीवन की संपन्नता का गहरा प्रतीक है।

Diwali 2026: क्या होती है कुल्हिया-चुकिया और घरौंदा की रस्म?

कुल्हिया और चुकिया कुम्हार द्वारा चाक पर गढ़ी गई मिट्टी की छोटी मटकियां और बर्तन होते हैं। आकार में यह छोटे घड़े, कुल्हड़ और ढक्कनदार पात्र जैसे दिखाई देते हैं। दिवाली के पावन अवसर पर बाजारों में मिट्टी के दीयों के साथ-साथ इन छोटे बर्तनों के पूरे सेट उपलब्ध होते हैं।

इस रस्म के अंतर्गत इन छोटे पात्रों को खील, बताशे, धान के नए लावे (फरही) और पारंपरिक मिठाइयों से ऊपर तक भरा जाता है। कई घरों में कुल्हिया-चुकिया के साथ मिट्टी का छोटा घरौंदा भी स्थापित किया जाता है। घरौंदे को रंगों, फूलों और दीपों से एक संपूर्ण घर की भांति सजाया जाता है और उसके आसपास इन बर्तनों को व्यवस्थित रूप से रखा जाता है। यह विधान घर की गृहस्थी के सुचारू संचालन और पारिवारिक सुख-शांति की मंगलकामना का द्योतक है।

माता अन्नपूर्णा और लक्ष्मी जी की कृपा का प्रतीक है यह विधान

सनातन परंपरा में माता लक्ष्मी को केवल स्वर्ण, चांदी या मुद्रा की देवी नहीं, बल्कि ‘धान्य लक्ष्मी’ और माता ‘अन्नपूर्णा’ का स्वरूप भी माना गया है। प्राचीन कृषि प्रधान समाज में फसल की पहली उपज को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना परम कर्तव्य माना जाता था। धान की नई कटाई के बाद प्राप्त होने वाले लावे और खील से इन पात्रों को भरने का सीधा आशय घर के अन्न भंडार और धन-धान्य को सदैव अक्षुण्ण बनाए रखने की प्रार्थना है।

मान्यता है कि कार्तिक अमावस्या की पावन निशा में जब माता लक्ष्मी का धरा पर आगमन होता है, तो वे गृहस्थ के संचित आचरण, स्वच्छता और उसके भंडार की संपन्नता को देखती हैं। कुल्हिया-चुकिया को लबालब भरकर रखने का भाव यही है कि आगामी पूरे वर्ष परिवार में कभी अन्न का अभाव न रहे और दरिद्रता का समूल नाश हो। पंचतत्वों में से एक ‘मिट्टी’ से बने ये बर्तन इस सत्य को भी उद्घाटित करते हैं कि जीवन की वास्तविक समृद्धि प्रकृति से जुड़कर सादगीपूर्ण जीवन जीने में ही निहित है।

बहनों, बेटियों और भाई-बहन के स्नेह की पावन कड़ी

इस लोक परंपरा की सबसे भावुक और सुंदर विशेषता यह है कि इसमें घर की बेटियों और बहनों की प्रमुख भूमिका होती है। अवध और पूर्वांचल सहित बिहार के कई अंचलों में यह मान्यता है कि घर की बेटियां साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप होती हैं।

पूजा के समय बहनें अपने हाथों से कुल्हिया-चुकिया को सजाती हैं और मंगल लोकगीतों का गायन करते हुए अपने भाइयों की दीर्घायु, स्वास्थ्य, विद्या और समृद्धि की कामना करती हैं। पूजा संपन्न होने के उपरांत इन बर्तनों में भरा प्रसाद परिवार के सदस्यों, विशेषकर भाइयों को भेंट किया जाता है। कई स्थानों पर भाई इसके बदले अपनी बहनों को स्नेह स्वरूप उपहार या धन अर्पित करते हैं। इस प्रकार यह अनुष्ठान केवल धन की पूजा न रहकर पारिवारिक आत्मीयता और भाई-बहन के पवित्र स्नेह को प्रगाढ़ करने का माध्यम बन जाता है।

Diwali 2026: आधुनिक दौर में परंपरा का संरक्षण और सांस्कृतिक दायित्व

पूर्व के समय में दीपावली से कई दिन पूर्व ही घर की महिलाएं और बच्चे मिलकर घरौंदे बनाने और मिट्टी के बर्तनों को सजाने में जुट जाते थे। मोहल्लों में लोकगीतों की मधुर ध्वनियां त्योहार के वातावरण को एक अलग ही दिव्यता प्रदान करती थीं। यद्यपि भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली और अपार्टमेंट संस्कृति के कारण इन रस्मों का विस्तार कुछ सीमित हुआ है, फिर भी लखनऊ और कानपुर के पारंपरिक परिवारों ने इस लोक धरोहर को पूरी निष्ठा के साथ जीवित रखा हुआ है।

आज भी दिवाली की हाट में मिट्टी के दीयों के साथ कुल्हिया-चुकिया की खरीदारी उतनी ही श्रद्धा से की जाती है। यह रस्म हमें अपनी जड़ों, माटी की सुगंध और पूर्वजों द्वारा स्थापित उन जीवन-मूल्यों की याद दिलाती है, जो परिवार को एक सूत्र में बांधने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश देते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस आलेख में प्रस्तुत विवरण क्षेत्रीय लोक मान्यताओं, सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों, जनपदों और पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजन पद्धति और रस्मों में सूक्ष्म भिन्नता हो सकती है।

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