नवरात्रि में कलश स्थापना से पहले क्यों जुटाई जाती है खास मिट्टी? बंगाल की ‘पुण्य माटी’ से जुड़ी है अनोखी परंपरा

घटस्थापना में मिट्टी-जौ से लेकर बंगाल की दुर्गा प्रतिमा तक, जानें ‘पुण्य माटी’ की अनोखी परंपरा

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Navratri Kalash Sthapana: शारदीय नवरात्रि का महापर्व शक्ति, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का पावन काल माना जाता है। इस नौ दिवसीय अनुष्ठान का विधिवत आरंभ घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ होता है। सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक या तांत्रिक अनुष्ठान में घट की स्थापना को ब्रह्मांड और देवी शक्ति के प्रत्यक्ष आह्वान के रूप में देखा जाता है। घटस्थापना के दौरान जल, आम्रपल्लव और नारियल के साथ-साथ शुद्ध मिट्टी और उसमें बोए जाने वाले जौ का अत्यंत विशिष्ट स्थान होता है। वहीं दूसरी ओर, बंगाल की विश्वप्रसिद्ध दुर्गा पूजा परंपरा में मिट्टी का महत्व और भी अधिक दार्शनिक और विस्मयकारी रूप ले लेता है। वहां मां दुर्गा की भव्य मृण्मयी प्रतिमाओं के निर्माण के लिए जिन मिट्टियों का संग्रह किया जाता है, उसमें ‘पुण्य माटी’ का विधान सदियों से चला आ रहा है। यह परंपरा सामाजिक सीमाओं से परे जाकर संपूर्ण सृष्टि और स्त्री शक्ति के सम्मान की एक अनूठी गाथा प्रस्तुत करती है।

Navratri Kalash Sthapana: घटस्थापना में मिट्टी और जौ का गहरा आध्यात्मिक प्रतीक

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की प्रक्रिया में एक वेदी तैयार की जाती है, जिसके आधार के रूप में पवित्र मिट्टी की एक मोटी परत बिछाई जाती है। इसी मिट्टी पर सात प्रकार के धान्य या मुख्य रूप से जौ (यव) बोए जाते हैं और उसके ऊपर जल से भरा मंगल कलश स्थापित किया जाता है।
धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में उत्पन्न होने वाला पहला अन्न ‘जौ’ ही था। इसलिए इसे ‘ब्रह्म अन्न’ और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। मिट्टी वास्तव में धरती माता यानी उर्वरा शक्ति का साक्षात रूप है, जो जीवन का पोषण करती है। नवरात्रि के नौ दिनों में मिट्टी से अंकुरित होकर लहलहाने वाले हरे-भरे जौ यह दर्शाते हैं कि परिवार में खुशहाली, प्रगति और जीवन की निरंतरता बनी रहेगी। जौ का जितनी तेजी से और घना उगना आगामी वर्ष के शुभ होने का संकेत माना जाता है।

बंगाल की ‘पुण्य माटी’ और दुर्गा प्रतिमा निर्माण का विधान

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कला, आस्था और सामाजिक समरसता का विराट संगम है। पारंपरिक रूप से मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण गंगा नदी से लाई गई दोमट मिट्टी से किया जाता है, लेकिन शास्त्रों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार यह प्रक्रिया तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक उसमें ‘पुण्य माटी’ को न मिलाया जाए।
‘पुण्य माटी’ उस मिट्टी को कहा जाता है जिसे वेश्यालय यानी निषिद्ध क्षेत्र के प्रवेश द्वार से लाया जाता है। परंपरागत रूप से, मूर्तिकार या पुरोहित स्वयं किसी गणिका के घर की दहलीज पर जाकर भिक्षा के रूप में यह मिट्टी मांगते हैं। जब तक गणिका अपने हाथों से वह मिट्टी भेंट नहीं करती, तब तक मूर्ति निर्माण के लिए तैयार की जाने वाली मिट्टी का शोधन पूरा नहीं माना जाता।

वर्जित चौखट की मिट्टी को क्यों माना गया परम पवित्र?

