साफ दिखने वाला पानी भी हो सकता है खतरनाक, कैंसर के खतरे के बीच 66 साल पुराने मानक पर सवाल

पानी का रंग और स्वाद सामान्य होने का मतलब यह नहीं कि वह पूरी तरह सुरक्षित है।

0

Nitrate in Drinking Water: पीने का स्वच्छ और सुरक्षित पानी मानव जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है। आमतौर पर लोग पानी की पारदर्शिता, रंगहीनता और गंधहीन होने के आधार पर ही यह मान लेते हैं कि वह पीने योग्य और पूरी तरह सुरक्षित है। हालांकि, जल सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार दृश्यमान स्वच्छता किसी भी जल स्रोत के रासायनिक रूप से सुरक्षित होने का प्रमाण नहीं है। पानी में कई ऐसे अदृश्य और गंधहीन अकार्बनिक यौगिक घुले हो सकते हैं जिनका पता केवल प्रयोगशाला परीक्षणों के माध्यम से ही संभव है। इन्हीं हानिकारक तत्वों में से एक प्रमुख तत्व नाइट्रेट (Nitrate) है, जिसकी भूजल और पेयजल आपूर्ति में बढ़ती सांद्रता को लेकर वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संगठनों के बीच गंभीर विमर्श छिड़ गया है।

दुनियाभर के 85 अग्रणी सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण और वैज्ञानिक संगठनों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से पेयजल में नाइट्रेट की अनुमेय सीमा से संबंधित 66 वर्ष पुराने अंतरराष्ट्रीय मानकों की तत्काल समीक्षा करने की औपचारिक मांग की है। संगठनों का तर्क है कि मौजूदा मानक 1950 के दशक के वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित हैं, जबकि हालिया जैव-चिकित्सकीय अध्ययनों ने नाइट्रेट के दीर्घकालिक उपभोग को आंतों के कैंसर और गर्भस्थ शिशुओं के विकास से जुड़ी गंभीर जटिलताओं से जोड़ा है।

Nitrate in Drinking Water: वर्ष 1958 में निर्धारित हुई थी नाइट्रेट की 50 mg/L की सीमा

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मौजूदा पेयजल गुणवत्ता दिशानिर्देशों (Guidelines for Drinking-water Quality) के तहत नाइट्रेट की अधिकतम सुरक्षित सीमा 50 मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) निर्धारित है। यह अंतरराष्ट्रीय मानक मूल रूप से वर्ष 1958 में तैयार किया गया था। उस दौर में इस सीमा को तय करने का एकमात्र प्राथमिक उद्देश्य नवजात शिशुओं को ‘मेथेमोग्लोबिनेमिया’ (Methemoglobinemia) नामक गंभीर और जानलेवा स्थिति से बचाना था, जिसे सामान्य बोलचाल में ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ कहा जाता है।

इस चिकित्सीय स्थिति में जब शिशुओं द्वारा नाइट्रेट युक्त पानी से बना फॉर्मूला दूध ग्रहण किया जाता है, तो शरीर के भीतर नाइट्रेट नाइट्राइट में परिवर्तित होकर हीमोग्लोबिन से जुड़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप रक्त की शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने की प्राकृतिक क्षमता अवरुद्ध हो जाती है और शिशु का शरीर नीला पड़ने लगता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 1958 का यह मानक अल्पकालिक और गंभीर विषाक्तता की रोकथाम के लिए बनाया गया था, किंतु इसमें वयस्कों द्वारा दशकों तक कम मात्रा में नाइट्रेट के लगातार सेवन से होने वाले दीर्घकालिक नुकसानों का आकलन नहीं किया गया था।

गहन कृषि पद्धतियां और रासायनिक उर्वरक बने जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत

नाइट्रेट पर्यावरण में प्राकृतिक नाइट्रोजन चक्र के हिस्से के रूप में भी मौजूद रहता है, किंतु आधुनिक समय में इसकी सांद्रता में अत्यधिक वृद्धि का मुख्य कारण गहन कृषि पद्धतियां हैं। फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए खेतों में अंधाधुंध रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों जैसे यूरिया और अमोनियम नाइट्रेट का उपयोग किया जाता है। जब पौधों की आवश्यकता से अधिक मात्रा में इन खादों का छिड़काव होता है, तो सिंचाई और मानसूनी बारिश के पानी के साथ अतिरिक्त नाइट्रेट रिसकर मिट्टी की गहरी परतों से होता हुआ सीधे भूजल स्तर (Aquifers) तक पहुंच जाता है।

इसके अलावा वाणिज्यिक पशुपालन इकाइयों से निकलने वाला अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज और पुराने सेप्टिक टैंकों से होने वाला रिसाव भी भूजल स्रोतों को तेजी से दूषित कर रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि नाइट्रेट पानी के स्वाद, गंध या रंग में कोई बदलाव नहीं लाता, जिसके चलते ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बोरवेल या हैंडपंप पर निर्भर आबादी बिना किसी चेतावनी के इस दूषित पानी का नियमित सेवन करती रहती है।

