Mahabharata strongest warriors: महाभारत के ये 5 योद्धा थे सबसे शक्तिशाली, जानें क्यों इन्हें सीधे युद्ध में हराना था नामुमकिन
महाभारत के 5 सबसे शक्तिशाली योद्धा: कृष्ण, भीष्म, कर्ण, द्रोण और अर्जुन, सीधे युद्ध में हराना नामुमकिन
Mahabharata strongest warriors: प्राचीन भारतीय इतिहास, वैदिक वास्तुकला और सनातन संस्कृति के सबसे महान कालखंडों में से एक द्वापर युग का महाभारत युद्ध आज भी पूरी दुनिया के लिए एक बहुत ही विस्मयकारी, कड़क और कौतूहल का विषय बना हुआ है। कुरुक्षेत्र के उस ऐतिहासिक मैदान पर लड़ा गया यह महायुद्ध केवल दो परिवारों के बीच सत्ता का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह पूरी धरती पर धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के समूल नाश का एक बहुत ही विशाल व कूटनीतिक महा-अभियान था। इस महाकाव्य के भीतर ऐसे-ऐसे अद्भुत, वीर, पराक्रमी और पराक्रमी योद्धाओं का सांगोपांग वर्णन मिलता है, जिनकी शारीरिक क्षमता, मानसिक मुस्तैदी और अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान का पैमाना इस कदर चरम स्तर पर था कि उन्हें युद्ध के मैदान में सीधे आमने-सामने के मुकाबले (द्वंद्व युद्ध) में हरा पाना किसी भी साधारण या असाधारण शक्ति के लिए पूरी तरह से नामुमकिन और असंभव माना जाता था।
इन महान योद्धाओं ने युद्ध कला के ऐसे कड़े कीर्तिमान स्थापित किए कि आज हजारों वर्षों के बाद भी उनकी वीरता, कड़े प्रतिज्ञाओं और रण-कौशल की गाथाएं हमारी युवा पीढ़ी के लिए एक बहुत बड़ी और अक्षय प्रेरणा का अटूट स्रोत बनी हुई हैं। भगवान श्री कृष्ण, भीष्म पितामह, सूर्यपुत्र कर्ण, गुरु द्रोणाचार्य और धनंजय अर्जुन जैसे अद्वितीय महारथियों की शक्ति और उनके पास मौजूद दिव्यास्त्रों के भंडार ने कुरुक्षेत्र के 18 दिनों के युद्ध को अमर बना दिया। आइए आज के इस विस्तृत, निष्पक्ष और कड़क ऐतिहासिक व आध्यात्मिक विश्लेषण बुलेटिन के माध्यम से बहुत ही गहराई से जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर इन 5 महा-योद्धाओं की वास्तविक ताकत का रहस्य क्या था, क्यों इन्हें सीधे युद्ध में परास्त करना देवताओं के बस में भी नहीं था, और इनकी रणनीतियों से आज का आधुनिक समाज क्या कड़े जीवन मूल्य सीख सकता है।
भगवान श्री कृष्ण: सर्वशक्तिमान रणनीतिकार और महाकाव्य के अमर मार्गदर्शक
कुरुक्षेत्र के इस महायुद्ध के नेपथ्य में जो सबसे बड़ी, कूटनीतिक और सर्वशक्तिमान शक्ति काम कर रही थी, वे स्वयं द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण थे। यद्यपि उन्होंने युद्ध की शुरुआत से पहले ही यह कड़ा संकल्प ले लिया था कि वे पूरे 18 दिनों के दौरान हाथों में कोई भी अस्त्र या शस्त्र कड़ाई से ग्रहण नहीं करेंगे और केवल अर्जुन के रथ के सारथी की भूमिका निभाएंगे; लेकिन इसके बावजूद वे इस पूरे युद्ध के सबसे शक्तिशाली और अजेय महा-योद्धा थे। साक्षात भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार होने के कारण उनके संकल्प मात्र से ही पूरी सृष्टि की नियति तय होती थी; ऐसे में उनका सुदर्शन चक्र और उनकी योगमाया की दिव्य शक्तियां उन्हें किसी भी भौतिक युद्ध के नियमों से बहुत ज्यादा ऊपर और अजेय बनाती थीं।
