Supreme Court on POCSO Court Posting: दुष्कर्म केस के आरोपी जज की POCSO कोर्ट में तैनाती पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
दुष्कर्म के मामले में आरोपपत्र का सामना कर रहे अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अशोक भारतेन्दु की विशेष POCSO अदालत में तैनाती को पीड़िता ने चुनौती दी है।
Supreme Court on POCSO Court Posting: उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म के एक आपराधिक मामले में आरोपपत्र का सामना कर रहे एक अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत में पीठासीन अधिकारी के रूप में तैनाती का मामला अब देश की शीर्ष अदालत पहुंच गया है। पीड़िता द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर गंभीर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि एक संवेदनशील न्यायिक पद पर तैनाती के संदर्भ में शिकायतकर्ता के अधिकारों के साथ-साथ आरोपी अधिकारी के निष्पक्ष प्रक्रिया के विधिक अधिकार के बीच भी न्यायसंगत संतुलन साधना आवश्यक है।
Supreme Court on POCSO Court Posting: न्यायिक जवाबदेही और संवेदनशील पदों पर तैनाती को लेकर खड़ा हुआ विवाद
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश कैडर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अशोक भारतेन्दु से संबंधित है, जिनके विरुद्ध राजधानी दिल्ली में दुष्कर्म के गंभीर आरोपों में प्राथमिकी दर्ज है और मामले में आरोपपत्र भी दाखिल हो चुका है। इसके बावजूद उन्हें बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण प्रदान करने वाले विशेष पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत का दायित्व सौंपा गया।
पीड़िता ने इसी प्रशासनिक निर्णय को गंभीर नैतिक और संस्थागत विसंगति बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जो न्यायिक अधिकारी स्वयं यौन अपराध के मामले में अभियोजन का सामना कर रहा हो, उसे यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों के मामलों में न्याय वितरण की बागडोर सौंपना पीड़िता और समाज के मन में न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने जारी किया नोटिस
सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने 2 नवंबर 2026 को इस याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के महानिबंधक (Registrar General) और संबंधित न्यायिक अधिकारी को औपचारिक नोटिस जारी किया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ आपराधिक अदालत में मुकदमा चल रहा है और आरोपपत्र दाखिल होने के बाद अदालत ने संज्ञान भी ले लिया है। ऐसी स्थिति में कम से कम पॉक्सो जैसी अत्यधिक संवेदनशील अदालतों से उन्हें तत्काल प्रभाव से अलग किया जाना चाहिए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में स्पष्ट किया कि किसी भी न्यायिक अधिकारी को उसके पद से हटाने या किसी विशेष अदालत से स्थानांतरित करने का प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और उच्च न्यायालय प्रशासन के पास सुरक्षित है। शीर्ष अदालत इस स्तर पर केवल यह सुनिश्चित करना चाहती है कि आंतरिक विजिलेंस जांच और प्राप्त शिकायतों पर अब तक प्रशासनिक स्तर पर क्या उचित कदम उठाए गए हैं।
दिल्ली के मयूर विहार थाने में दर्ज हुआ था मामला
इस कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि वर्ष 2022 से जुड़ी हुई है। 8 दिसंबर 2022 को दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 पुलिस स्टेशन में संबंधित न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म) सहित अन्य संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि न्यायिक अधिकारी ने विवाह का झूठा आश्वासन देकर और भावनात्मक शोषण करते हुए उनके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किए थे।
प्राथमिकी दर्ज होने के उपरांत अधिकारी ने इसे रद्द कराने और दंडात्मक कार्रवाई से बचने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मार्च 2023 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें संभावित गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया था, किंतु यह स्पष्ट कर दिया था कि जांच एजेंसी द्वारा की जा रही वैधानिक जांच और निचली अदालत में चलने वाली आपराधिक कार्यवाही पर किसी प्रकार का स्थगन नहीं है।
दिल्ली पुलिस ने विवेचना पूरी करने के उपरांत साक्ष्यों के आधार पर अदालत में औपचारिक आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल किया, जिस पर दिल्ली की कड़कड़डूमा स्थित सक्षम अदालत ने औपचारिक संज्ञान लेते हुए मामले को अग्रिम चरण में बढ़ा दिया। विधिक सिद्धांत के अनुसार आरोपपत्र दाखिल होना या अदालत द्वारा संज्ञान लेना दोषसिद्धि का प्रमाण नहीं है और अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के पूर्ण होने पर ही निर्भर करेगा।
आरटीआई अस्वीकार होने के बाद हाईकोर्ट से नहीं मिली थी राहत
आपराधिक मामला आगे बढ़ने के दौरान पीड़िता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन के समक्ष विजिलेंस शिकायत दर्ज कराई थी और इस जांच की वर्तमान स्थिति जानने के लिए सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत आवेदन प्रस्तुत किया था। हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (CPIO) ने जानकारी साझा करने से यह कहते हुए मना कर दिया कि उत्तर प्रदेश के राज्यपाल द्वारा जारी एक पूर्व अधिसूचना के तहत हाईकोर्ट के विजिलेंस सेल को आरटीआई अधिनियम के दायरे से छूट प्राप्त है।
सूचना न मिलने और आंतरिक कार्रवाई की गति से असंतुष्ट होकर शिकायतकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर अधिकारी की पॉक्सो कोर्ट में तैनाती को रद्द करने की मांग की थी। परंतु इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि अपने न्यायिक अधिकारियों के प्रशासनिक दायित्वों और कोर्ट पोस्टिंग का निर्धारण करना पूर्णतः हाईकोर्ट प्रशासन का विशेषाधिकार है और आपराधिक मामले का निस्तारण निर्धारित विधिक प्रक्रिया के तहत किया जाएगा। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
Supreme Court on POCSO Court Posting: निष्पक्ष प्रक्रिया और संवेदनशील पद के बीच संतुलन पर जोर
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत को शिकायतकर्ता की गंभीर चिंताओं और आरोपी न्यायिक अधिकारी के निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकारों के बीच विवेकपूर्ण संतुलन कायम रखना होगा। पीठ ने इस बात पर सहमति जताई कि पॉक्सो अदालतें बाल संरक्षण और यौन अपराधों से जुड़ी होने के कारण समाज में अत्यंत संवेदनशील मानी जाती हैं और न्यायिक संस्था की गरिमा एवं जनता के विश्वास को अक्षुण्ण बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।
अदालत ने कहा कि बिना किसी प्रशासनिक समीक्षा या विहित प्रक्रिया के केवल आरोपों के आधार पर किसी अधिकारी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता, लेकिन साथ ही प्रशासनिक स्तर पर इन गंभीर तथ्यों की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 11 दिसंबर 2026 के लिए नियत की है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन को विजिलेंस जांच और तैनाती के संदर्भ में अपना आधिकारिक पक्ष प्रस्तुत करना होगा।
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