Girjabandh Hanuman Temple: जहां देवी स्वरूप में पूजे जाते हैं बजरंगबली, भक्त करते हैं सोलह श्रृंगार
गिरजाबंध मंदिर में बजरंगबली का होता है सोलह श्रृंगार, जानें अनोखी धार्मिक मान्यता
Girjabandh Hanuman Temple: छत्तीसगढ़ की प्राचीन और ऐतिहासिक धार्मिक नगरी रतनपुर (बिलासपुर) में स्थित गिरजाबंध हनुमान मंदिर पूरे भारतवर्ष में अपनी तरह का एकमात्र ऐसा अनोखा और दिव्य तीर्थ स्थल है, जहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के परम भक्त संकटमोचन हनुमान जी की पूजा बाल ब्रह्मचारी पुरुष स्वरूप में नहीं, बल्कि अद्वितीय देवी (नारी) स्वरूप में की जाती है। जहां सामान्यतः देश के सभी हनुमान मंदिरों में सिंदूर, चोला, जनेऊ और लंगोट अर्पित करने की परंपरा है, वहीं इस पावन मंदिर में बजरंगबली का साक्षात आदिशक्ति की भांति सोलह श्रृंगार किया जाता है।
रतनपुर की यह अनूठी और चमत्कारी धार्मिक परंपरा सदियों से अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है। यहां स्थापित हनुमान जी की मनोहारी प्रतिमा के दोनों कंधों पर भगवान श्रीराम और माता सीता के स्वरूप भी उत्कीर्ण हैं, जो अनन्य रामभक्ति और शक्ति के समन्वित रूप को प्रदर्शित करते हैं। असाध्य शारीरिक व्याधियों, कुष्ठ रोग और जीवन के भीषण कष्टों से मुक्ति पाने के लिए देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन इस सिद्ध पीठ में शीश नवाने पहुंचते हैं।
Girjabandh Hanuman Temple: गिरजाबंध हनुमान मंदिर की भौगोलिक स्थिति और अद्वितीय स्वरूप
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला मुख्यालय से लगभग 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रतनपुर एक अत्यंत प्राचीन धार्मिक और पुरातात्विक केंद्र है, जिसे मां महामाया देवी की नगरी के रूप में भी जाना जाता है। इसी पवित्र नगरी के गिरजाबंध क्षेत्र में यह प्रसिद्ध हनुमान मंदिर स्थापित है।
मंदिर के गर्भगृह में विराजित श्री हनुमान जी की प्रतिमा का विग्रह अत्यंत दुर्लभ और विस्मयकारी है। प्रतिमा का मुखमंडल, शारीरिक बनावट और आभूषण धारण करने की मुद्रा पूरी तरह से नारी सुलभ देवी रूप को दर्शाती है। प्रतिमा के बाएं कंधे पर मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम और दाएं कंधे पर जगज्जननी माता जानकी विराजमान हैं। इसके साथ ही बजरंगबली के पैरों के नीचे दुष्टों और राक्षसों का दलन करते हुए स्वरूप को उकेरा गया है। मंदिर का वातावरण अत्यंत शांत, आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण है, जहां कदम रखते ही भक्तों को अपार मानसिक शांति की अनुभूति होती है।
राजा पृथ्वीदेव जू और महामाया कुंड से जुड़ी पौराणिक चमत्कारिक कथा
गिरजाबंध हनुमान मंदिर की स्थापना और इस दुर्लभ प्रतिमा की प्राप्ति से जुड़ी कथा रतनपुर के तत्कालीन सूर्यवंशी कलचुरी राजा पृथ्वीदेव जू की अगाध भक्ति से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक और जनश्रुति मान्यताओं के अनुसार, राजा पृथ्वीदेव जू हनुमान जी के अनन्य उपासक थे। अपने शासनकाल के दौरान राजा एक गंभीर और असाध्य कुष्ठ रोग (शारीरिक व्याधि) से पीड़ित हो गए थे। राजवैद्यों और तांत्रिकों के तमाम औषधीय उपचारों के बावजूद जब राजा के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ, तो वे अत्यंत व्यथित और निराश रहने लगे।
अपनी असाध्य बीमारी से मुक्ति पाने के लिए राजा ने संकटमोचन श्री हनुमान जी की अनन्य साधना और कठोर तपस्या आरंभ की। राजा की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर एक रात भगवान हनुमान ने राजा को स्वप्न में साक्षात दर्शन दिए और उन्हें रतनपुर में एक भव्य मंदिर निर्माण कराने का दिव्य आदेश दिया। राजा ने तत्काल प्रभाव से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ करवा दिया। जब मंदिर का निर्माण पूर्ण होने को आया, तब राजा के मन में मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की जाने वाली प्रतिमा को लेकर संशय उत्पन्न हुआ।
उसी रात भगवान हनुमान ने राजा को पुनः स्वप्न दिया और निर्देश दिया कि प्राचीन महामाया कुंड (तालाब) के जल में उनकी एक स्वयंभू दिव्य प्रतिमा जलमग्न है, जिसे निकालकर मंदिर में स्थापित किया जाए। राजा पृथ्वीदेव जू ने प्रातःकाल सैनिकों और गोताखोरों को महामाया कुंड में भेजा। कुंड के गहरे जल से जब प्रतिमा को बाहर निकाला गया, तो उपस्थित सभी जन और स्वयं राजा यह देखकर चकित रह गए कि बजरंगबली का यह स्वरूप सामान्य पुरुष स्वरूप न होकर देवी स्वरूप में था। राजा ने पूर्ण वैदिक विधि-विधान और महायज्ञ के साथ उस प्रतिमा को नवनिर्मित गिरजाबंध मंदिर में प्रतिष्ठापित कराया। प्रतिमा की स्थापना और प्रथम पूजा संपन्न होते ही राजा का असाध्य रोग चमत्कारिक रूप से पूरी तरह नष्ट हो गया और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए।
