Sonam Wangchuk: ‘मैं चाहता था राहुल गांधी खत्म करवाएं मेरा अनशन’, NEET आंदोलन और जंतर-मंतर मार्च की बताई पूरी इनसाइड स्टोरी

वांगचुक ने NEET आंदोलन, जंतर-मंतर मार्च और राहुल गांधी की भूमिका पर किया बड़ा खुलासा

0

Sonam Wangchuk: सामाजिक कार्यकर्ता और लद्दाख के प्रमुख पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने देश भर में चर्चित रहे नीट (NEET) पेपर लीक आंदोलन और जंतर-मंतर पर अपने आमरण अनशन को लेकर बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। सोनम वांगचुक ने स्पष्ट किया है कि वे व्यक्तिगत रूप से चाहते थे कि कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी स्वयं आकर उनका अनशन समाप्त करवाएं। वांगचुक के अनुसार, संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले जंतर-मंतर पर हुए इस आंदोलन को लेकर उनकी प्रारंभिक रणनीति यह थी कि 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन और संसद मार्च के बाद पूरे आंदोलन की कमान औपचारिक तौर पर विपक्षी दलों को सौंप दी जाए, जिससे अनशन से एक गरिमापूर्ण निकास मिल सके।

यह खुलासा उन तमाम राजनीतिक सवालों और कयासों पर विराम लगाता है कि आखिर बिना किसी पूर्व व्यापक तैयारी के जंतर-मंतर पर चल रहा यह धरना अचानक राष्ट्रीय स्तर पर कैसे छा गया। वांगचुक ने स्वीकार किया कि शुरुआत में इसे किसी अंतहीन या विशालकाय जनांदोलन में बदलने की योजना नहीं थी, बल्कि इसे एक रणनीतिक मोड़ पर लाकर राजनीतिक नेतृत्व के हवाले करना ही मूल उद्देश्य था।

Sonam Wangchuk: 20 जून से शुरू हुआ संघर्ष, साधारण धरने से राष्ट्रीय सुर्खियों तक का सफर

नीट परीक्षा में कथित धांधली और पेपर लीक के मुद्दे को लेकर छात्रों के समर्थन में 20 जून से जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हुआ था। शुरुआती कई सप्ताह तक यह धरना राष्ट्रीय मीडिया की मुख्य सुर्खियों से काफी हद तक दूर रहा और इसमें बेहद सीमित संख्या में लोग शामिल हो रहे थे। हालांकि, जुलाई के मध्य में जैसे ही संसद का नया सत्र नजदीक आया, इस धरने ने अचानक तीव्र गति पकड़ ली।

सोनम वांगचुक के अनशन पर बैठने के बाद आंदोलन का प्रभाव कई गुना बढ़ गया और मंच पर विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं की आवाजाही शुरू हो गई। वांगचुक ने अब इस पूरी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए कहा है कि 20 जुलाई के प्रदर्शन को लेकर कोई बहुत बड़ा रोडमैप पहले से तैयार नहीं किया गया था। यह एक प्रतीकात्मक और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन होना था, जिसका एकमात्र लक्ष्य संसद मार्च के जरिए पूरे मुद्दे को संसद के पटल और विपक्ष की राजनीतिक जिम्मेदारी में तब्दील करना था।

राहुल गांधी से अनशन खत्म कराने की रणनीति और ‘सम्मानजनक निकास’ की योजना

वांगचुक ने अपनी रणनीति का ब्योरा देते हुए बताया कि वे इस गतिरोध को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं थे। उनकी स्पष्ट सोच थी कि छात्रों के भविष्य से जुड़े इस गंभीर मुद्दे को एक उचित मुकाम पर लाकर विपक्ष को सौंप दिया जाए ताकि इसकी गूंज सीधे संसद के भीतर सुनाई दे। इसी योजना के तहत वे चाहते थे कि विपक्ष के प्रमुख चेहरे के तौर पर राहुल गांधी आगे आएं और जंतर-मंतर पहुंचकर उन्हें जूस पिलाकर अनशन समाप्त कराएं।

आंदोलन के दौरान भीड़ जुटाने और मार्च की रूपरेखा पर बात करते हुए वांगचुक ने बताया कि आयोजकों में शामिल रांका का अनुमान था कि इस मार्च में लगभग 10,000 लोग जुट सकते हैं, जबकि सौरव दास को 15,000 तक लोगों के आने की उम्मीद थी। चूंकि लगातार अनशन के कारण वांगचुक का स्वास्थ्य गिर रहा था, इसलिए सौरव दास ने उन्हें संसद मार्च में शामिल करने के लिए एक व्हीलचेयर तक का प्रबंध करने की पेशकश की थी। वांगचुक के शब्दों में, वे केवल एक ‘डिग्निफाइड एग्जिट’ (गरिमापूर्ण निकास) चाहते थे ताकि छात्रों का संघर्ष भी कमजोर न पड़े और अनशन भी सम्मानपूर्वक समाप्त हो जाए।

अभिजीत दीपके पर टिप्पणी: ‘राजनीतिक महत्वाकांक्षा होना कोई गलत बात नहीं’

अपने विस्तृत इंटरव्यू में सोनम वांगचुक ने आंदोलन से जुड़े प्रमुख चेहरे अभिजीत दीपके की भूमिका और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर भी बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि यदि कोई यह कहता है कि अभिजीत दीपके राजनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ इस आंदोलन में सक्रिय थे, तो इस बात को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता और इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है।

वांगचुक ने साझा किया कि आंदोलन के शुरुआती दिनों में कई लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि दीपके पूर्व में एक राजनीतिक दल यानी आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं। हालांकि, वांगचुक ने स्पष्ट किया कि वे किसी के राजनीतिक अतीत को आधार बनाकर उसके वर्तमान प्रयासों को खारिज करने में विश्वास नहीं रखते। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले किसी भी युवा कार्यकर्ता के भीतर यदि राजनीतिक महत्वाकांक्षा है, तो वह सर्वथा स्वाभाविक है और इसे नकारात्मक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, भले ही दीपके ने स्वयं खुलकर इस बारे में कभी कुछ न कहा हो।

Sonam Wangchuk: छात्र आंदोलन, संसद का दबाव और व्यापक राजनीतिक निहितार्थ

नीट पेपर लीक का मामला देश के लाखों युवा अभ्यर्थियों और उनके अभिभावकों के भविष्य और विश्वास से जुड़ा हुआ था। जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह आंदोलन उन आक्रोशित छात्रों की आवाज बना जो व्यवस्था की खामियों से त्रस्त थे। वांगचुक के इस नए खुलासे से यह तथ्य रेखांकित होता है कि किसी भी नागरिक आंदोलन को जब नीतिगत बदलाव या कानूनी स्तर पर जीत हासिल करनी होती है, तो उसे अंततः राजनीतिक प्रक्रिया और विधायी मंचों का सहारा लेना ही पड़ता है।

संसद सत्र के मुहाने पर इस प्रदर्शन को विपक्ष के हाथों में सौंपने की सोच इसी संसदीय व्यवस्था का हिस्सा थी। वांगचुक के इस बयान के बाद अब राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में यह नई बहस छिड़ गई है कि क्या नागरिक आंदोलनों का राजनीतिक दलों के मंच से जुड़ना उनकी स्वायत्तता को प्रभावित करता है या फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज को मजबूती देने का यही सबसे प्रभावी रास्ता है।

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.