Sawan Somwar 2026: सावन के पहले सोमवार पर उमड़ा आस्था का सैलाब, उज्जैन से काशी तक मंदिरों में भक्तों का तांता
महाकाल, काशी और बैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचे
Sawan Somwar 2026: श्रावण मास के प्रथम सोमवार के पावन अवसर पर आज समूचा भारतवर्ष आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के महासमुद्र में सराबोर हो उठा। भोर की पहली किरण फूटने से पूर्व ही देश के कोने-कोने में स्थित ऐतिहासिक शिवालयों और पवित्र ज्योतिर्लिंगों में श्रद्धालुओं का अपार जनसैलाब उमड़ पड़ा। चारों दिशाओं में ‘हर-हर महादेव’, ‘जय महाकाल’ और ‘बम-बम भोले’ के गगनभेदी जयघोष गूंज रहे हैं। अवंतिका नगरी उज्जैन के श्री महाकालेश्वर, मोक्षनगरी वाराणसी के काशी विश्वनाथ धाम और झारखंड के पवित्र देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में लाखों भक्तों ने जलाभिषेक कर बाबा भोलेनाथ की कृपा अर्जित की, जिससे संपूर्ण वातावरण अलौकिक और शिवमय (Sawan Somwar 2026) बन गया है।
उज्जैन महाकालेश्वर में भस्म आरती और संध्या सवारी का वैभव
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अग्रण्य मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। प्रथम सोमवार पर बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन के लिए श्रद्धालु देर रात से ही किलोमीटर लंबी कतारों में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहे [cite: उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालु देर रात से ही कतारों में खड़े हो गए।]। रात्रि ठीक ढाई बजे मंदिर के गर्भगृह के पट खोले गए, जिसके उपरांत तड़के तीन बजे विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती की पौराणिक परंपरा संपन्न हुई। भस्म आरती से पूर्व भगवान महाकाल का दूध, दही, घी, शहद और पंचामृत से भव्य महा-अभिषेक किया गया [cite: भस्म आरती से पहले बाबा को जल से नहलाकर महा पंचामृत अभिषेक किया गया। इसमें दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से अभिषेक हुआ।]। इसके पश्चात भांग, चंदन और दिव्य वस्त्रों से मनमोहक श्रृंगार कर बाबा को भस्म अर्पित की गई। शंखध्वनि, डमरू की थाप और झांझ-मंजीरों के साथ आरती पूरी हुई। धार्मिक मान्यता के अनुसार शाम को राजा महाकाल अपनी प्रजा का कुशलक्षेम जानने के लिए नगर भ्रमण पर पारंपरिक सवारी के रूप में निकलेंगे [cite: सोमवार को बाबा महाकाल की सवारी निकाले जाने की भी परंपरा है। शाम को बाबा की सवारी निकाली जाएगी। मान्यता है कि अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए राजा महाकाल सवारी के रूप में नगर भ्रमण पर निकलते हैं।], जिसकी एक झलक पाने के लिए सड़कों के दोनों ओर लाखों श्रद्धालु घंटों पलक-पावड़े बिछाए प्रतीक्षा करते हैं।
काशी विश्वनाथ में पुष्पवर्षा और बैद्यनाथ धाम में कांवड़ियों का सैलाब
उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी में स्थित काशी विश्वनाथ धाम में तड़के मंगला आरती के बाद से ही श्रद्धालुओं का जलाभिषेक के लिए तांता लग गया। दूर-दराज से गंगाजल लेकर पहुँचे कांवड़ियों और श्रद्धालुओं का मंदिर न्यास द्वारा पुष्पवर्षा कर आत्मीय स्वागत किया गया [cite: जलाभिषेक के लिए दूर-दूर से पहुंचे कांवड़ियों और श्रद्धालुओं का मंदिर प्रशासन ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया।]। मैदागिन, चौक, गोदौलिया और सिल्को गली जैसे प्रमुख मार्गों से श्रद्धालु अनुशासित होकर मंदिर गर्भगृह की ओर बढ़ते रहे [cite: मैदागिन से चौक होते हुए गेट नंबर चार सिल्को गली और गेट नंबर चार ए के रास्ते भक्त पहुंच रहे थे। वहीं गोदौलिया से ढूंढीराज गेट नंबर एक और नन्नू फरिया लेन से भी श्रद्धालु लगातार मंदिर परिसर में प्रवेश कर रहे थे।]। इसी प्रकार झारखंड के देवघर में बाबा बैद्यनाथ धाम का दृश्य भी अत्यंत विहंगम रहा। सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर 100 किलोमीटर की अत्यंत कठिन पैदल यात्रा पूरी कर पहुँचे लाखों कांवड़ियों ने अर्घा प्रणाली के माध्यम से बाबा बैद्यनाथ पर जलार्पण किया। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित ऐतिहासिक सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मंदिर सहित देश भर के छोटे-बड़े शिवालयों में सुबह से ही भक्तों की अटूट कतारें देखने को मिलीं।
Sawan Somwar 2026: सुरक्षा व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन और धार्मिक महत्व
सावन के पवित्र महीने में सोमवार के दिन भगवान शिव का विधि-विधान से पूजन, व्रत और जलाभिषेक करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है [cite: सावन माह हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस महीने के सोमवार को विशेष महत्व दिया जाता है। भक्त जलाभिषेक, व्रत और पूजा-अर्चना के जरिए बाबा भोलेनाथ की कृपा पाने की कामना करते हैं।], इसी धार्मिक आस्था के कारण श्रद्धालुओं की अभूतपूर्व संख्या को देखते हुए संबंधित राज्य प्रशासनों और पुलिस विभागों ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं,। उज्जैन, वाराणसी और देवघर में ड्रोन कैमरों, बैरिकेडिंग, अतिरिक्त अर्घा की व्यवस्था और निरंतर रूट डायवर्जन के माध्यम से भीड़ को नियंत्रित किया जा रहा है। इस पावन उत्सव ने न केवल प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखा है, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों से आने वाले श्रद्धालुओं को एक सूत्र में बांधकर सामाजिक व सांस्कृतिक एकता की मिसाल भी पेश की है
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