पत्रकार की पत्नी के इलाज का खर्च देने से इनकार नहीं कर सकती दिल्ली सरकार, 11.83 लाख रुपये चुकाने का आदेश
दिल्ली हाई कोर्ट ने मान्यता प्राप्त पत्रकार रविंदर गुप्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए दिल्ली सरकार को 11,83,105.21 रुपये की चिकित्सा प्रतिपूर्ति आठ सप्ताह में करने का निर्देश दिया।
Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाले फैसले में व्यवस्था दी है कि आपातकालीन चिकित्सा उपचार के मामलों में किसी मान्यता प्राप्त पत्रकार को उसके वैध चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति से केवल संकीर्ण तकनीकी आधारों पर वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने दिल्ली सरकार को कड़ा निर्देश देते हुए एक वरिष्ठ पत्रकार की पत्नी के इलाज पर खर्च हुए 11.83 लाख रुपये से अधिक की पूरी धनराशि का भुगतान आठ सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब किसी सरकारी अस्पताल में अनिवार्य सुपर-स्पेशियलिटी सुविधा उपलब्ध न हो और मरीज की जान बचाने के लिए उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़े, तो संबंधित कल्याणकारी नियमों की व्याख्या मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण से की जानी चाहिए।
Delhi High Court: जीबी पंत अस्पताल से रेफरल और दावे का पूरा घटनाक्रम
यह कानूनी विवाद मान्यता प्राप्त पत्रकार रविंदर गुप्ता की याचिका से जुड़ा हुआ है। उनकी पत्नी की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ने पर उन्हें तत्काल दिल्ली सरकार के प्रमुख गोविंद बल्लभ पंत (जीबी पंत) अस्पताल ले जाया गया था। हालांकि, अस्पताल में उस समय आपातकालीन वैस्कुलर सर्जरी (Vascular Surgery) की समुचित सुविधा उपलब्ध नहीं थी, जिसके कारण डॉक्टरों ने स्थिति की नाजुकता को देखते हुए मरीज को अन्यत्र उच्च केंद्र में रेफर कर दिया।
मरीज की जान जोखिम में होने के कारण परिजनों ने उन्हें तुरंत सर गंगा राम अस्पताल और सर गंगा राम सिटी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां उनकी जटिल सर्जरी और उपचार संपन्न हुआ। इसके पश्चात पत्रकार ने दिल्ली प्रेस रिपोर्टर्स मेडिकल सहायता योजना के तहत कुल 11,83,105.21 रुपये के चिकित्सा बिलों की प्रतिपूर्ति के लिए दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवा निदेशालय (DGHS) के समक्ष विधिवत दावा प्रस्तुत किया। परंतु, दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने 21 जुलाई 2025 को एक पत्र जारी कर इस दावे को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि उपचार की प्रकृति आपातकालीन श्रेणी में नहीं आती थी।
दिल्ली हाई कोर्ट का कड़ा रुख और तार्किक टिप्पणी
स्वास्थ्य विभाग के इस मनमाने रवैये के विरुद्ध पत्रकार ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मरीज को सरकारी स्वास्थ्य तंत्र में समय पर आवश्यक जीवनरक्षक इलाज नहीं मिल सका था। याचिकाकर्ता ने यह भी प्रमाणित किया कि संबंधित समयावधि में कई सरकारी अस्पतालों की नियमित ओपीडी और सर्जरी सेवाएं कोविड-19 महामारी के विशेष प्रबंधन के कारण अत्यधिक सीमित थीं, जिससे निजी अस्पताल का रुख करना परिवार की विवशता बन गया था।
इसके अलावा, उच्च न्यायालय ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि निजी अस्पताल द्वारा जारी किए गए आपातकालीन प्रमाणपत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि मरीज की स्थिति अत्यंत नाजुक थी और उसे अविलंब भर्ती कर सर्जरी की आवश्यकता थी। अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि दिल्ली सरकार की ओर से याचिका में लगाए गए ठोस तथ्यों का खंडन करने के लिए कोई आधिकारिक जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) तक दाखिल नहीं किया गया था।
1955 के ऐतिहासिक नियम और 2011 की अधिसूचना की व्यावहारिक व्याख्या
अदालत ने अपने विधिक निष्कर्ष में दिल्ली प्रेस रिपोर्टर्स एंड मेडिकल एड रूल्स, 1955 तथा 15 नवंबर 2011 को जारी अधिसूचना के नियम-7 के विधिक मंतव्य को विस्तार से स्पष्ट किया। इस नियम के तहत मान्यता प्राप्त पत्रकारों और उनके आश्रित परिजनों को आपातकालीन अथवा जीवनरक्षक उपचार की स्थिति में निजी मान्यता प्राप्त चिकित्सालयों में इलाज कराने पर पूर्ण चिकित्सा प्रतिपूर्ति का वैधानिक अधिकार प्रदान किया गया है।
नियम-7 में यह प्रावधान भी सम्मिलित है कि यदि सरकारी अस्पतालों में हड़ताल जैसी असाधारण स्थिति हो, तो निजी अस्पतालों में आपात उपचार की अनुमति होगी। अदालत ने इसकी व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि कानून की भाषा केवल ‘हड़ताल’ शब्द तक सीमित नहीं मानी जा सकती; यदि सरकारी अस्पताल में अनिवार्य विशेषज्ञता का अभाव है या महामारी जनित प्रतिबंधों के कारण चिकित्सा सेवाएं अवरुद्ध हैं, तो वह स्थिति भी समान विधिक सुरक्षा की हकदार है। नियमों का उद्देश्य पत्रकारों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा की सामाजिक गारंटी देना है, न कि लालफीताशाही के जरिए उन्हें संकट में छोड़ना।
सरकार का आदेश रद्द, आठ सप्ताह में पूर्ण भुगतान का निर्देश
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए अपने निर्णय में दिल्ली सरकार के 21 जुलाई 2025 के उस आदेश को पूर्णतः निरस्त कर दिया, जिसके जरिए पत्रकार के मेडिकल क्लेम को अमान्य ठहराया गया था। अदालत ने दिल्ली सरकार को आदेशित किया कि वह याचिकाकर्ता को 11,83,105.21 रुपये की संपूर्ण राशि का भुगतान अगले आठ सप्ताह की समय-सीमा के भीतर सुनिश्चित करे।
अदालत ने प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर रुख अपनाते हुए यह भी निर्देशित किया कि न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने और समय पर जवाबी हलफनामा पेश न करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की आंतरिक जवाबदेही तय की जाए और आवश्यकता पड़ने पर नियमानुसार संबंधित दोषी अधिकारियों से इस राशि की भरपाई पर भी विचार किया जा सकता है।
Delhi High Court: पत्रकार कल्याण और जनहित से जुड़े अधिकार
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला राजधानी के मान्यता प्राप्त पत्रकारों और मीडियाकर्मियों के वैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार तकनीकी आपत्तियों से कहीं ऊपर है। हालांकि, फैसले में यह सावधानी भी जोड़ी गई है कि यह आदेश हर निजी अस्पताल में कराए गए सामान्य इलाज पर स्वतः लागू नहीं होगा; प्रतिपूर्ति का दावा स्थापित नियमों, चिकित्सीय आपातकाल की वास्तविक स्थिति और प्रत्येक मामले के विशिष्ट तथ्यों की कसौटी पर ही मान्य होगा।
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