Nepal Flood Relief: तबाही के बीच मदद के लिए कौन-कौन आगे आया? भारत से चीन तक किसने क्या भेजा
Nepal Flood Relief: नेपाल में भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ के बाद भारत ने 68 टन से अधिक राहत भेजी। चीन, अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों की मदद व बचाव अभियान की ताजा तस्वीर।
Nepal Flood Relief: नेपाल के पहाड़ी इलाकों में अचानक आई भीषण बाढ़ ने पूरे इलाके को हिला दिया है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के किनारे बस्तियां, सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं तहस-नहस हो गई हैं। सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
नेपाल सरकार अपने सुरक्षा बलों और आपदा प्रबंधन तंत्र के साथ राहत चला रही है। साथ ही कई देश और संस्थाएं मदद के लिए आगे आए हैं। सवाल यही है कि इस मुश्किल घड़ी में किसने क्या दिया और बचाव अभी कहां अटका हुआ है।
Nepal Flood Relief: बाढ़ ने कितना नुकसान किया है
आपदा 26 अगस्त के आसपास नेपाल-तिब्बत सीमा के पास पहाड़ी ढलान और हिमनद से जुड़े मलबे के टूटने के बाद शुरू हुई बताई जाती है। पानी, कीचड़ और पत्थर भोटेकोशी होते हुए त्रिशूली की ओर बहे। रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन, गोरखा और आसपास के जिलों में तबाही सबसे ज्यादा दिखी।
आधिकारिक आंकड़े हर कुछ घंटे बदल रहे हैं। नेपाल के आपदा प्राधिकरण के ताजा अपडेट में मौतों का आंकड़ा सात सौ से ऊपर बताया गया है। लापता लोगों की संख्या अभी भी हजारों में है। कई शव नीचे की ओर बहकर दूर के जिलों तक पहुंचे हैं। जलविद्युत सुरंगों में फंसे मजदूरों की तलाश सबसे कठिन काम बन गई है।
नेपाल सरकार क्या कर रही है
काठमांडू का पहला जोर जान बचाने, लापता लोगों को ढूंढने और प्रभावितों तक राशन-दवाई पहुंचाने पर है। हजारों सुरक्षाकर्मी और हेलीकॉप्टर मैदान में हैं। मलबा हटाने और संपर्क बहाल करने का काम भी साथ-साथ चल रहा है।
नेपाल ने पहले व्यापक विदेशी सर्च टीमों को लेकर कुछ हिचक दिखाई थी। 2015 के भूकंप का अनुभव सामने था, जब बहुत सी टीमों के आने से तालमेल बिगड़ गया था। बाद में सुरंग बचाव, फॉरेंसिक और डीएनए जांच जैसी खास मदद स्वीकार की गई। मामला कुछ इस तरह से है कि सामान्य भीड़ नहीं, विशेषज्ञ हाथ चाहिए थे।
भारत ने सबसे तेज राहत पहुंचाई
भारत इस आपदा में सबसे पहले भौतिक मदद पहुंचाने वाले देशों में रहा। भारतीय वायुसेना के विमानों से अब तक करीब 68.5 टन राहत सामग्री काठमांडू भेजी जा चुकी है। कंबल, तिरपाल, स्लीपिंग बैग, स्वच्छता किट, दवाएं और जरूरी सामान इसमें शामिल हैं।
चौथी उड़ान में सुरंग बचाव का तकनीकी दल और डीएनए जांच के लिए फॉरेंसिक विशेषज्ञ भी गए। संपर्क तोड़ी सड़कों के लिए बेली ब्रिज और मॉड्यूलर स्टील पुल का सामान ट्रकों से नेपाल पहुंचाया जा रहा है। भारतीय टीम नेपाली सेना के साथ चिलिमे और लांगटांग इलाके की जलविद्युत सुरंगों में तलाश कर रही है।
भारत के कई नागरिक भी लापता बताए गए हैं। कुछ कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़े थे, कुछ परियोजनाओं पर काम कर रहे थे। दिल्ली का प्रयास अपने नागरिकों का पता लगाने और नेपाल को राहत देने दोनों मोर्चों पर एक साथ चल रहा है। नेपाल के विदेश मंत्री ने भारत की तत्काल मदद के लिए आभार जताया है।
