Supreme Court PIL: JPSC परीक्षा में कथित धांधली का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, पुन, परीक्षा और CBI जांच की मांग को लेकर PIL दाखिल
पुनः परीक्षा, CBI जांच और OMR शीट के फोरेंसिक ऑडिट की मांग, छात्रों को न्याय की उम्मीद
Supreme Court PIL: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2025 में सामने आए कथित भ्रष्टाचार, ओएमआर शीट में हेरफेर और धांधली का मुद्दा अब देश की शीर्ष अदालत तक पहुंच गया है। रांची की सड़कों पर पिछले कई हफ्तों से आंदोलनरत प्रतियोगी छात्रों के संघर्ष के बीच याचिकाकर्ता हरिशरण देवगन ने अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत के माध्यम से उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है।
इस याचिका में जेपीएससी 2025 की प्रारंभिक परीक्षा को अविलंब रद्द करने, नए सुरक्षा मानकों के साथ पुनः परीक्षा आयोजित करने और पूरे प्रकरण की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से समयबद्ध जांच कराने की गुहार लगाई गई है। इसके साथ ही पूरी प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की निगरानी में एक स्वतंत्र जांच समिति गठित करने की मांग की गई है, जिससे राज्यभर के अभ्यर्थियों में न्याय की नई उम्मीद जगी है।
Supreme Court PIL: सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की प्रमुख मांगें और पारदर्शी ऑडिट की गुहार
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर याचिका में परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता बहाल करने के लिए कई कड़े और पारदर्शी कदम उठाने का आग्रह किया गया है:
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परीक्षा रद्द कर पुनः आयोजन: 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2025 के परिणामों में गंभीर अनियमितताओं का हवाला देते हुए इसे रद्द करने और सुरक्षा के कड़े इंतजामों के साथ दोबारा परीक्षा कराने का निर्देश जारी किया जाए।
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सीबीआई और स्वतंत्र समिति से जांच: पूरे फर्जीवाड़े की जांच राज्य पुलिस या सीआईडी के बजाय सीबीआई द्वारा की जाए। इस जांच की दैनिक या साप्ताहिक निगरानी सर्वोच्च अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी अन्य राज्य के उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली स्वतंत्र समिति करे।
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तकनीकी एवं डिजिटल ऑडिट: ओएमआर शीट की कोडिंग, स्कैनिंग, डिजिटल मूल्यांकन तथा अंतिम परिणाम तैयार करने वाले सॉफ्टवेयर और एजेंसी की भूमिका का स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए।
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फर्जी अभ्यर्थियों की पहचान: यह वैज्ञानिक रूप से तय किया जाए कि धांधली का लाभ पाने वाले अभ्यर्थियों और निर्दोष अभ्यर्थियों को अलग करना संभव है या नहीं।
ओएमआर कार्बन कॉपी वायरल होने से शुरू हुआ विवाद, सीआईडी जांच से असंतुष्ट छात्र
विवाद की शुरुआत 2 जुलाई को उस समय हुई, जब सोशल मीडिया पर एक सफल अभ्यर्थी की कथित ओएमआर कार्बन कॉपी और उसके अंक पत्र की तस्वीरें तेजी से प्रसारित हुईं। दावों के अनुसार, प्रथम प्रश्नपत्र में केवल 48 प्रश्नों के उत्तर देने के बावजूद उक्त अभ्यर्थी को मुख्य परीक्षा (Mains) के लिए योग्य घोषित कर दिया गया था। इस घटनाक्रम के उजागर होते ही राज्य के लाखों युवाओं का आक्रोश भड़क उठा।
यद्यपि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए झारखंड सरकार ने मामले की जांच राज्य अपराध अनुसंधान विभाग (CID) को सौंप दी, लेकिन प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों ने इसे केवल मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश करार दिया। छात्रों का आरोप है कि राज्य की एजेंसियां अपने ही तंत्र के शीर्ष अधिकारियों को बचाने का प्रयास कर सकती हैं, इसलिए वे सीआईडी जांच को खारिज करते हुए 25 जुलाई से अनवरत सत्याग्रह कर रहे हैं।
रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में आमरण अनशन और सड़कों पर जारी आंदोलन
राजधानी रांची का ऐतिहासिक जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम पिछले कई दिनों से हजारों आंदोलनकारी अभ्यर्थियों का गढ़ बना हुआ है। अभ्यर्थी बारिश और विपरीत परिस्थितियों के बीच बेमियादी धरने पर बैठे हुए हैं। कई छात्र नेताओं और अनशनकारियों की तबीयत बिगड़ने के बावजूद वे परीक्षा रद्द करने और सीबीआई जांच की अपनी एकसूत्रीय मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
सरकार के प्रतिनिधियों और छात्र प्रतिनिधिमंडलों के बीच कई दौर की वार्ताओं के बावजूद कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल सका है। अभ्यर्थियों का कहना है कि भर्ती बोर्डों पर से युवाओं का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने से छात्रों को उम्मीद है कि शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप से उन्हें त्वरित और निष्पक्ष न्याय मिलेगा।
डिजिटल और भौतिक साक्ष्यों के संरक्षण पर विशेष जोर
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि मामले से जुड़े सभी भौतिक और डिजिटल साक्ष्यों को तुरंत सील कर सुरक्षित रखने का अंतरिम आदेश दिया जाए, ताकि जांच शुरू होने से पहले सबूतों के साथ कोई छेड़छाड़ न की जा सके।
इसके तहत मुख्य ओएमआर शीट, अभ्यर्थियों की कार्बन कॉपी, मास्टर प्रश्नपत्र, आंसर की, बायोमेट्रिक अटेंडेंस रिकॉर्ड, परीक्षा केंद्रों के सीसीटीवी फुटेज, डिस्पैच रजिस्टर और डेटा ट्रांसफर का पूरा डिजिटल ट्रेल संरक्षित करने की अपील की गई है। जानकारों का मानना है कि यदि फोरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा इन साक्ष्यों का मिलान कराया जाता है, तो स्कैनिंग और रिजल्ट मेकिंग के स्तर पर हुई धोखाधड़ी पूरी तरह उजागर हो जाएगी।
Supreme Court PIL: संस्थागत साख पर संकट और आगे की कानूनी राह
जेपीएससी जैसी संवैधानिक और प्रतिष्ठित संस्था पर बार-बार उठने वाले धांधली के आरोपों ने झारखंड के पूरे प्रशासनिक और भर्ती ढांचे की साख को गहरे संकट में डाल दिया है। वर्षों तक कठिन परिश्रम कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के लिए यह स्थिति अत्यंत निराशाजनक है।
उच्चतम न्यायालय में याचिका पंजीकृत होने के बाद अब सभी की निगाहें मामले की प्रारंभिक सुनवाई और इस पर आने वाले अदालत के आदेश पर टिकी हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट याचिका को स्वीकार करते हुए नोटिस जारी करता है या रिकॉर्ड सुरक्षित करने का अंतरिम निर्देश देता है, तो इससे राज्य सरकार और आयोग पर बड़ा नैतिक व कानूनी दबाव बनेगा। यह मामला न केवल जेपीएससी, बल्कि देश भर के अन्य राज्यों के लोक सेवा आयोगों के लिए भी पारदर्शी परीक्षा प्रणाली सुनिश्चित करने की दिशा में नज़ीर साबित हो सकता है।
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