कैंसर और प्रसव जटिलताओं पर हालिया अध्ययनों के निष्कर्ष

85 स्वास्थ्य संगठनों द्वारा प्रस्तुत विस्तृत दस्तावेज में हालिया अंतरराष्ट्रीय महामारी विज्ञान (Epidemiological) अध्ययनों का हवाला दिया गया है। इन अनुसंधानों के अनुसार पेयजल में नाइट्रेट की निरंतर उपस्थिति शरीर के भीतर ‘एन-नाइट्रोसो यौगिकों’ (N-nitroso compounds) का निर्माण कर सकती है, जो शक्तिशाली कार्सिनोजेन (कैंसर कारक) माने जाते हैं। शोधकर्ताओं ने संकेत दिया है कि दशकों तक नाइट्रेट युक्त पानी पीने से कोलोरेक्टल (बड़ी आंत और मलाशय) कैंसर, थायरॉयड विकार और गैस्ट्रिक कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं में नाइट्रेट का सेवन समय से पहले प्रसव (Preterm Birth) और जन्म के समय शिशु के कम वजन (Low Birth Weight) के जोखिम को बढ़ा सकता है।

हालांकि, वैज्ञानिक समुदाय में इस विषय पर अभी आम सहमति नहीं बन पाई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2022 की रासायनिक समीक्षा के अनुसार उपलब्ध साक्ष्य प्रत्यक्ष कारण-प्रभाव (Causality) को पूरी तरह अकाट्य रूप से प्रमाणित नहीं करते, क्योंकि खानपान के अन्य कारक और जीवनशैली भी कैंसर के जोखिम को प्रभावित करते हैं। वर्तमान वैश्विक बहस का मुख्य आधार यही है कि क्या एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle) के तहत सुरक्षित सीमा को घटाया जाना चाहिए।

सीमा को 50 से घटाकर 6 मिलीग्राम प्रति लीटर करने का प्रस्ताव

इस नीतिगत बदलाव के समर्थन में डेनमार्क की आधिकारिक विशेषज्ञ समिति की समीक्षा रिपोर्ट का प्रमुखता से उल्लेख किया जा रहा है। डेनिश शोधकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययनों के आधार पर सिफारिश की है कि जनस्वास्थ्य की दीर्घकालिक सुरक्षा हेतु पेयजल में नाइट्रेट की सीमा को घटाकर 6 से 9 मिलीग्राम प्रति लीटर के स्तर पर लाया जाना चाहिए, जो कि डब्ल्यूएचओ के मौजूदा 50 मिलीग्राम के मानक का महज एक छोटा अंश है।

संगठनों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और घटते भूजल स्तर के बीच पेयजल सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए नियामक संस्थाओं को अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं में तेजी लानी होगी और आगामी संशोधन चक्र में इस मुद्दे को प्राथमिकता देनी होगी।

Nitrate in Drinking Water: बीआईएस मानक और नियमित जल परीक्षण की अनिवार्यता

भारत के परिप्रेक्ष्य में यह विषय अत्यंत संवेदनशील है, क्योंकि देश की ग्रामीण और अर्ध-शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी दैनिक पेयजल आवश्यकताओं के लिए सीधे भूजल और नलकूपों पर निर्भर है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के मानक IS 10500:2012 के अनुसार देश में पीने के पानी में नाइट्रेट की स्वीकार्य सीमा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर निर्धारित की गई है, तथा इसके लिए कोई छूट सीमा (Relaxation) प्रदान नहीं की गई है।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) द्वारा समय-समय पर जारी किए गए निगरानी अध्ययनों में देश के कई कृषि प्रधान और अत्यधिक सिंचित जिलों के भूजल में नाइट्रेट का स्तर निर्धारित 45 mg/L की सीमा से काफी अधिक पाया गया है। जल विशेषज्ञों की स्पष्ट सलाह है कि जो परिवार या आवासीय परिसर निजी बोरवेल, सबमर्सिबल पंप या खुले कुओं के पानी का उपयोग करते हैं, उन्हें साल में कम से कम एक बार एनएबीएल (NABL) प्रमाणित प्रयोगशाला से अपने जल स्रोत के रासायनिक और जैविक तत्वों की व्यापक जांच करानी चाहिए। सामान्य रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) या आयन-एक्सचेंज तकनीक ही पानी से नाइट्रेट को हटाने में सक्षम होती हैं, जबकि पानी को सामान्य उबालने से नाइट्रेट समाप्त नहीं होता बल्कि वाष्पीकरण के कारण उसकी सांद्रता और अधिक बढ़ जाती है।

Read More Here

Stress and Sleep: क्या तनाव और नींद की कमी से पड़ सकते हैं मिर्गी के दौरे? जानें इसके कारण और बचाव के उपाय

Monastery Stay in India: लद्दाख और सिक्किम के 4 बौद्ध मठ, जहां प्रकृति के बीच मिलेगा मेडिटेशन और सुकून का अनुभव

Supreme Court on POCSO Court Posting: दुष्कर्म केस के आरोपी जज की POCSO कोर्ट में तैनाती पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

दिवाली पर कौड़ी को क्यों माना जाता है मां लक्ष्मी का प्रतीक? जानें पूजा के बाद तिजोरी में रखने की मान्यता

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.