TMC Rebel MPs: टीएमसी के 20 बागी सांसदों पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला का कड़ा एक्शन, दलबदल मामले में जारी किया कारण बताओ नोटिस, 7 दिनों में मांगा जवाब

दलबदल मामले में 20 सांसदों से सात दिनों में जवाब मांगा, अयोग्यता पर बढ़ी कार्रवाई

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TMC Rebel MPs: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के संसदीय दल में हुए ऐतिहासिक विभाजन और 20 लोकसभा सांसदों की बगावत के मामले में संसद सचिवालय ने बड़ा कानूनी कदम उठाया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों को आधिकारिक कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। स्पीकर ने इन सभी सांसदों को अपना लिखित पक्ष और जवाब प्रस्तुत करने के लिए सात दिनों की सख्त समय सीमा निर्धारित की है।
यह कदम तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर उस याचिका के बाद सामने आया है, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर त्वरित और समयबद्ध फैसला लेने की गुहार लगाई गई थी। शीर्ष अदालत की संवैधानिक पीठ के संज्ञान और सॉलिसिटर जनरल के आश्वासन के बाद लोकसभा सचिवालय ने इन नोटिसों की औपचारिक प्रक्रिया तेज कर दी है।

TMC Rebel MPs: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और सॉलिसिटर जनरल की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की संयुक्त पीठ के समक्ष अभिषेक बनर्जी की याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। याचिका में तर्क दिया गया था कि जून माह में दाखिल की गई अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने में हो रहा अनावश्यक विलंब संसदीय लोकतंत्र की भावना के प्रतिकूल है और इससे दलबदल करने वालों को अनुचित संरक्षण मिलता है।
सुनवाई के दौरान लोकसभा स्पीकर और सचिवालय की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को अवगत कराया कि अध्यक्ष कार्यालय ने किसी भी प्रकार की देरी नहीं की है और संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत टीएमसी द्वारा दी गई याचिकाओं पर संज्ञान लेते हुए बागी सांसदों को नोटिस पहले ही जारी किए जा चुके हैं। इस पर जस्टिस बागची ने स्पष्ट टिप्पणी की कि मूल विषय केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया को एक निश्चित समय सीमा के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना अनिवार्य है।

टीएमसी के आरोप और दसवीं अनुसूची के कानूनी पेच

तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि 2024 के आम चुनाव में पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीते ये 20 सांसद स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल से अलग हो चुके हैं और उन्होंने ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) नामक एक अज्ञात राजनीतिक दल में शामिल होकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को अपना समर्थन देने का असंवैधानिक दावा किया है। अभिषेक बनर्जी का कानूनी तर्क है कि संविधान की दसवीं अनुसूची का पैरा 4 केवल तभी विलय को मान्यता देता है जब मूल राजनीतिक दल का दो-तिहाई हिस्सा किसी अन्य दल में विलीन हो, न कि केवल विधायी दल के सांसद अलग होकर अपना नया समूह बना लें।
वहीं दूसरी ओर, बागी सांसदों के गुट का दावा है कि लोकसभा में टीएमसी के कुल 29 सांसदों में से एक सीट रिक्त होने के बाद शेष 28 में से 20 सदस्य उनके साथ हैं, जो कुल संख्या बल का दो-तिहाई से अधिक है। इसलिए वे किसी अयोग्यता के दायरे में नहीं आते और उन्हें सदन में अलग गुट के रूप में बैठने का अधिकार मिलना चाहिए।

नोटिस पाने वाले बागी सांसदों के नाम

लोकसभा सचिवालय द्वारा जिन 20 बागी सांसदों को अयोग्यता नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है, उनमें कई वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री और चर्चित हस्तियां शामिल हैं। वरिष्ठ व पूर्व मंत्रियों की सूची में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी, माला रॉय और असित कुमार मल के नाम हैं। वहीं सिनेमा जगत से जुड़े सांसदों में रचना बनर्जी, जून मालिया और अधिकारी दीपक देव शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त पूर्व भारतीय क्रिकेटर एवं सांसद यूसुफ पठान, पार्थ भौमिक, सयानी घोष, अरूप चक्रवर्ती, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया, बापी हलदर, मो. अबू ताहिर खान, कालीपदा सरेन खेरवाल, मिताली बाग, खलीदुर रहमान और शर्मिला सरकार को भी यह नोटिस जारी कर सात दिनों के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है।

TMC Rebel MPs: संसदीय संतुलन, उपचुनाव और भविष्य का राजनीतिक परिदृश्य

यह संपूर्ण विवाद लोकसभा के संख्या बल और पश्चिम बंगाल की प्रादेशिक राजनीति दोनों के लिए अत्यंत निर्णायक साबित होने वाला है। यदि लोकसभा अध्यक्ष सुनवाई के बाद इन 20 सांसदों को अयोग्य घोषित करते हैं, तो पश्चिम बंगाल की 20 लोकसभा सीटों पर बड़े पैमाने पर मध्यावधि उपचुनाव कराने की संवैधानिक आवश्यकता होगी।
इसके विपरीत, यदि स्पीकर बागी गुट के दो-तिहाई विलय के दावे को वैध ठहराते हैं, तो लोकसभा में ममता बनर्जी की पार्टी की संख्या घटकर इकाई में सिमट जाएगी और संसद में पार्टी का प्रभाव बहुत कमजोर हो जाएगा। फिलहाल सभी 20 सांसदों द्वारा अपने वकीलों के माध्यम से सात दिनों के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, जिसके बाद लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष औपचारिक जिरह शुरू होगी।

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