राम नाम शरीर पर गुदवाकर भक्ति करता है यह समुदाय, 130 साल पुरानी है छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज की अनोखी परंपरा

छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज में शरीर पर ‘राम’ नाम गोदने की 130 साल पुरानी परंपरा और इसका इतिहास जानें

0
Ramnaami Samaj: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में ईश्वर भक्ति के कई अनूठे और विस्मयकारी रूप देखने को मिलते हैं। इन्हीं में से एक है छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक रामनामी समाज, जिसने भक्ति को किसी मंदिर की चारदीवारी, मूर्ति या बाहरी कर्मकांड तक सीमित न रखकर अपने पूरे अस्तित्व, देह और आत्मा में समाहित कर लिया है। इस समुदाय के लोग अपने पूरे शरीर पर देवनागरी लिपि में ‘राम’ नाम का गोदना (टैटू) गुदवाते हैं। लगभग 130 वर्ष पूर्व 19वीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुई यह परंपरा केवल धार्मिक समर्पण का प्रतीक नहीं है, बल्कि सामाजिक भेदभाव, असमानता और छुआछूत के विरुद्ध एक शांतिपूर्ण और मौन आध्यात्मिक क्रांति की जीती-जागती मिसाल है।

Ramnaami Samaj: महानदी के कछार में राम भक्ति का अनूठा स्वरूप

छत्तीसगढ़ में महानदी के मैदानी और तटीय इलाकों—विशेष रूप से जांजगीर-चांपा, बिलासपुर, सारंगढ़-बिलाईगढ़, बलौदाबाजार और रायपुर जिलों में रामनामी समाज के लोग निवास करते हैं। इस समुदाय के लिए भक्ति का केंद्र कोई सशरीर या साकार राजा राम नहीं, बल्कि कबीर की परंपरा के ‘निर्गुण, निराकार और सर्वव्यापी राम’ हैं।
समुदाय के लोग सात्विक जीवन शैली का पालन करते हैं। वे पारंपरिक रूप से सफेद सूती वस्त्र पहनते हैं, जिन पर पूरे वस्त्र में ‘राम-राम’ की छपाई होती है। सिर पर मोरपंखों का बना मुकुट और गले में घुंघरू बांधकर जब ये साधक अपनी पारंपरिक खंजरी और मंजीरे की धुन पर रामचरितमानस की चौपाइयों का गायन करते हैं, तो पूरा वातावरण एक अलौकिक भक्ति भाव से भर जाता है। इनके घरों की दीवारों, दरवाजों, बिस्तरों और घरेलू बर्तनों तक पर केवल ‘राम’ नाम ही अंकित दिखाई देता है।

1890 के दशक में कैसे हुई इस ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत?

रामनामी समाज की नींव लगभग 1890 के आसपास सारंगढ़ क्षेत्र के चारपारा गांव निवासी परशुराम भारद्वाज ने रखी थी। ऐतिहासिक और मौखिक विवरणों के अनुसार, परशुराम कुष्ठ रोग से पीड़ित थे और उस समय प्रचलित जातिगत व्यवस्था व छुआछूत के कारण उन्हें गंभीर सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा था। उस दौर में तथाकथित निचली जातियों के लोगों को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी और धर्मग्रंथों के अध्ययन पर भी पाबंदियां लगाई जाती थीं।
कहा जाता है कि एक सिद्ध संत की प्रेरणा से परशुराम ने राम नाम का अखंड जप शुरू किया, जिसके फलस्वरूप वे असाध्य रोग से पूरी तरह मुक्त हो गए। इस आध्यात्मिक अनुभव के बाद उन्होंने महसूस किया कि ईश्वर किसी खास वर्ग या मंदिर की बपौती नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक जीवित प्राणी के भीतर वास करते हैं।
जब ऊंची जातियों ने उन्हें राम मंदिर में प्रवेश करने से रोका, तब परशुराम ने अपने सीने पर ‘राम’ नाम गोदवा लिया। उन्होंने यह तर्क दिया कि यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर को ही राम का मंदिर बना ले, तो फिर उसे किसी अन्य मंदिर में जाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी और न ही कोई उसे अपने आराध्य से दूर कर सकता है। देखते ही देखते हजारों वंचित लोगों ने इस विचार को अपना लिया और यह एक बड़े सामाजिक-धार्मिक आंदोलन में बदल गया।

