Maharashtra delivery workers: महाराष्ट्र में स्विगी, जोमैटो और जेप्टो डिलीवरी वर्कर्स के लिए बड़ी राहत: सरकार ला रही पेंशन, लोन और वेलफेयर फंड के नए नियम

Swiggy-Zomato डिलीवरी राइडर्स के लिए पेंशन, बीमा, EV लोन और शिक्षा सहायता का प्रस्ताव

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Maharashtra delivery workers: महाराष्ट्र सरकार राज्य में काम कर रहे लाखों गीग वर्कर्स (Gig Workers) और डिलीवरी पार्टनर्स के सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाने जा रही है। स्विगी (Swiggy), जोमैटो (Zomato), जेप्टो (Zepto) और ब्लिंकिट (Blinkit) जैसी प्रमुख क्विक-कॉमर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों को अब राज्य के ‘महाराष्ट्र बाइक टैक्सी नियम’ के दायरे में लाने की तैयारी पूरी हो चुकी है।
परिवहन विभाग ने ‘महाराष्ट्र बाइक टैक्सी रूल्स’ में व्यापक संशोधनों का प्रस्ताव तैयार किया है। इन संशोधनों के लागू होते ही इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को राज्य सरकार की नीतियों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य हो जाएगा। इस नई नीति से डिलीवरी राइडर्स को पेंशन, दुर्घटना बीमा, ईवी वाहन खरीदने के लिए लोन और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके साथ ही कंपनियों को अपने बेड़े में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को शामिल करना होगा, जिससे राज्य में प्रदूषण नियंत्रण को भी नई गति मिलेगी।

Maharashtra delivery workers: कानूनी ढांचे में बड़ा बदलाव: राज्य स्तर पर तय होगी कंपनियों की सीधी जवाबदेही

राज्य सरकार के इस नीतिगत कदम का मुख्य उद्देश्य डिलीवरी करने वाले ड्राइवर्स को एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा कवच प्रदान करना है। इसके साथ ही राज्य में पर्यावरण को स्वच्छ बनाना और स्थानीय युवाओं के लिए सुरक्षित रोजगार के अवसर पैदा करना भी प्रमुख लक्ष्य रखा गया है।
अब तक ये डिजिटल प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से केंद्र सरकार के उपभोक्ता संरक्षण कानून (Consumer Protection Act) और सामाजिक सुरक्षा कोड (Code on Social Security) के अंतर्गत संचालित होते थे। इस कारण किसी प्रकार के विवाद, शिकायत या सुरक्षा संबंधी मामलों में राज्य सरकार के पास सीधे हस्तक्षेप और कार्रवाई करने के अधिकार सीमित थे। नए नियमों के लागू होने के बाद राज्य स्तर पर इन प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करने का कानूनी रास्ता खुल जाएगा। राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के अनुसार, विभाग ने ‘डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर’ की परिभाषा को व्यापक बनाया है, ताकि पार्सल, भोजन या त्वरित सामान की डिलीवरी करने वाले सभी दोपहिया वाहन इस कानून के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आ सकें।

15 किलोमीटर से कम दूरी के ऑपरेशन्स पर सख्ती, जीपीएस ट्रैकिंग और यूनिक लाइसेंस अनिवार्य

प्रस्तावित नियमों के तहत 15 किलोमीटर से कम दूरी के व्यावसायिक ऑपरेशन्स के लिए चलने वाली सभी टू-व्हीलर डिलीवरी गाड़ियों को इन नए नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा। इससे स्थानीय और मध्यम दूरी के ऑर्डर पर काम करने वाले राइडर्स को भी सुरक्षा के कानूनी दायरे में लाया जा सकेगा।
कंपनियों को चरणबद्ध तरीके से अपने पूरे काफिले को इलेक्ट्रिक वाहनों (EV Fleet) में बदलना होगा। पारदर्शिता और यात्रियों तथा चालकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सभी गाड़ियों और राइडर्स के लिए रियल-टाइम जीपीएस (GPS) ट्रैकिंग अनिवार्य की जाएगी। हर एग्रीगेटर कंपनी को एक यूनिक लाइसेंस आइडेंटिफिकेशन नंबर प्राप्त करना होगा और राज्य परिवहन आयुक्त द्वारा विकसित विशेष डिजिटल पोर्टल से सीधे जुड़ना होगा। इस एकीकृत प्रणाली के जरिए वाहनों और राइडर्स की लाइव मॉनिटरिंग सीधे राज्य परिवहन विभाग द्वारा की जा सकेगी।

इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर से पर्यावरण को मिलेगा बड़ा लाभ

