Cancer Risk: कैंसर से बचाव किस्मत नहीं, ये रोजमर्रा की आदतें भी तय करती हैं खतरा

Cancer Risk: कैंसर से बचाव किस्मत नहीं, ये रोजमर्रा की आदतें भी तय करती हैं खतरा

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Cancer Risk: कैंसर का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के मन में डर बैठ जाता है। यह बीमारी आज भी दुनिया की सबसे गंभीर बीमारियों में गिनी जाती है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक सिर्फ जेनेटिक्स ही इसकी वजह नहीं होती। रोजमर्रा की आदतें और जीवनशैली भी खतरे को बढ़ा या घटा सकती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और उससे जुड़े शोध संस्थानों की ताजा पड़ताल बताती है कि भारत में लगभग चार में से एक कैंसर के मामले ऐसे हैं जिन्हें रोका जा सकता था। सवाल यही है कि आम आदमी अपनी रसोई, अपनी आदतों और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में क्या बदले कि यह खतरा कम हो सके।

Cancer Risk: तंबाकू और धूम्रपान से सबसे पहले दूरी बनाएं

धूम्रपान और तंबाकू का सेवन फेफड़ों, मुंह, गले, अग्न्याशय और किडनी समेत कई कैंसर से जुड़ा माना जाता है। सिगरेट या बीड़ी पीना ही नहीं, गुटखा, खैनी और पान मसाला जैसे धुआं रहित तंबाकू भी भारत में मुंह के कैंसर की बड़ी वजह बने हुए हैं। खुद न पीना काफी नहीं। दूसरे के धुएं से प्रभावित होना यानी सेकेंडहैंड स्मोक भी नुकसानदेह माना जाता है।

तंबाकू छोड़ना मुश्किल लगे तो अकेले जूझने की जरूरत नहीं। डॉक्टर या नशा मुक्ति केंद्रों से मदद ली जा सकती है। जानकार बताते हैं कि तंबाकू से दूरी कैंसर से बचाव का सबसे बड़ा और साफ कदम है। कई परिवारों में यह आदत सालों से चली आ रही होती है, इसलिए छोड़ना आसान नहीं लगता। फिर भी यही बदलाव सबसे ज्यादा असर दिखाता है।

खानपान में फल-सब्जी और साबुत अनाज को जगह दें

खाना सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं रह गया है। आहार कैंसर के खतरे से भी जुड़ा पाया गया है। फल, सब्जियां और साबुत अनाज को थाली में प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है। हरी सब्जियां, मौसमी फल और रेशे यानी फाइबर वाला खाना शरीर की रक्षा में मददगार माना जाता है। हल्दी जैसे मसाले भी पारंपरिक खानपान का हिस्सा रहे हैं।

दूसरी तरफ प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा तला-भुना सामान, रेड मीट और चीनी से लदे खाद्य पदार्थों से जितना हो सके बचना चाहिए। आईसीएमआर-एनआईसीपीआर जैसे संस्थान भी ताजी सब्जी-फल बढ़ाने और तले-मसालेदार जंक से दूरी बनाने की बात करते हैं। देखने पर लगता है कि बाजार का पैकेट वाला खाना सुविधा देता है, लेकिन लंबे समय में यही आदत नुकसान बढ़ा सकती है।

शरीर को सक्रिय रखना सिर्फ वजन घटाने के लिए नहीं

नियमित एक्सरसाइज सिर्फ फिट दिखने का मामला नहीं है। शरीर को सक्रिय रखने से वजन नियंत्रण में रहता है, इम्यूनिटी बेहतर होती है और तनाव भी कुछ हद तक कम होता है। तेज चलना, योग, साइकिल या हल्का वर्कआउट रोजाना की जिंदगी में शामिल किया जा सकता है। विशेषज्ञ आमतौर पर सप्ताह में करीब डेढ़ सौ मिनट मध्यम गतिविधि की बात करते हैं।

बैठे-बैठे काम करने वाली जिंदगी अब शहरों में आम हो गई है। लिफ्ट की जगह सीढ़ियां, थोड़ी देर की सैर या घर का काम भी गतिविधि में गिना जाता है। मामला कुछ इस तरह से है कि छोटी आदतें धीरे-धीरे इकट्ठा होकर असर दिखाती हैं। एक दिन छोड़ देने से कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन महीनों बैठे रहना खतरे को बढ़ा सकता है।