सामाजिक रूप से उपेक्षित और वर्जित माने जाने वाले क्षेत्रों की मिट्टी को पूजा के लिए ‘पुण्य’ कहे जाने के पीछे कई गहरे दार्शनिक और सामाजिक तर्क छिपे हुए हैं:
  • पुण्य और पवित्रता का प्रतीक: एक बहुत पुरानी और लोकप्रिय मान्यता यह है कि जब कोई व्यक्ति किसी वेश्यालय की चौखट के भीतर कदम रखता है, तो वह अपनी सारी पवित्रता, शील, सदाचार और संचित पुण्य उस दहलीज के बाहर ही छोड़ जाता है। इस दार्शनिक दृष्टिकोण के अनुसार, उस चौखट के बाहर जमा मिट्टी समाज के सबसे शुद्ध और संचित पुण्यों से युक्त मानी जाती है, जिसके कारण उसे ‘पुण्य माटी’ कहा गया।
  • सामाजिक समावेश और सम्मान: दूसरा और सबसे मानवीय दृष्टिकोण यह है कि मां दुर्गा को संपूर्ण सृष्टि और हर स्त्री का मूल रूप माना जाता है। समाज चाहे किसी वर्ग को कितना भी उपेक्षित, लांछित या बहिष्कृत क्यों न कर दे, लेकिन जगदंबा के दरबार में कोई भी अछूत या अवांछित नहीं है। उस दहलीज की मिट्टी को प्रतिमा का हिस्सा बनाकर यह संदेश दिया जाता है कि सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेल दी गई स्त्रियां भी शक्ति स्वरूपा हैं और उनके योगदान के बिना देवी की पूर्णता संभव नहीं है।

प्रतिमा निर्माण में उपयोग की जाने वाली अन्य पारंपरिक सामग्रियां

कोलकाता के सुप्रसिद्ध कुम्हारटोली (मूर्तिकारों के ऐतिहासिक क्षेत्र) में दुर्गा प्रतिमाएं बनाने की प्रक्रिया कई महीनों पहले से शुरू होती है। यह प्रक्रिया केवल मूर्तिकला नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना मानी जाती है।
मूर्ति का ढांचा तैयार करने के लिए सबसे पहले बांस की खपच्चियों और पुआल (धान की पराली) का ढांचा बांधा जाता है। इसके बाद गंगा नदी के तल से निकाली गई चिकनी मिट्टी में गाय का गोबर, पवित्र गोमूत्र, धान की भूसी और जूट के रेशे मिलाए जाते हैं। इसमें गंगाजल और पुण्य माटी का सम्मिश्रण कर कई परतों में पुआल के ढांचे पर चढ़ाया जाता है। प्रत्येक परत के सूखने के बाद उस पर बारीक नक्काशी की जाती है और अंत में प्राकृतिक रंगों व सिंदूर से देवी के स्वरूप को जीवंत किया जाता है।

Navratri Kalash Sthapana: बदलते समय में परंपरा का वर्तमान स्वरूप

आधुनिकता और समय के प्रवाह के साथ ‘पुण्य माटी’ जुटाने के व्यावहारिक स्वरूप में भी बदलाव आया है। पहले जहां मूर्तिकार व्यक्तिगत रूप से इन इलाकों में जाकर औपचारिक रूप से मिट्टी मांगते थे, वहीं अब समय की कमी और व्यावसायिक आयोजनों के कारण यह प्रथा कुछ हद तक प्रतीकात्मक रह गई है।
वर्तमान में कोलकाता और आसपास के पारंपरिक कुम्हार केवल बड़े या पारंपरिक रजवाड़ी (पारिवारिक) पूजा आयोजनों के लिए ही इस नियम का पूर्ण पालन करते हैं। कई बार स्थानीय संस्थाएं या पुरोहित पहले से ही यह मिट्टी लाकर मूर्तिकारों को सौंप देते हैं। हालांकि, रीति का स्वरूप चाहे कितना भी बदल गया हो, लेकिन इस परंपरा के पीछे निहित वैचारिक गहराई आज भी यह सिखाती है कि सच्ची आस्था सभी भेदों को मिटाकर प्रत्येक आत्मा में दिव्यता को स्वीकार करने का नाम है।

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