‘आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं’, आरक्षित सीटों के रोटेशन पर CJI सूर्यकांत की टिप्पणी, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की खारिज

लोकसभा और विधानसभा की SC/ST आरक्षित सीटों को हर चुनाव में बदलने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी।

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SC/ST Reservation: देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के निरंतर रोटेशन (बारी-बारी से बदलने) की मांग को लेकर दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद स्पष्ट रुख अपनाया है। बुधवार, 4 नवंबर को मामले की सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता द्वारा बार-बार कानूनी हस्तक्षेप की गुहार लगाने पर सीजेआई ने चुटीले अंदाज में टिप्पणी करते हुए कहा कि आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि चुनाव क्षेत्रों के आरक्षण के नियमों में बदलाव करना अथवा रोटेशन प्रणाली को लागू करना विशुद्ध रूप से देश की संसद और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के विधायी अधिकार क्षेत्र का विषय है, जिसमें न्यायपालिका अपनी ओर से कोई नया कानून नहीं जोड़ सकती।

SC/ST Reservation: सुल्तानपुर की कादीपुर सीट से जुड़ा है पूरा मामला

यह कानूनी विवाद उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद की 191-कादीपुर विधानसभा सीट के एक पंजीकृत मतदाता जगदीश सिंह द्वारा उठाए गए सवालों से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि कादीपुर विधानसभा क्षेत्र पिछले लगभग सात दशकों से निरंतर अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए ही आरक्षित चला आ रहा है।

याचिका में दलील दी गई कि किसी एक निश्चित विधानसभा क्षेत्र को दशकों तक स्थायी रूप से आरक्षित रखने से स्थानीय सामान्य वर्ग के नागरिकों के चुनाव लड़ने के लोकतांत्रिक अधिकार सीमित हो जाते हैं। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने यह भी पक्ष रखा कि यदि आरक्षित सीटों का समय-समय पर रोटेशन किया जाए, तो जिले के अन्य क्षेत्रों में निवासरत अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के नए एवं विभिन्न उम्मीदवारों को भी चुनावी राजनीति में सक्रिय भागीदारी का समान अवसर मिलेगा। याचिका में इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 19 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से जोड़ते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व आदेश को चुनौती दी गई थी।

सीजेआई सूर्यकांत की मौखिक टिप्पणी: ‘संसद और जनप्रतिनिधियों के पास जाइए’

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता को यह समझाने का प्रयास किया कि न्यायालय का दायित्व संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या करना और उन्हें लागू कराना है, न कि स्वयं नीतिगत कानून बनाना।

जब याचिकाकर्ता ने बार-बार रोटेशन व्यवस्था की अनिवार्यता पर जोर दिया, तब सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि इस प्रकार के नीतिगत और विधायी बदलाव के लिए न्यायालय उचित मंच नहीं है। सीजेआई ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं; यदि इस विषय पर कोई परिवर्तन चाहते हैं तो आपको संसद और अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास जाना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी करते हुए यह भी जोड़ा कि वर्तमान समय में विरोध-प्रदर्शन और अपनी मांगों को जनप्रतिनिधियों के समक्ष रखने के कई लोकतांत्रिक तरीके उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग इस मांग को उठाने के लिए किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक और परिसीमन नियमों की व्याख्या की

शीर्ष अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए परिसीमन अधिनियम और संवैधानिक अनुच्छेदों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। न्यायालय ने रेखांकित किया कि परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) के स्पष्ट प्रावधानों के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विधानसभा और लोकसभा सीटें उन भौगोलिक क्षेत्रों में आरक्षित की जाती हैं, जहां राज्य के भीतर संबंधित समुदायों की जनसंख्या का अनुपात तुलनात्मक रूप से सर्वाधिक होता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 (लोकसभा में आरक्षण) और अनुच्छेद 332 (राज्य विधानसभाओं में आरक्षण) के तहत सीटों के आरक्षण का प्रावधान तो सुनिश्चित किया गया है, किंतु संविधान निर्माताओं अथवा संसद ने इनमें प्रत्येक चुनाव में अनिवार्य रोटेशन लागू करने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं रखी है। जब तक संसद स्वयं परिसीमन कानून अथवा जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन कर ऐसी व्यवस्था नहीं बनाती, तब तक अदालतें अपनी न्यायिक शक्तियों के जरिए इसमें कोई समानांतर नियम नहीं जोड़ सकतीं।

स्थानीय निकायों और संसद-विधानसभा के नियमों में अंतर

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने स्थानीय स्वशासन यानी पंचायती राज और नगर निकायों की चुनाव प्रणाली का उदाहरण प्रस्तुत किया था। उन्होंने संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के तहत शामिल किए गए अनुच्छेद 243D (पंचायतों में आरक्षण) और अनुच्छेद 243T (नगर पालिकाओं में आरक्षण) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जब ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत और नगर पालिका अध्यक्ष पदों पर चक्रानुक्रम (रोटेशन) प्रणाली सफलतापूर्वक लागू है, तो उसी तर्ज पर विधायिका की सीटों पर भी इसे क्यों नहीं लागू किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि संविधान ने स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं और देश की संसद तथा राज्य विधानसभाओं के लिए अलग-अलग और स्वतंत्र चुनावी तंत्र की व्यवस्था की है। स्थानीय निकायों के प्रावधानों को स्वतः ही लोकसभा या विधानसभा की सीटों पर अध्यारोपित (Superimpose) नहीं किया जा सकता।

SC/ST Reservation: इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश बरकरार, आगे का रास्ता क्या है?

सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा दिए गए उस पूर्व आदेश को पूरी तरह विधि सम्मत मानते हुए बरकरार रखा, जिसमें याचिका को पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम आदेश के बाद यह तय हो गया है कि वर्तमान विधिक व्यवस्था के तहत लोकसभा और विधानसभा में आरक्षित सीटों का रोटेशन स्वतः या अदालती हस्तक्षेप से संभव नहीं है।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ता या कोई भी अन्य नागरिक इस विषय पर कानून में संशोधन कराने के लिए स्वतंत्र है। इसके लिए उन्हें अपने क्षेत्र के संसद सदस्यों, संसदीय समितियों अथवा विधि आयोग के समक्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करना होगा, ताकि भविष्य में परिसीमन या चुनाव सुधार विधेयकों पर चर्चा के दौरान इस विषय पर संसद विचार कर सके।

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