शांतिपूर्ण आध्यात्मिक सत्याग्रह और समानता का संदेश

शरीर पर राम नाम गुदवाने की यह प्रथा भारतीय इतिहास के सबसे अनूठे अहिंसक आंदोलनों में गिनी जाती है। जब सामंती व्यवस्था ने उनके अस्तित्व को अछूत करार दिया, तब इस समाज ने अपने पूरे शरीर को सबसे पवित्र नाम से आच्छादित कर लिया ताकि कोई उन्हें अपवित्र न कह सके। यह बिना किसी हिंसा, कटुता या बदले की भावना के अपनी धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा को स्थापित करने का एक शांत सत्याग्रह था।
गोदना गुदवाने की प्रक्रिया भी अत्यधिक कष्टप्रद और धैर्य की परीक्षा होती है। इसमें मिट्टी के तेल या दीये की कालिख (काजल) और बबूल के कांटों या सुइयों का उपयोग करके त्वचा को गहरा कुरेदकर यह स्थायी स्याही भरी जाती है। इस असह्य दर्द को सहना समुदाय के लिए अपने समर्पण और अडिग संकल्प का प्रमाण माना जाता है।

शरीर पर गोदने के आधार पर समुदाय में विशिष्ट पहचान

रामनामी समुदाय में शरीर पर गोदे गए राम नाम के विस्तार के आधार पर साधकों को विभिन्न श्रेणियों और आदरसूचक नामों से पहचाना जाता है। जिस व्यक्ति के माथे पर केवल दो राम नाम लिखे होते हैं, उसे ‘शिरोमणि’ कहा जाता है।
जो साधक अपने पूरे मस्तक पर राम नाम अंकित करवाते हैं, उन्हें ‘माथौते’ कहा जाता है। सर्वांग यानी छाती, पीठ और कंधों पर नाम लिखवाने वाले को ‘वराहा’ कहा जाता है, जबकि पूरे शरीर के हर हिस्से—चेहरे, पलकों, कान, हाथ, पैर और हथेलियों तक—पर सघन रूप से राम नाम गुदवाने वाले साधक को ‘नखशिख’ या ‘पूर्ण रामनामी’ कहा जाता है। एक पूर्ण रामनामी बनना वर्षों की कठोर साधना, त्याग और शारीरिक कष्ट सहने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है।

आधुनिकता के दौर में बदलती परंपरा और नई पीढ़ी की राह

बीते कुछ दशकों में आधुनिक शिक्षा, रोजगार के अवसरों और सामाजिक दृष्टिकोण में आए बदलावों के कारण नई पीढ़ी की प्राथमिकताओं में अंतर आया है। आधुनिक नौकरियों, स्कूल-कॉलेजों और शहरी परिवेश में चेहरे और हाथों पर गहरे गोदने के कारण युवाओं को अक्सर झिझक या रूढ़िवादिता का सामना करना पड़ता था। इसके चलते अब युवा पीढ़ी चेहरे या पूरे शरीर पर ‘नखशिख’ गोदना करवाने से बच रही है।
वर्तमान में युवा वर्ग आमतौर पर सीने, पीठ या बांह के किसी छिपे हुए हिस्से पर प्रतीकात्मक रूप से एक या दो राम नाम गुदवाकर अपनी परंपरा का निर्वहन कर रहा है। यद्यपि अब पूरी तरह से शरीर पर राम नाम वाले बुजुर्ग ‘नखशिख’ साधकों की संख्या सीमित रह गई है, लेकिन समाज के नैतिक नियम—जैसे मद्यपान और मांसाहार से पूर्ण परहेज, सत्य बोलना, और रामचरितमानस का नित्य पाठ—आज भी समुदाय के भीतर उसी श्रद्धा से जीवित हैं।

Ramnaami Samaj: अखंड आस्था और मानवीय समता का जीवंत प्रतीक

रामनामी समाज का इतिहास यह साबित करता है कि सच्ची भक्ति किसी जाति, कुल, बाह्य कर्मकांड या मंदिर के ढांचे की मोहताज नहीं होती। 130 से अधिक वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आस्था, प्रतिरोध और मानवीय समानता का एक ऐसा संगम है, जिसने सामाजिक भेदभाव के अंधेरे को अध्यात्म के प्रकाश से परास्त किया। आज भी जब छत्तीसगढ़ के गांवों में रामनामियों का वार्षिक मेला लगता है और हजारों साधक एक सुर में राम नाम का गान करते हैं, तो वह दृश्य संपूर्ण विश्व को यह याद दिलाता है कि ईश्वर की सबसे पावन और सच्ची अभिव्यक्ति मानव देह और उसके शुद्ध अंतःकरण में ही समाहित है।

Read more here

नवरात्रि में कलश स्थापना से पहले क्यों जुटाई जाती है खास मिट्टी? बंगाल की ‘पुण्य माटी’ से जुड़ी है अनोखी परंपरा

Petrol-Diesel Price 6 October 2026: दिल्ली-मुंबई समेत प्रमुख महानगरों में इतने रुपये प्रति लीटर भाव

Aaj Ka Mausam 6 October 2026: दिल्ली-NCR से दक्षिण भारत तक बारिश और आंधी का अलर्ट

Fatty Liver में नाश्ते की ये 5 आम चीजें पड़ सकती हैं भारी, जानें पोहा, उपमा और चाय-बिस्कुट में क्या बदलें

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.