नियमों में इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को अनिवार्य बनाने से मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे बड़े शहरों में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिलेगी। पारंपरिक पेट्रोल बाइकों की तुलना में इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन बेहद कम कार्बन उत्सर्जन करते हैं और लंबी अवधि में इनके संचालन की लागत भी काफी कम आती है।
कंपनियों को अपने मौजूदा पेट्रोल बेड़े को पूरी तरह ईवी में बदलने के लिए एक निश्चित समयावधि दी जाएगी। जीपीएस ट्रैकिंग अनिवार्य होने से डिलीवरी ऑपरेशन्स में पारदर्शिता आएगी, जिससे ग्राहकों को भी अपने पार्सल की सटीक और रियल-टाइम जानकारी मिल सकेगी। राज्य सरकार का मानना है कि इन दूरगामी सुधारों से असंगठित माना जाने वाला डिलीवरी क्षेत्र अब एक व्यवस्थित और सामाजिक रूप से जिम्मेदार उद्योग का रूप ले सकेगा।

देश में पहली बार वेलफेयर फंड का मॉडल, अन्य राज्यों से आगे निकला महाराष्ट्र

यद्यपि दिल्ली (Delhi Motor Vehicle Aggregator Scheme) और हरियाणा जैसे राज्यों ने भी अपने डिलीवरी बेड़े के सौ फीसदी विद्युतीकरण (Electrification) के लिए नीतियां बनाई हैं, लेकिन महाराष्ट्र गीग वर्कर्स के लिए ऐसा विशेष कल्याणकारी कोष (Welfare Fund) गठित करने वाला पहला अग्रणी राज्य बन रहा है।
यह वेलफेयर फंड मॉडल भारत की तेजी से बढ़ती गीग इकॉनमी में काम करने वाले लाखों युवाओं के लिए एक बड़ा सुरक्षा चक्र साबित होगा। वर्तमान समय में डिलीवरी पार्टनर्स को अनियमित कमाई, सड़क दुर्घटनाओं के अत्यधिक जोखिम और किसी भी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा के अभाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सरकार की ओर से मिलने वाली पेंशन और बीमा जैसी सुविधाएं इन श्रमिकों को औपचारिक क्षेत्र (Formal Sector) के कर्मचारियों के समान अधिकार और सम्मान दिलाएंगी।

कानूनी समीक्षा के अंतिम चरण में प्रस्ताव, जल्द जारी होगी आधिकारिक अधिसूचना

फिलहाल इस नीतिगत प्रस्ताव को अंतिम कानूनी और तकनीकी समीक्षा के लिए राज्य के विधि एवं न्याय विभाग (State Law and Judiciary Department) के पास भेजा गया है। वहां से हरी झंडी मिलते ही इसे राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जाएगा और उसके तुरंत बाद आधिकारिक अधिसूचना (Notification) जारी कर दी जाएगी।
शासन का इरादा है कि कंपनियों को नए नियमों के अनुरूप ढलने और अपनी तकनीकी प्रणालियों में बदलाव करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा, ताकि आम जनता के लिए डिलीवरी सेवाएं बाधित न हों। इसके लिए राज्य सरकार और टेक कंपनियों के प्रतिनिधियों के बीच लगातार बातचीत का दौर जारी है, जिससे व्यवसाय और कर्मचारी हित दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सके।

Maharashtra delivery workers: कंपनियों के सामने आने वाली चुनौतियां और भविष्य की राह

इस नए नीतिगत बदलाव के कारण स्विगी, जोमैटो, जेप्टो और ब्लिंकिट जैसी टेक कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल में कुछ जरूरी वित्तीय और ढांचागत बदलाव करने पड़ेंगे। कंपनियों को अपने डिलीवरी बेड़े को इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने के लिए भारी शुरुआती पूंजी का निवेश करना होगा। इसके साथ ही हर राइड के किराए से 2 प्रतिशत वेलफेयर फंड में योगदान देने और जीपीएस इंटीग्रेशन से कंपनियों की परिचालन लागत (Operational Cost) में बढ़ोतरी हो सकती है।
तमाम चुनौतियों के बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि एक पारदर्शी और कानूनी ढांचा बनने से कंपनियों की विश्वसनीयता बढ़ेगी और राइडर्स की नौकरी छोड़ने की दर (Attrition Rate) में कमी आएगी। भारत के तेजी से बढ़ते क्विक-कॉमर्स सेक्टर को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महाराष्ट्र सरकार का यह ड्राफ्ट रूल्स अन्य भारतीय राज्यों के लिए भी एक रोल मॉडल साबित होगा।

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