विपक्ष के 73 राज्यसभा सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का नया नोटिस दिया, जानें पूरा मामला और आगे क्या होगा

73 सांसदों ने राज्यसभा सभापति को सौंपा पत्र; न्यायिक जांच और चुनावी कार्यों से निलंबन की मांग।

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Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गई है। राज्यसभा के 73 विपक्षी सांसदों ने सभापति को नया नोटिस सौंपा है जिसमें पक्षपात, आचार संहिता उल्लंघन और शिकायतों पर निष्क्रियता के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। साथ ही तीन सदस्यीय न्यायिक जांच कमेटी बनाने की भी मांग की गई है।

Gyanesh Kumar: क्यों दिया गया यह नया नोटिस और इसका आधार क्या है

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की निष्पक्षता एक बुनियादी स्तंभ मानी जाती है। इसी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए विपक्षी दलों ने शुक्रवार को राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को एक विस्तृत पत्र सौंपा।

पत्र में स्पष्ट किया गया है कि यह नोटिस 15 मार्च 2026 के बाद ज्ञानेश कुमार द्वारा किए गए कार्यों और चूक पर आधारित है। सांसदों के अनुसार इनमें से प्रत्येक घटना अलग-अलग और सामूहिक रूप से गंभीर दुराचार की श्रेणी में आती है।

Gyanesh Kumar: पहले भी हो चुका है हटाने का प्रयास, क्या था परिणाम

यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की कोशिश की हो। 12 मार्च 2026 को 63 राज्यसभा सांसदों और 130 लोकसभा सांसदों ने मिलकर इसी तरह का प्रस्ताव दिया था।

हालांकि 6 अप्रैल को राज्यसभा सभापति और लोकसभा अध्यक्ष दोनों ने उस प्रस्ताव को अपर्याप्त साक्ष्य का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था। इस बार विपक्ष ने नए और हालिया तथ्यों के साथ फिर से मोर्चा संभाला है।

Gyanesh Kumar: PM के भाषण पर क्या है विपक्ष का आरोप

विपक्षी सांसदों ने अपने पत्र में 18 मार्च 2026 की एक विशेष घटना का विस्तृत उल्लेख किया है। उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 29 मिनट का भाषण दूरदर्शन, संसद टीवी और आकाशवाणी पर सीधे प्रसारित किया गया था।

सांसदों का आरोप है कि यह भाषण उसी दिन तमिलनाडु के कोयंबटूर में दिए गए चुनाव प्रचार के भाषण से लगभग समान था। पत्र के अनुसार उस भाषण में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कषगम, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का नाम लेकर उन्हें संविधान के खिलाफ अपराधी कहा गया और तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और केरल के मतदाताओं से उनके विरुद्ध मतदान की अपील की गई।

Gyanesh Kumar: चुनाव आयोग पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप क्यों लगाया गया

विपक्षी सांसदों ने तर्क दिया कि जब उन्होंने और करीब 700 नागरिकों ने 19 और 20 अप्रैल को मुख्य चुनाव आयुक्त से शिकायत की तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। न कोई कारण बताओ नोटिस जारी हुआ, न कोई सलाह दी गई और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया आई।

इसके विपरीत सांसदों का कहना है कि BJP द्वारा विपक्षी नेताओं के खिलाफ की गई शिकायतों पर आयोग ने तुरंत और सख्त कार्रवाई की। संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार चुनाव आयोग से अपेक्षा की जाती है कि वह सभी दलों के साथ एक समान व्यवहार करे और यही उसकी संवैधानिक बाध्यता भी है।

Gyanesh Kumar: जांच के लिए क्या प्रस्ताव रखा गया है

विपक्षी सांसदों ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी गठित की जाए। इस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक अन्य न्यायिक सदस्य शामिल होने चाहिए।

सांसदों ने यह भी मांग की है कि जब तक जांच पूरी न हो, ज्ञानेश कुमार चुनाव से जुड़े सभी कार्यों और निर्णयों से खुद को अलग रखें। इस मांग को विपक्ष ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी कदम बताया है।

Gyanesh Kumar: ज्ञानेश कुमार कौन हैं और उनकी पृष्ठभूमि क्या है

ज्ञानेश कुमार एक वरिष्ठ IAS अधिकारी रहे हैं जिन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया। वे केरल कैडर के अधिकारी रहे हैं और उन्होंने केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है।

उनकी नियुक्ति के समय से ही विपक्षी दलों ने प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। अब चुनावी मौसम में उनके खिलाफ यह दूसरा बड़ा नोटिस उन्हें एक बार फिर राजनीतिक विवाद के केंद्र में ले आया है।

Gyanesh Kumar: इस विवाद का चुनावी प्रक्रिया पर क्या असर पड़ सकता है

तमिलनाडु में 234 सीटों के विधानसभा चुनाव और पश्चिम बंगाल में मतदान के बीच यह विवाद सामने आया है। ऐसे समय में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठते सवाल मतदाताओं और राजनीतिक दलों दोनों के लिए चिंता का विषय हैं।

चुनाव कानून के जानकारों के अनुसार यदि जांच कमेटी बनाने की मांग स्वीकार होती है तो यह भारतीय चुनावी इतिहास में एक असाधारण घटना होगी। फिलहाल सभी की नजरें राज्यसभा सभापति के अगले कदम पर टिकी हैं।

निष्कर्ष

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इसी बात में है कि संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित हो। विपक्ष के 73 सांसदों का यह नोटिस चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर एक गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। अब देखना यह है कि राज्यसभा सभापति इस नए नोटिस पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या इस बार जांच की मांग को स्वीकार किया जाएगा। यह मामला आने वाले हफ्तों में भारतीय राजनीति और चुनावी विश्वसनीयता की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

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