चीन की मदद सीमा पार की तबाही से जुड़ी है
चीन भी आगे आया है। तिब्बत के गिरोंग इलाके में भी बाढ़ और मलबे से नुकसान हुआ है। वहां भी मौतें और बड़ी संख्या में लापता बताए गए हैं। चीन ने नेपाल को राहत सामग्री, नकदी सहायता और सुरंग बचाव विशेषज्ञ भेजने की बात कही है।
दोनों देशों की सीमा क्षेत्र साझा है, इसलिए पानी का बहाव और मौसम की जानकारी का आदान-प्रदान भी राहत का हिस्सा बन गया है। चीन की टीम भारतीय दल की तरह खास तौर पर उन सुरंगों पर केंद्रित है जहां मजदूर फंसे हो सकते हैं। देखने पर लगता है कि आपदा ने सिर्फ एक देश को नहीं, पूरे हिमालयी सीमा क्षेत्र को झकझोर दिया है।
अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे देशों का सहयोग
अमेरिका और ब्रिटेन ने तत्काल वित्तीय सहायता का ऐलान किया है। मानवीय राहत, चिकित्सा और लापता नागरिकों की खोज में सहयोग की बात कही गई है। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया से डीएनए जांच तथा फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मांग नेपाल ने की थी। कोरियाई सुरंग विशेषज्ञ भी मैदान में बताए गए हैं।
जापान, श्रीलंका, बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और सिंगापुर जैसे देशों ने भी राहत सामग्री या संपर्क कर मदद की प्रतिबद्धता जताई है। संयुक्त राष्ट्र ने आपात कोष से रकम जारी की है। रेड क्रॉस ने प्रभावितों की संख्या नब्बे हजार के आसपास बताते हुए अपील शुरू की है। आंकड़े अलग-अलग एजेंसियों में थोड़े भिन्न हैं, लेकिन दिशा एक है तुरंत राहत और फिर पहचान।
Nepal Flood Relief: बैंक और लंबे समय की मरम्मत
विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसी संस्थाओं से वित्तीय पैकेज और दीर्घकालिक मदद की चर्चा चल रही है। पुल, सड़क और जलविद्युत ढांचा दोबारा खड़ा करना आसान नहीं होगा। अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत भी अब साफ दिख रही है।
अभी का काम शवों की पहचान और परिवारों तक सूचना पहुंचाना भी है। इसीलिए फॉरेंसिक और डीएनए क्षमता इतनी महत्वपूर्ण हो गई है। गर्मी और मलबे के बीच यह काम संवेदनशील और धीमा दोनों है।
एक छोटा सा ट्विस्ट यह है कि कई लापता लोग पर्यटक नहीं, जलविद्युत सुरंगों के अंदर काम करने वाले मजदूर हैं। पहाड़ पर बिजली परियोजनाएं रोजगार देती हैं, लेकिन आपदा आने पर वही सुरंगें जाल बन जाती हैं। बचाव दल की सबसे बड़ी चुनौती कीचड़ से बंद मुहाने और फिर से बढ़ता जलस्तर है। रविवार को भोटेकोशी में पानी फिर बढ़ने की चेतावनी भी आई।
नेपाल इस वक्त दोहरी लड़ाई लड़ रहा है। एक तरफ लापता लोगों को निकालना है, दूसरी तरफ टूटे पुलों और बस्तियों को दोबारा जोड़ना है। भारत की तेज राहत, चीन की सीमा साझा तैयारी और अन्य देशों की विशेषज्ञ मदद इस मुश्किल को थोड़ा हल्का कर रही है। मौतों के आंकड़े अभी अंतिम नहीं हैं। खोज जारी है। परिवार इंतजार कर रहे हैं। आगे की राहत और पुनर्निर्माण पर सबकी नजर बनी रहेगी।
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