श्री कृष्ण की भूमिका इस युद्ध में केवल एक सैनिक की नहीं, बल्कि पांडवों के मुख्य रणनीतिकार और संपूर्ण मानवता के मार्गदर्शक की थी। जब अर्जुन युद्ध की शुरुआत में अपने ही सगे-संबंधियों को सामने देखकर मोह के गहरे अंधकार में डूब गए थे, तब कृष्ण ने उन्हें ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का कालजयी और कड़क उपदेश देकर उनके क्षत्रिय धर्म को पुनर्जीवित किया था। भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महाबली योद्धाओं को परास्त करने के लिए जो कड़े कूटनीतिक रास्ते और रणनीतियां बनाई गईं, वे सब श्री कृष्ण की ही तीक्ष्ण बुद्धि की देन थीं; यही कारण है कि सीधे युद्ध में उनका सामना करके उन्हें परास्त करने की सोच रखना ही पूरी तरह से आत्मघाती और नामुमकिन था, जो धर्म की विजय को 100 प्रतिशत सुनिश्चित करता है।
भीष्म पितामह: इच्छा मृत्यु का अमर वरदान और अस्त्रों का अभेद्य साम्राज्य
महाभारत के संपूर्ण किरदारों में सबसे ज्यादा सम्मानित, पूजनीय और कुरु वंश के सबसे कड़े स्तंभ गंगापुत्र भीष्म पितामह थे। भीष्म की शक्ति का सबसे बड़ा रहस्य उनके पिता राजा शांतनु द्वारा उन्हें दिया गया ‘इच्छा मृत्यु’ (जब तक वे स्वयं न चाहें, मृत्यु उन्हें छू भी नहीं सकती) का एक परम दुर्लभ और अभेद्य वरदान था। इसके साथ ही, उन्होंने भगवान परशुराम जैसे महान अवतार से धनुर्विद्या की पूरी कड़क ट्रेनिंग प्राप्त की थी; जिसके चलते उनके पास ब्रह्मांड के सबसे विनाशकारी दिव्यास्त्रों, जैसे ब्रह्मास्त्र और पाशुपतास्त्र को चलाने और उन्हें वापस बुलाने का एक अटूट व संपूर्ण ज्ञान प्रचुर मात्रा में मौजूद था।
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब तक भीष्म पितामह कौरव सेना के मुख्य सेनापति के रूप में अपने रथ पर सवार रहे, तब तक पांडवों के खेमे में पूरी तरह से मायूसी और पराजय का कड़ा खौफ मंडराता रहा; क्योंकि वे प्रतिदिन पांडवों के हजारों सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काट रहे थे। भीष्म को सीधे युद्ध में हराना अर्जुन या किसी भी अन्य महारथी के लिए शारीरिक रूप से पूरी तरह नामुमकिन था; यही कारण है कि अंत में स्वयं पितामह की अनुमति से शिखंडी को ढाल बनाकर ही अर्जुन उनके बाणों की शय्या का एक कड़ा विजुअल इल्यूजन तैयार कर सके, जिसने पितामह के शयन काल का मार्ग प्रशस्त किया और पांडवों को एक बहुत बड़ी और सुखद राहत प्रदान की।
सूर्यपुत्र कर्ण: दानवीरता की खुशियां और कवच-कुंडल का सुरक्षात्मक चक्रव्यूह
महाभारत का सबसे ज्यादा संवेदनशील, पराक्रमी और कड़े संघर्षों से तपा हुआ योद्धा सूर्यपुत्र कर्ण था। भगवान सूर्य के साक्षात अंश होने के कारण जन्म से ही उनके शरीर पर एक ऐसा ‘दिव्य कवच और कुंडल’ मौजूद था, जिसे ब्रह्मांड का कोई भी अस्त्र, वज्र या दिव्यास्त्र भेदने में पूरी तरह से असमर्थ था। कर्ण की धनुर्विद्या इतनी ज्यादा कड़क और सटीक थी कि स्वयं गुरु द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म भी उनके पराक्रम का लोहा मानते थे; और उनके पास मौजूद परशुराम द्वारा दिया गया विजय धनुष उन्हें युद्ध के मैदान में पूरी तरह से एक विनाशकारी शक्ति के रूप में स्थापित करता था।
कर्ण की शक्ति जितनी उनके बाणों में थी, उससे कहीं ज्यादा उनकी अटूट दानवीरता के सिद्धांतों में छिपी हुई थी। इंद्र द्वारा कूटनीति से उनके कवच और कुंडल दान में मांग लिए जाने के बाद भी, कर्ण के पास मौजूद एकघ्नी वासवी शक्ति इतनी कड़ी थी कि उससे अर्जुन की मृत्यु पूरी तरह तय मानी जा रही थी। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब कर्ण अपने रथ पर सवार होकर बाणों की बौछार करते थे, तो अर्जुन का रथ भी कई गज पीछे खिसक जाता था; सीधे और निष्पक्ष मुकाबले में कर्ण को परास्त करना देवताओं के राजा इंद्र के लिए भी नामुमकिन था, इसलिए नियति के कड़े खेल और रथ के पहिए के जमीन में धंसने के समय ही श्री कृष्ण के निर्देश पर अर्जुन ने उन पर अंतिम प्रहार किया, जो इस महायोद्धा की अमर विरासत को हमेशा के लिए स्थापित कर गया।
