Punjab Assembly Election 2027: सभी 117 सीटों पर लड़ेगी चुनाव, अकाली दल से गठबंधन की अटकलों पर लगा विराम

BJP ने पंजाब की सभी 117 सीटों पर अकेले लड़ने का ऐलान किया, अकाली गठबंधन की अटकलें खत्म

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Punjab Assembly Election 2027: पंजाब के सियासी गलियारों में भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच संभावित चुनावी गठबंधन को लेकर पिछले कई दिनों से चल रही तमाम अटकलों और कयासबाजियों पर अब पूरी तरह विराम लग गया है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष ने सोमवार को औपचारिक रूप से यह स्पष्ट कर दिया है कि आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी किसी भी क्षेत्रीय अथवा अन्य दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। भाजपा राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर प्रत्याशी उतारेगी और पूर्ण बहुमत के साथ अपनी स्वतंत्र सरकार बनाने के लक्ष्य को लेकर चुनावी समर में आगे बढ़ेगी।
बीएल संतोष के इस बड़े और दो-टूक ऐलान के बाद पंजाब की राजनीति में नए समीकरण बनने शुरू हो गए हैं। पिछले कुछ सप्ताहों से अकाली दल के शीर्ष नेताओं के बयानों और बैठकों के बाद यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि पुराने सहयोगी एक बार फिर साथ आ सकते हैं। किंतु भाजपा के शीर्ष संगठनात्मक नेतृत्व द्वारा पटियाला में की गई इस दो-टूक घोषणा ने यह संदेश दे दिया है कि राष्ट्रीय पार्टी अब पंजाब में किसी सहयोगी दल की बैसाखी पर निर्भर रहने के बजाय अपनी स्वतंत्र जमीन मजबूत करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

Punjab Assembly Election 2027: पटियाला जोनल बैठक में बीएल संतोष का दो-टूक संदेश और चुनावी शंखनाद

भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष सोमवार को पंजाब के दो दिवसीय सघन संगठनात्मक दौरे पर पहुंचे। मोहाली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पंजाब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सरदार केवल सिंह ढिल्लों और पंजाब भाजपा के सह-प्रभारी सरदार नरेंद्र सिंह रैना ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके पश्चात संतोष सीधे पटियाला पहुंचे, जहां उन्होंने मालवा क्षेत्र की पहली जोनल संगठनात्मक बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में मोहाली, पटियाला उत्तर, पटियाला शहरी, पटियाला दक्षिण, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर जिले के प्रमुख पदाधिकारियों ने भाग लिया।
पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बीएल संतोष ने कहा कि पंजाब की जनता वर्तमान व्यवस्था से त्रस्त होकर बदलाव का मन बना चुकी है और भारतीय जनता पार्टी इस जन-आकांक्षा को साकार करने के लिए पूरी शक्ति के साथ मैदान में उतरने को तैयार है। उन्होंने कार्यकर्ताओं में नया जोश भरते हुए कहा कि पार्टी किसी भी गठबंधन की ओर देखने के बजाय राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने बलबूते चुनाव लड़ेगी और शानदार विजय प्राप्त कर चंडीगढ़ में अपनी पहली स्वतंत्र सरकार गठित करेगी। उन्होंने नेताओं को निर्देश दिया कि वे किसी भी प्रकार की गठबंधन की अफवाहों पर ध्यान दिए बिना अपने-अपने क्षेत्रों में चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू करें।

अकाली दल से गठबंधन की सुगबुगाहट और भाजपा का स्वतंत्र रणनीति पर अडिग रुख

गौरतलब है कि शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का गठबंधन देश के सबसे पुराने राजनीतिक गठबंधनों में से एक रहा था। हालांकि सितंबर 2020 में तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और केंद्र सरकार से अपना नाता तोड़ लिया था। इसके बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने अलग-अलग किस्मत आजमाई थी, जहां दोनों ही दलों को करारी चुनावी पराजय का सामना करना पड़ा था।
हाल के दिनों में जब शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने संसद के मानसून सत्र के दौरान नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके कार्यालय में मुलाकात की थी, तब सियासी गलियारों में दोनों दलों के दोबारा साथ आने की अटकलें बेहद तेज हो गई थीं। इसके अलावा बठिंडा से अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल और वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने भी सार्वजनिक मंचों से पंजाब के व्यापक हित और तरक्की के नाम पर पुराने गठबंधनों की बहाली के सकारात्मक संकेत दिए थे। किंतु भाजपा की पंजाब इकाई और केंद्रीय नेतृत्व ने साफ कर दिया कि सीट बंटवारे में जूनियर पार्टनर की भूमिका में लौटना पार्टी के दीर्घकालिक हितों के अनुकूल नहीं है। भाजपा अब राज्य के हर वर्ग में अपनी सीधी पैठ बनाकर ‘बड़े भाई’ की भूमिका में ही राजनीति करने की मंशा रखती है।

