दिवाली पर कौड़ी को क्यों माना जाता है मां लक्ष्मी का प्रतीक? जानें पूजा के बाद तिजोरी में रखने की मान्यता

दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजन में कौड़ी अर्पित करने की पुरानी परंपरा है।

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Cowrie Shell: सनातन धर्म में कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपावली का महापर्व धन, वैभव और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी और प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश के स्वागत का सबसे बड़ा अनुष्ठान है। इस पावन निशा पर घरों को दीपों की कतारों से सजाने के साथ-साथ पारंपरिक वैदिक विधि-विधान से लक्ष्मी-गणेश का पूजन किया जाता है। दिवाली की पूजा में मिष्ठान्न, फल, खील-बताशे और सुंगधित पुष्पों के साथ ही कुछ विशेष प्राकृतिक द्रव्यों को शामिल करने की अत्यंत समृद्ध परंपरा है। इनमें सबसे प्रमुख और चमत्कारी मानी जाने वाली वस्तु है कौड़ी (Cowrie Shell)।

भारतीय परिवारों में सदियों से दिवाली पूजन की थाली में पीली अथवा सफेद कौड़ियां रखने का प्रचलन रहा है। प्राचीन मान्यता है कि कौड़ी केवल एक समुद्री वस्तु नहीं, बल्कि साक्षात महालक्ष्मी के स्वरूप और कृपा का प्रत्यक्ष प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधिपूर्वक पूजित कौड़ियों को तिजोरी या धन के स्थान पर रखने से घर में बरकत और आर्थिक स्थायित्व बना रहता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि कौड़ी का मां लक्ष्मी से क्या संबंध है, पीली और सफेद कौड़ी का क्या महत्व है तथा पूजन के उपरांत इन्हें किस प्रकार सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

Cowrie Shell: समुद्र मंथन और महालक्ष्मी से कौड़ी का अटूट संबंध

कौड़ी को देवी लक्ष्मी का रूप या उनका सहोदर (भाई) मानने के पीछे एक गहरा पौराणिक संदर्भ विद्यमान है। श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण के आख्यानों के अनुसार, जब देवों और असुरों द्वारा क्षीरसागर में समुद्र मंथन किया गया था, तब चौदह रत्नों में से एक के रूप में मां लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। चूंकि कौड़ी की उत्पत्ति भी समुद्र की अगाध गहराइयों से ही होती है, इसलिए पौराणिक दृष्टिकोण से कौड़ी को मां लक्ष्मी का सहोद्र माना जाता है।

समुद्र से उत्पन्न होने के कारण कौड़ी में जल तत्व और चंद्रमा की शीतलता का वास माना गया है, जो शांति और आकर्षण का प्रतीक है। प्राचीन काल में जब धातु के सिक्कों का व्यापक प्रचलन नहीं था, तब कौड़ियों का उपयोग मुद्रा (Currency) के रूप में विनिमय के लिए किया जाता था। इस ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि के कारण कौड़ी को धन-सम्पदा, क्रय-शक्ति और समृद्धि की संवाहक माना गया। दीपावली की महानिशा पर लक्ष्मी पूजन के समय कौड़ियों को वेदी पर स्थापित करने से माता लक्ष्मी की कृपा स्वतः आकर्षित होती है।

पीली और सफेद कौड़ी का धार्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व

दिवाली के पूजन में मुख्य रूप से दो प्रकार की कौड़ियों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट महत्व है। सामान्यतः मिलने वाली कौड़ियां सफेद रंग की होती हैं, जो चंद्र देव और शुक्र ग्रह के सौम्य प्रभाव को दर्शाती हैं। हालांकि, तंत्र शास्त्र और शास्त्रों में मां लक्ष्मी की आराधना के लिए पीली कौड़ी (कनक कौड़ी) को सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया गया है। पीला रंग भगवान श्रीहरि विष्णु और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

यदि प्राकृतिक रूप से पीली कौड़ी उपलब्ध न हो, तो श्रद्धालु शुद्ध सफेद कौड़ियों को केसर या पिसी हुई हल्दी के घोल में डुबोकर पीला कर लेते हैं। पूजन की थाली में विषम संख्या में, जैसे कि पांच, सात, ग्यारह या इक्कीस कौड़ियां रखी जाती हैं। इन पर गंगाजल छिड़क कर रोली, अक्षत और अष्टगंध का तिलक लगाया जाता है। मान्यता है कि हल्दी से रंगी गई कौड़ियां भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी के संयुक्त अनुग्रह का माध्यम बनती हैं, जिससे घर के वास्तु दोष शांत होते हैं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

लक्ष्मी पूजन के बाद कौड़ी को तिजोरी में रखने की विधि

दीपावली की रात लक्ष्मी-गणेश पूजन के दौरान कौड़ियों को देवी के चरणों में या धन-कलश के पास स्थापित कर उनकी विधिवत पूजा और मंत्र जाप किया जाता है। पूजा की रात कौड़ियों को वहीं वेदी पर ही विश्राम करने दिया जाता है। अगली सुबह या भाई दूज के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर शुभ मुहूर्त में इन कौड़ियों का विसर्जन या तिजोरी में स्थापना की जाती है।

कौड़ियों को रखने की सही विधि यह है कि एक नया, बिना फटा लाल या पीले रंग का सूती या रेशमी कपड़ा लिया जाए। इस कपड़े पर गंगाजल छिड़कें और पूजन में प्रयुक्त सभी कौड़ियों को इसमें रखकर उस पर थोड़ा सा अक्षत और एक चांदी का सिक्का अथवा सुपारी रखें। इसके पश्चात उस कपड़े को मोड़कर एक सुरक्षित पोटली का रूप दे दें। पोटली पर रोली और कुमकुम से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। अब मां लक्ष्मी का स्मरण करते हुए इस पोटली को अपनी तिजोरी, अलमारी के लॉकर या व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य कैश बॉक्स में इस प्रकार रखें कि उस पर बार-बार किसी बाहरी व्यक्ति की दृष्टि न पड़े।

Cowrie Shell: तिजोरी में कौड़ी स्थापित करने का आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव

सनातन आस्था के अनुसार तिजोरी में अभिमंत्रित कौड़ी रखने से अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण रहता है और धन संचय की प्रवृत्ति मजबूत होती है। व्यवसायी वर्ग का दृढ़ विश्वास है कि गल्ले में कौड़ी रखने से व्यापारिक मंदी दूर होती है और ग्राहकों का निरंतर आवागमन बना रहता है। यह प्रथा व्यक्ति के भीतर मितव्ययिता, अनुशासन और धन के प्रति आदर भाव को जागृत करती है।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह अनुष्ठान इस सत्य का स्मरण कराता है कि प्रकृति से प्राप्त साधारण से साधारण वस्तु भी यदि श्रद्धा और विधि-विधान से ईश्वर के चरणों में समर्पित की जाए, तो वह पवित्र और पूजनीय बन जाती है। इस प्रकार दिवाली पर कौड़ी का पूजन हमारी समृद्ध वैदिक विरासत, सांस्कृतिक चेतना और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने की एक सुंदर परंपरा है।

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