सोलह श्रृंगार की अलौकिक परंपरा और दैनिक पूजा पद्धति
गिरजाबंध मंदिर की सबसे बड़ी विशिष्टता यहां की पूजा और श्रृंगार पद्धति है, जो इसे दुनिया के अन्य सभी शिव-हनुमान मंदिरों से सर्वथा पृथक बनाती है। सामान्यतः अन्य मंदिरों में महिलाओं को हनुमान जी की मूर्ति को सीधे स्पर्श करने या श्रृंगार करने से वर्जित माना जाता है, किंतु गिरजाबंध में बजरंगबली के देवी स्वरूप में प्रतिष्ठित होने के कारण यहां माता स्वरूप मानकर उनकी विशेष आराधना की जाती है।
प्रतिदिन प्रातःकाल मंदिर के मुख्य पुजारियों द्वारा माता स्वरूप हनुमान जी का विशेष पंचामृत स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात देवी की भांति उनका सोलह श्रृंगार (16 श्रृंगार) किया जाता है। प्रतिमा के मस्तक पर कुमकुम और चमकीली बिंदी लगाई जाती है, मांग में सिंदूर भरा जाता है, कानों में सोने-चांदी के कुंडल, गले में मोतियों व स्वर्ण के हार, कलाइयों में हरी-लाल कांच की चूड़ियां, बाजुबंद, कमर में करधनी और पैरों में पायल व बिछिया पहनाई जाती है।
इसके साथ ही प्रतिमा को आकर्षक रेशमी व जरीदार चुनरी और वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है। मंगलवार, शनिवार, हनुमान जयंती और नवरात्रि के पावन पर्व पर यह श्रृंगार और भी अधिक भव्य व दिव्य रूप ले लेता है। भक्तजन अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए श्रृंगार का संपूर्ण सामान, सिंदूर, वस्त्र, फल और मिष्ठान्न अर्पित करते हैं।
भक्तों की आस्था, असाध्य रोगों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति का सिद्ध केंद्र
रतनपुर का यह सिद्ध पीठ केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, झारखंड और उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश के श्रद्धालुओं के लिए अगाध श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है। जनसामान्य में यह दृढ़ विश्वास है कि जिस प्रकार राजा पृथ्वीदेव जू को उनके असाध्य कुष्ठ रोग से मुक्ति मिली थी, उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक इस मंदिर में दर्शन करने, कुंड के जल से आचमन करने और बजरंगबली को श्रृंगार अर्पित करने से जटिल शारीरिक और मानसिक व्याधियों से मुक्ति मिलती है।
संतान प्राप्ति, वैवाहिक जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करने, गृह क्लेश के निवारण और आर्थिक तंगी से निजात पाने के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां विशेष अनुष्ठान और नारियल बांधकर मन्नत मांगते हैं। जिन भक्तों की मन्नतें पूरी होती हैं, वे सपरिवार मंदिर पहुंचकर हनुमान जी का सवामणी भोग लगाते हैं और पूरे मंदिर परिसर में सामूहिक भंडारे का आयोजन करते हैं।
Girjabandh Hanuman Temple: सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर के रूप में गिरजाबंध मंदिर का महत्व
रतनपुर का गिरजाबंध हनुमान मंदिर सनातन संस्कृति की उस उदात्त और समावेशी विचारधारा का जीवंत प्रतीक है, जो ईश्वर को किसी एक सीमा, लिंग या निश्चित ढांचे में बांधकर नहीं देखती। शक्ति (देवी) और भक्ति (हनुमान) का यह अद्भुत संगम यह संदेश देता है कि परमात्मा अपने सच्चे भक्त की पुकार पर किसी भी स्वरूप में प्रकट होकर उसका कल्याण कर सकते हैं।
वर्तमान भौतिकतावादी और तनावपूर्ण दौर में जब मानव मन आंतरिक शांति और आत्मिक संबल की खोज में भटकता है, तब गिरजाबंध जैसे दिव्य और जाग्रत तीर्थ स्थल आस्था, समर्पण और आत्म-विश्वास का संचार करते हैं। स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ट्रस्ट द्वारा मंदिर के संरक्षण, स्वच्छ परिसर और दर्शनार्थियों के सुगम आवागमन के लिए निरंतर व्यवस्थाएं सुदृढ़ की जा रही हैं। यदि आप भी भारतीय संस्कृति के अलौकिक और अनूठे चमत्कारों के साक्षात दर्शन करना चाहते हैं, तो छत्तीसगढ़ के रतनपुर स्थित गिरजाबंध हनुमान मंदिर की यात्रा आपकी धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन यात्रा का सबसे यादगार अनुभव साबित होगी।
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