Ladakh Travel: लद्दाख यात्रा में ये 7 गलतियां अस्पताल पहुंचा सकती हैं, समय रहते जान लें
Ladakh Travel: लद्दाख यात्रा में ये 7 गलतियां अस्पताल पहुंचा सकती हैं, समय रहते जान लें
Ladakh Travel: लद्दाख बाइक सवारों और पर्यटकों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र है। नीली झीलें, ऊंचे दर्रे, बौद्ध मठ और साफ आसमान यहां हर साल हजारों लोगों को खींचते हैं। लेकिन लेह करीब 3500 मीटर की ऊंचाई पर है। दिल्ली या मुंबई से सीधी उड़ान भरने पर शरीर को समुद्र तल से इतनी ऊंचाई पर अचानक ढलना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि कई यात्री पहले दो दिन में ही सिरदर्द, उल्टी, चक्कर और सांस फूलने की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंच जाते हैं। लद्दाख पर्यटन विभाग भी आगमन के बाद कम से कम 48 घंटे आराम की सलाह देता है। इसके बावजूद पहुंचते ही खारदुंग ला, चांग ला या पैंगोंग झील निकल जाना आम गलती बन गई है। एक्यूट माउंटेन सिकनेस के शुरुआती लक्षण नजरअंदाज करना, शराब पीना, पानी कम पीना, पहले से हृदय या फेफड़े की बीमारी छुपाना और मौसम-सड़क चेतावनियों को अनसुना करना स्थिति को गंभीर बना देता है। समय रहते इन सात गलतियों से बचा जाए तो यात्रा सुरक्षित रह सकती है।
Ladakh Travel: पहला दिन ऊंचे दर्रे पर निकल जाना सबसे बड़ी भूल है
लेह हवाई अड्डे पर उतरते ही शरीर ऑक्सीजन की कमी महसूस करने लगता है। मैदान से आए यात्री अक्सर उत्साह में उसी दिन खारदुंग ला या चांग ला का टिकट कटवा लेते हैं। ये दर्रे पांच हजार मीटर से ऊपर हैं। वहां ऑक्सीजन और भी कम हो जाती है। शरीर को लाल रक्त कण बढ़ाने और सांस की लय बदलने के लिए समय चाहिए। पहले दिन पूरा आराम और आसपास की सपाट सड़क पर हल्की सैर ही पर्याप्त है। शांति स्तूप या लेह बाजार भी दूसरे दिन ही ठीक रहते हैं। ऊंचाई तेजी से बढ़ाने से सिरदर्द और उल्टी जल्दी शुरू हो जाते हैं। कई बार स्वस्थ दिखने वाले युवा भी इसी जल्दबाजी के कारण लेह के अस्पताल पहुंचते हैं।
सिरदर्द और थकान को सामान्य समझना खतरनाक साबित होता है
ऊंचाई पर पहुंचने के छह से चौबीस घंटे बाद सिर दर्द, भूख न लगना, हल्की उल्टी, चक्कर या असामान्य थकान दिखना एक्यूट माउंटेन सिकनेस के आम संकेत हैं। कई यात्री इन्हें यात्रा की थकान मानकर आगे बढ़ जाते हैं। यह गलती महंगी पड़ सकती है। लक्षण दिखते ही ऊंचाई बढ़ाना बंद करना चाहिए। आराम, पानी और हल्का भोजन अक्सर हल्के मामले संभाल लेते हैं। दर्द की दवा से सिरदर्द कम हो सकता है, लेकिन लक्षण बने रहें तो आगे की योजना रोक देनी चाहिए। फिटनेस का भ्रम यहां काम नहीं आता। मैदान में दौड़ लगाने वाले खिलाड़ी भी ऊंचाई पर समान रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
लक्षण बढ़ने के बावजूद उसी ऊंचाई पर रुकना जोखिम बढ़ाता है
अगर सिरदर्द दवा से नहीं उतर रहा, उल्टी जारी है, चलते समय लड़खड़ाहट आ रही है, बहुत नींद आ रही है या आराम करते हुए भी सांस फूल रही है तो यह चेतावनी है। भ्रम, सीधी रेखा पर न चल पाना, आराम में भी सांस की तकलीफ या खांसी गंभीर संकेत माने जाते हैं। ऐसी स्थिति में नीचे उतरना सबसे कारगर कदम है। पैंगोंग जैसी जगह पर रुके रहने से वापसी और मुश्किल हो सकती है क्योंकि रास्ता दोबारा ऊंचे दर्रे से गुजरता है। लेह में एसएनएम अस्पताल ऊंचाई संबंधी मामलों का इलाज करता है। देरी से पहुंचने पर हालत बिगड़ सकती है। लक्षण सुधरने तक ऊंचाई न बढ़ाना ही सही नीति है।
पहले अड़तालीस घंटे शरीर पर अतिरिक्त बोझ डालना नुकसानदेह है