गुरु द्रोणाचार्य: दिव्यास्त्रों के चक्रव्यूह के रचयिता और पांडव-कौरवों के महा-गुरु
कुरुवंश के दोनों पक्षों यानी कौरवों और पांडवों को बचपन से युद्ध कला, गदा युद्ध, तलवारबाजी और कड़े चक्रव्यूह भेदने की शिक्षा देने वाले महान भारद्वाज पुत्र गुरु द्रोणाचार्य महाभारत के एक और सबसे अजेय योद्धा थे। द्रोणाचार्य के पास भगवान परशुराम और महर्षि भारद्वाज के आशीर्वाद से संपूर्ण ब्रह्मांड की सैन्य विधाओं का एक ऐसा कड़ा और अभेद्य ज्ञान था, जो उस काल में किसी भी अन्य राजा या योद्धा के पास उपलब्ध नहीं था। युद्ध के मैदान में जब वे अपने धनुष पर बाण चढ़ाते थे, तो विपक्षी सेना के बड़े-बड़े महारथियों के पसीने छूट जाते थे और पूरी सेना में मची भगदड़ उनकी कड़क ताकत का सीधा प्रमाण होती थी।
भीष्म पितामह के शरशय्या पर जाने के बाद जब द्रोणाचार्य ने कौरव सेना की कमान संभाली, तो उन्होंने ऐसे कड़े और जटिल सैन्य व्यूहों (जैसे चक्रव्यूह) का निर्माण किया जिसे भेदना अर्जुन के अलावा किसी के वश में नहीं था; जिसके चक्रव्यूह के भीतर वीर अभिमन्यु ने अपना कड़ा बलिदान दिया था। द्रोणाचार्य को सीधे युद्ध में हराना किसी भी अस्त्र या शस्त्र के बल पर 100 प्रतिशत नामुमकिन था, क्योंकि जब तक उनके हाथ में धनुष रहता था, वे साक्षात काल की तरह अजेय बने रहते थे; यही कारण है कि अंत में ‘अश्वत्थामा हतो हतः’ के एक कड़े कूटनीतिक अर्धसत्य का सहारा लेकर ही उन्हें मानसिक रूप से निशस्त्र किया गया, जिसके बाद ही धृष्टद्युम्न उनका वध करने में सफल हो सका।
निष्कर्ष: अर्जुन का गांडीव पराक्रम, मनोबल की जीत और महाभारत का अंतिम अमर संदेश
इस प्रकार इस सूची के पांचवें और सबसे मुख्य नायक पांडुपुत्र अर्जुन (Arjuna) का नाम आता है, जो देवराज इंद्र के आशीर्वाद से उत्पन्न और भगवान श्री कृष्ण के सबसे प्रिय सखा व शिष्य थे। अर्जुन की एकाग्रता, कड़ा अभ्यास और चिड़िया की आंख पर निशाना लगाने की उनकी अद्भुत कला उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाती थी; और महादेव की कड़ी परीक्षा पास करके प्राप्त किया गया ‘पाशुपतास्त्र’ व उनका दिव्य ‘गांडीव धनुष’ उन्हें युद्ध के मैदान में एक अभेद्य अजेयता प्रदान करता था। कुरुक्षेत्र के इस 18 दिवसीय महायुद्ध से आज के आधुनिक समाज और युवा पीढ़ी को जो सबसे बड़ा व कड़ा सबक मिलता है, वह यह है कि मनुष्य की असली और सच्ची ताकत केवल उसके बाह्य बाहुबल या संचित किए गए हथियारों में नहीं होती, बल्कि उसके अंतर्मन के मनोबल, सत्य के मार्ग पर चलने के कड़े सिद्धांतों और उसकी उच्च नैतिकता (धर्म) में छिपी होती है।
इन 5 महान योद्धाओं के चरित्रों(Mahabharata strongest warriors), उनकी भूलों और उनके पराक्रम का गहराई से अध्ययन करना हमारे जीवन के प्रबंधन को बहुत ज्यादा मजबूत और कड़क बनाता है। नियमों का यह कड़ा अनुशासन, ज्ञान के प्रति यह मुस्तैदी और नैतिक मूल्यों का सही इस्तेमाल ही हमारे पूरे समाज को हमेशा के लिए पूरी तरह से सुरक्षित, ज्ञानवान, समृद्ध और परम खुशहाल बनाए रखने का सबसे अचूक व कड़क रास्ता साबित होगा; इसलिए अपने कर्तव्यों का पालन पूरी ईमानदारी से करें, जागरूक बनें और एक न्यायप्रिय समाज के निर्माण में अपना बहुमूल्य वैचारिक योगदान बेहद सहजता के साथ देते रहें।
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