शराब को हल्के में लेना ठीक नहीं

शराब का सेवन भी कई तरह के कैंसर से जोड़ा गया है। मुंह, गला, लीवर, स्तन और आंत से जुड़े कैंसर का जोखिम इससे बढ़ सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शराब से दूरी बनाना या सेवन बहुत कम रखना बचाव का एक जरूरी कदम है। “थोड़ी शराब नुकसान नहीं करती” वाली सोच को अब कई शोध चुनौती देते दिखते हैं।

पार्टियों और शादियों में यह आदत सामान्य लगती है। लेकिन नियमित सेवन शरीर पर बोझ डालता है। जो लोग छोड़ नहीं पा रहे, उन्हें कम से कम मात्रा और आवृत्ति घटाने की कोशिश करनी चाहिए। डॉक्टर से बात करना बेहतर होता है बजाय खुद अनुमान लगाने के।

तनाव को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है

लगातार तनाव में रहने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने लगती है। इससे कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। मेडिटेशन, संगीत, किताबें या परिवार के साथ समय बिताना मानसिक बोझ हल्का कर सकता है। यह कोई जादू नहीं है, लेकिन इम्यूनिटी और नींद दोनों पर असर पड़ता है।

आजकल काम का दबाव, आर्थिक चिंता और स्क्रीन पर ज्यादा समय तनाव बढ़ा रहा है। छोटी-छोटी राहतें काम आती हैं। कोई एक तरीका सबके लिए एक जैसा नहीं चलता। जो चीज मन को शांत करे, उसे नियमित बनाना फायदेमंद रहता है।

रसायनों और गलत बर्तनों से बचें

प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म खाना रखना, बालों का रंग, पेंट और कीटनाशकों के लंबे संपर्क से बचने की सलाह दी जाती है। कुछ रसायन लंबे समय तक शरीर में जमा होकर नुकसान पहुंचा सकते हैं। घर में गर्म खाने के लिए कांच या स्टील के बर्तन ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं।

खेतों या कारखानों में काम करने वालों को सुरक्षा का ध्यान रखना और भी जरूरी है। पूरी तरह संपर्क खत्म करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अनावश्यक जोखिम कम किया जा सकता है। पर्यावरण में मौजूद कुछ कार्सिनोजन से बचाव भी विशेषज्ञों की सूची में आता है।

मध्य का एक अप्रत्याशित पहलू यह है कि भारत में तंबाकू के अलावा संक्रमण भी कैंसर के बड़े कारणों में गिने जाते हैं। सिर्फ सिगरेट छोड़ देने से काम नहीं चलता। मुंह की नियमित जांच और महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर से जुड़ी सावधानियां भी उतनी ही जरूरी हैं।

Cancer Risk: लक्षण दिखें तो इंतजार न करें

कैंसर के शुरुआती संकेत अक्सर साफ नहीं दिखते। इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच जरूरी मानी जाती है। लगातार थकान, अचानक वजन घटना, बिना वजह खून आना, शरीर में गांठ या ऐसा घाव जो हफ्तों ठीक न हो, इन बातों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। मुंह का अल्सर पंद्रह दिन से ज्यादा रहे तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

सरकारी कार्यक्रमों में तीस वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए मुंह, स्तन और गर्भाशय ग्रीवा की स्क्रीनिंग पर जोर दिया जाता है। समय पर पहचान से इलाज आसान और असरदार हो सकता है। डर के मारे जांच टालना सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है।

कैंसर पूरी तरह टाला जा सके, ऐसा दावा कोई जिम्मेदार चिकित्सक नहीं करता। जेनेटिक्स और कुछ अज्ञात कारण भी रहते हैं। लेकिन तंबाकू छोड़ना, संतुलित खाना, नियमित हलचल, शराब कम करना, तनाव संभालना और समय पर जांच करवाना खतरे को काफी हद तक घटा सकते हैं। ये बदलाव महंगे इलाज से सस्ते और रोज के काम हैं। परिवार की सेहत के लिए आज से एक आदत सुधारना शुरू किया जा सकता है। डॉक्टर से व्यक्तिगत सलाह लेना सबसे सही कदम रहेगा।

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