लद्दाख पहुंचने के बाद शुरुआती दो दिन शरीर को ढलने का समय चाहिए। इसी अवधि में शराब पीना या भारी कसरत करना फेफड़ों और हृदय पर अतिरिक्त दबाव डालता है। शराब सांस की गति धीमी कर देती है, जबकि ऊंचाई पर शरीर को तेज और गहरी सांस की जरूरत होती है। धूम्रपान भी ऑक्सीजन लेने की क्षमता घटाता है। भारी व्यायाम से हृदय की धड़कन और ऑक्सीजन की मांग दोनों बढ़ जाती हैं। हल्का भोजन, पर्याप्त पानी और सोना ही इस समय सबसे अच्छा कार्यक्रम है। कई यात्री छुट्टी का पहला दिन जश्न में बिता देते हैं और अगली सुबह बिस्तर से उठ नहीं पाते।
पानी की कमी को नजरअंदाज करना लक्षण तेज कर देता है
ऊंचाई वाली शुष्क हवा शरीर से पानी तेजी से निकालती है। सांस के साथ भी नमी जाती है। दिन में तीन से चार लीटर पानी पीना सामान्य सलाह है। चाय-कॉफी ज्यादा पीने से पेशाब बढ़ सकता है, इसलिए सादा पानी और सूप बेहतर रहते हैं। डिहाइड्रेशन सिरदर्द और थकान को और बढ़ा देता है। कई लोग प्यास न लगने पर पानी छोड़ देते हैं। यह गलती माउंटेन सिकनेस को बढ़ावा देती है। हल्की गतिविधि और नियमित पानी पीने से शरीर बेहतर ढलता है। खुद को हर हाल में फिट मानकर पानी और आराम छोड़ देना आम लेकिन घातक भूल है।
पुरानी बीमारी छुपाकर बिना सलाह के निकल पड़ना जोखिम भरा है
हृदय रोग, फेफड़े की समस्या, उच्च रक्तचाप या पहले माउंटेन सिकनेस का इतिहास रहने पर यात्रा से पहले डॉक्टर से सलाह जरूरी है। कुछ दवाएं ऊंचाई पर असर बदल सकती हैं। एसिटाजोलामाइड जैसी दवा हर किसी के लिए नहीं होती। सल्फा एलर्जी वाले लोगों को यह नहीं लेनी चाहिए। डॉक्टर ही तय कर सकते हैं कि रोकथाम की दवा चाहिए या नहीं। बिना जांच के निकलने वाले यात्री ऊंचाई पर अचानक तकलीफ में पड़ सकते हैं। स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था दूरदराज के इलाकों में सीमित है, इसलिए पहले से तैयारी बेहतर है।
मौसम और सड़क चेतावनियों को अनसुना करना जानलेवा हो सकता है
बरसात के मौसम में लद्दाख की सड़कों पर भूस्खलन का खतरा रहता है। बर्फबारी या तेज हवा में दर्रे बंद हो सकते हैं। प्रशासन समय-समय पर यात्रा सलाह जारी करता है। इन्हें नजरअंदाज करके आगे बढ़ना फंसने का कारण बनता है। खराब मौसम में ऑक्सीजन की मांग और बढ़ जाती है। रास्ते में मदद देर से पहुंच सकती है। सरकारी दिशा-निर्देश और स्थानीय गाइड की बात मानना सुरक्षित यात्रा का हिस्सा है। मौसम साफ दिखे तब भी आधिकारिक अपडेट देखना चाहिए।
लेह शहर में कुछ दिन बिताने के बाद ही ऊंची झीलों और दर्रों की योजना बनानी चाहिए। दिन में ऊंचाई पर जाकर रात निचले स्थान पर बिताना शरीर के लिए आसान रहता है। पल्स ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन स्तर देखना मददगार हो सकता है, लेकिन मशीन पर अंधविश्वास नहीं करना चाहिए। लक्षण शरीर ही सबसे पहले बताता है। साथियों को तबीयत की जानकारी देते रहना चाहिए। अकेले यात्रा करने वालों के लिए यह और जरूरी है। हल्का कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन ऊर्जा देता है। तेल-मसाले वाला भारी खाना पाचन पर बोझ डालता है। सूरज यहां तेज होता है, इसलिए धूप का चश्मा और क्रीम भी जरूरी हैं। ठंड से बचाव के कपड़े रात के तापमान के हिसाब से रखने चाहिए।
गर्मियों में दिन सुहावना लगता है, लेकिन रातें ठंडी रहती हैं। सर्दियों में तापमान और गिर जाता है। यात्रा का समय चुनते समय मौसम चक्र का ध्यान रखना चाहिए। बाइक सवारों को भी पहले दो दिन लेह में ही रहना चाहिए। फिटनेस ऊंचाई की बीमारी से पूरी तरह नहीं बचाती। धीरे-धीरे चढ़ना, पानी पीना, शराब से बचना और लक्षण दिखते ही नीचे आना सबसे सरल सुरक्षा सूत्र है। लद्दाख की खूबसूरती तभी याद रहती है जब शरीर साथ देता है। जल्दबाजी और लापरवाही दोनों यात्रा को अस्पताल की दास्तान बना सकते हैं। सही आराम और सतर्कता से वही यात्रा यादगार बन जाती है।
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