दो दिवसीय संगठनात्मक दौरे की रूपरेखा और बूथ स्तर तक संगठन को कसने की कवायद

बीएल संतोष के इस दो दिवसीय पंजाब दौरे का मुख्य उद्देश्य राज्य के सभी 23 जिलों के संगठनात्मक ढांचे की जमीनी समीक्षा करना और पार्टी की बूथ प्रबंधन प्रणाली को चाक-चौबंद बनाना है। सोमवार को पटियाला की जोनल बैठक के उपरांत उन्होंने बठिंडा में दूसरी जोनल बैठक ली, जिसमें बरनाला, मानसा, बठिंडा ग्रामीण, बठिंडा शहरी, श्री मुक्तसर साहिब, फाजिल्का और फरीदकोट के जिला प्रभारियों के साथ गहन मंथन किया गया।
दौरे के दूसरे दिन मंगलवार को लुधियाना, जालंधर और अमृतसर में लगातार तीन बड़ी जोनल बैठकें आयोजित की जा रही हैं। लुधियाना की बैठक में लुधियाना ग्रामीण, लुधियाना शहरी, मोगा, जगरांव, खन्ना, मलेरकोटला और रोपड़ के नेता शामिल होंगे। जालंधर की बैठक में दोआबा क्षेत्र के जालंधर उत्तर, जालंधर शहरी, जालंधर दक्षिण, होशियारपुर, नवांशहर और कपूरथला के पदाधिकारियों के साथ विचार-विमर्श होगा। वहीं अमृतसर में माझा क्षेत्र के अमृतसर शहरी, ग्रामीण, तरनतारन, गुरदासपुर, बटाला, पठानकोट और फिरोजपुर की इकाइयों की समीक्षा की जाएगी। दौरे के अंतिम चरण में बीएल संतोष अमृतसर में पंजाब भाजपा के सभी प्रदेश महासचिवों के साथ एक उच्चस्तरीय बंद कमरे की बैठक करेंगे, जिसमें नए प्रदेश पदाधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया जाएगा।

कांग्रेस का तीखा सियासी हमला: ‘खरगोश के साथ दौड़ना और शिकारी के साथ शिकार करना’

भाजपा के सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के औपचारिक ऐलान पर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने तुरंत तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने भाजपा के इस कदम को दोहरे चरित्र की राजनीति करार दिया। राजा वडिंग ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पर्दे के पीछे अकाली दल के साथ दिल्ली में गुप्त बैठकें कर रहा है और दूसरी ओर जनता के सामने सभी सीटों पर अकेले लड़ने का ढोंग रच रहा है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि यह स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसे कोई खरगोश के साथ दौड़ भी रहा हो और शिकारी कुत्तों के साथ मिलकर उसका शिकार भी कर रहा हो। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश भाजपा के भीतर भारी असंतोष और बिखराव की स्थिति है और जमीनी कार्यकर्ता लगातार पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। कार्यकर्ताओं की हताशा को रोकने और उन्हें पार्टी में बांधे रखने के लिए ही यह ‘अकेले चुनाव लड़ने’ का शिगूफा छोड़ा जा रहा है। कांग्रेस का कहना है कि पंजाब की जनता भाजपा और अकाली दल के इस कथित आंतरिक तालमेल को भली-भांति समझती है और चुनाव में इसका माकूल जवाब देगी।

पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा का बदलता आधार और आगामी चुनौतियां

पंजाब की पारंपरिक राजनीति दशकों तक कांग्रेस और अकाली-भाजपा गठबंधन के इर्द-गिर्द घूमती रही है, किंतु वर्ष 2022 के चुनावों में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत ने राज्य की पारंपरिक राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था। वर्तमान में आम आदमी पार्टी की सरकार के सामने विपक्ष में कांग्रेस, अकाली दल और भाजपा तीनों ही दल अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े हैं। भाजपा द्वारा अकेले चुनाव लड़ने के निर्णय के बाद यह तय हो गया है कि पंजाब विधानसभा चुनाव एक बहुकोणीय और दिलचस्प मुकाबले में तब्दील होने जा रहा है।
हालांकि, भाजपा के लिए सभी 117 सीटों पर अकेले दम पर लड़ना कई बड़ी चुनौतियां भी लेकर आता है। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से किसान संगठनों और पारंपरिक सिख मतदाताओं के बीच पार्टी को अपनी स्वीकार्यता और बढ़ानी होगी। लंबे समय तक शहरी हिंदू मतदाताओं की पार्टी माने जाने के तमगे से बाहर निकलकर भाजपा को अब मालवा, माझा और दोआबा के ग्रामीण क्षेत्रों में भी मजबूत चेहरे तलाशने होंगे। पार्टी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शुरू की गई जनकल्याणकारी योजनाओं, सिख समुदाय के ऐतिहासिक संदर्भों को दिए गए राष्ट्रीय सम्मान और सीमावर्ती राज्य में राष्ट्रीय सुरक्षा के एजेंडे के बल पर वह मतदाताओं का विश्वास जीतने में सफल रहेगी।

Punjab Assembly Election 2027: 2027 के महामुकाबले के लिए पंजाब की बदलती बिसात का अंतिम विश्लेषण

पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी पर्याप्त समय शेष है, किंतु सभी राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी गोटियां बिछाना शुरू कर दिया है। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी अपनी जनहितैषी योजनाओं, मुफ्त बिजली और विकास कार्यों के आधार पर दोबारा सत्ता में लौटने की कोशिश में जुटी है, वहीं कांग्रेस राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास कर रही है। शिरोमणि अकाली दल के लिए यह चुनाव अपने राजनीतिक अस्तित्व और पंथिक साख को बचाने की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।
ऐसे त्रिकोणीय माहौल में भाजपा का अकेले मैदान में उतरने का फैसला पार्टी की दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यदि भाजपा बिना किसी गठबंधन के सभी 117 सीटों पर मजबूत वोट शेयर हासिल करने में सफल रहती है, तो यह पंजाब की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होगी। बीएल संतोष के सघन संगठनात्मक दौरों से यह साफ हो गया है कि पार्टी अब समझौते की राजनीति को पीछे छोड़कर अपने संगठनात्मक ढांचे, कार्यकर्ताओं के परिश्रम और ‘डबल इंजन सरकार’ के विकास मॉडल के भरोसे ही पंजाब की जनता से जनादेश मांगेगी। आने वाले महीनों में पंजाब की चुनावी बिसात और भी आक्रामक तथा रोचक होने के पूरे आसार हैं।

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