Hindu Kush Himalayas: हिंदू कुश हिमालय में 407 ग्लेशियल झीलें खतरे में, GLOF का बढ़ता संकट
UN रिपोर्ट में GLOF घटनाओं में पांच गुना बढ़ोतरी, भारत में सबसे ज्यादा मौतों का दावा
Hindu Kush Himalayas: वैश्विक जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक तापमान (ग्लोबल वॉर्मिंग) के चलते दुनिया के ‘तीसरे ध्रुव’ कहे जाने वाले हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में जलप्रलय का अभूतपूर्व संकट गहराने लगा है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU) के नेतृत्व में हुए एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध में यह चिंताजनक खुलासा हुआ है कि इस पूरे पर्वतीय क्षेत्र में 407 ऐसी विशालकाय ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जिनके कभी भी फटने का गंभीर जोखिम बना हुआ है।
तेजी से पिघलते हिमनदों के कारण इन हिमनद झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है और उनके प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी ग्लेशियर झील फटने से अचानक आने वाली प्रलयंकारी बाढ़ की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है। नेपाल-चीन सीमा पर हाल ही में लांगटांग और भोटेकोशी बेसिन में मची भीषण तबाही ने इस वैज्ञानिक चेतावनी की भयावहता को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित कर दिया है।
UNU की ताजा रिसर्च: 1950 के बाद GLOF आपदाओं में 5 गुना उछाल
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के बॉन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड ह्यूमन सिक्योरिटी (UNU-EHS) के प्रमुख ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ. दीपेश चपागाइन के नेतृत्व में यह अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संपन्न हुआ है। इस व्यापक शोध में वैज्ञानिकों ने वर्ष 2024 तक उपलब्ध ऐतिहासिक आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए कुल 493 जीएलओएफ घटनाओं की विस्तृत समीक्षा की।
अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1950 के बाद से हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की औसत संख्या प्रति दशक 7 से बढ़कर 38 तक पहुंच गई है। अर्थात पिछले सात दशकों में इस प्रकार की विनाशकारी आपदाओं की आवृत्ति में लगभग पांच गुना से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।
“हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा, उससे निपटने की रणनीतियां और अनुकूलन में कमियां” शीर्षक से प्रकाशित इस शोध पत्र में चेतावनी दी गई है कि तापमान में निरंतर वृद्धि से हिमनद तेजी से पीछे खिसक रहे हैं (Glacial Retreat), जिससे नई अस्थिर झीलों की संख्या और जल भंडारण क्षमता में खतरनाक स्तर तक विस्तार हो रहा है।
देशवार आंकड़े: चीन में सबसे ज्यादा घटनाएं, लेकिन भारत में हुई सर्वाधिक जनहानि
शोध पत्र में 1835 से 2025 के मध्य दर्ज किए गए ऐतिहासिक आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है। घटनाओं की कुल संख्या के लिहाज से चीन सबसे अधिक प्रभावित रहा है, जहां 199 जीएलओएफ घटनाएं दर्ज की गईं। इसके बाद पाकिस्तान में 152, भारत में 62 और नेपाल में 58 बार ग्लेशियर झीलों के फटने की आधिकारिक पुष्टि हुई है।
हालांकि, इन प्राकृतिक आपदाओं में जान गंवाने वाले नागरिकों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारत में सबसे अधिक भयावह मानवीय त्रासदी देखी गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में जीएलओएफ से जुड़ी आपदाओं में 6,119 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि पाकिस्तान में 1,991 और चीन में 625 मौतें दर्ज की गई हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय हिमालयी घाटियों में नदियों के किनारे घनी आबादी, बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं के संकेंद्रण के कारण यहां विनाश की तीव्रता अन्य देशों के मुकाबले कहीं अधिक घातक साबित होती है।
सिक्किम समेत भारतीय हिमालयी राज्यों पर गहराता संकट
अध्ययन में पूर्वोत्तर भारत के संवेदनशील राज्य सिक्किम को लेकर विशेष रूप से गंभीर जोखिम का उल्लेख किया गया है। सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SSDMA) द्वारा तैयार किए गए मैपिंग डेटा के अनुसार, राज्य में कुल 85 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। इनमें से 17 झीलें अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में आती हैं, जिनका हिमनद निरंतर पीछे खिसक रहा है।
विशेषज्ञों ने रेखांकित किया है कि सिक्किम की 7 प्रमुख झीलें ऐसी नाजुक स्थिति में हैं जो किसी तीव्र तीव्रता वाले भूकंप या अचानक होने वाले क्लाउडबर्स्ट (बादल फटने) के झटके से टूट सकती हैं। दक्षिण ल्होनक झील जैसी पूर्ववर्ती त्रासदियों से सबक लेते हुए वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि इन झीलों के जलस्तर को नियंत्रित करने और निरंतर सैटेलाइट ट्रैकिंग की व्यवस्था नहीं की गई, तो तीस्ता और अन्य नदी घाटियों में भारी तबाही मच सकती है।
Hindu Kush Himalayas: कमजोर अर्ली वार्निंग सिस्टम और रियल-टाइम डेटा शेयरिंग की दरकार
शोध के मुख्य लेखक डॉ. दीपेश चपागाइन के अनुसार, इस आसन्न खतरे को नियंत्रित करने की शुरुआत केवल और केवल उच्च हिमालयी चोटियों पर स्थापित वैज्ञानिक निगरानी से ही संभव है। इसके लिए अस्थिर मोरेन बांधों की नियमित सैटेलाइट मॉनिटरिंग, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, वाटर-लेवल सेंसर्स और आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) स्थापित करना अपरिहार्य हो चुका है, ताकि निचले इलाकों में रहने वाले नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित होने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ के दौरान यह बात प्रमुखता से उजागर हुई कि सीमावर्ती इलाकों में त्वरित पूर्व चेतावनी प्रणाली का अभाव था। निचले क्षेत्रों में प्रशासन और नागरिकों को तब सूचना मिली जब पानी का सैलाब सीमा के बिल्कुल मुहाने पर पहुंच चुका था। चूंकि हिमालय की अधिकांश नदियां और ग्लेशियल तंत्र अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लांघते हैं, इसलिए चीन, भारत, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान के बीच बिना किसी कूटनीतिक देरी के रियल-टाइम हाइड्रोलॉजिकल डेटा का साझाकरण जीवन रक्षा के लिए अनिवार्य बन गया है।
Hindu Kush Himalayas: साझा डेटा और निरंतर मैपिंग
इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की आकलनों में भी यह स्पष्ट किया गया था कि हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में अनुकूलन की गति जलवायु जोखिमों की तुलना में काफी धीमी है। वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि आपदा आने के बाद राहत और बचाव कार्य करने के बजाय जोखिम कम करने वाली अग्रिम रणनीतियां बनानी होंगी।
इसके तहत 407 चिन्हित संवेदनशील झीलों से नियंत्रित रूप से पानी बाहर निकालने (सिफनिंग), कृत्रिम निकास चैनल बनाने, डाउनस्ट्रीम इलाकों में कंक्रीट के सुरक्षित शेल्टर तैयार करने और स्थानीय समुदायों को नियमित मॉक ड्रिल के जरिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। सीमाओं के पार साझा वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों लोगों की आजीविका और भविष्य को इस बढ़ते जलप्रलय से सुरक्षित रख सकता है।
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