Jharkhand PM Awas Yojana: विवादित जमीन पर आवास मंजूरी, तत्कालीन EO पर कार्रवाई की सिफारिश

गिरिडीह में लोकायुक्त जांच के बाद तत्कालीन EO राजीव कुमार मिश्रा पर विभागीय कार्रवाई की सिफारिश

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Jharkhand PM Awas Yojana: झारखंड में गरीबों और जरूरतमंदों को पक्की छत मुहैया कराने के उद्देश्य से संचालित प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) में प्रशासनिक मिलीभगत और नियमों की घोर अनदेखी का एक गंभीर मामला उजागर हुआ है। राज्य के लोकायुक्त न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार गुप्ता की अदालत ने गिरिडीह नगर परिषद के तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) राजीव कुमार मिश्रा के विरुद्ध पद के दुरुपयोग और अनियमितता के आरोपों को सही पाते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की स्पष्ट अनुशंसा की है। यह संपूर्ण प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन और विवादित भूमि पर प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत किए जाने से संबंधित है।

लोकायुक्त के आदेश के अनुपालन में कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग के प्रधान सचिव को विधिवत पत्र प्रेषित कर दिया गया है। लोकायुक्त ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि संबंधित पूर्व नगर निकाय अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित करते हुए की गई दंडात्मक कार्रवाई की समेकित रिपोर्ट तीन माह के भीतर लोकायुक्त कार्यालय को अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाए।

Jharkhand PM Awas Yojana: अदालत में लंबित मामले के बीच स्वीकृत हुए आवास

यह प्रशासनिक अनियमितता गिरिडीह नगर परिषद क्षेत्र अंतर्गत वार्ड संख्या 16 के चिरैयाघाट (बरमसिया) इलाके से जुड़ी है। लोकायुक्त के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों के अनुसार, खाता संख्या पांच के प्लॉट संख्या 119 तथा खाता संख्या 36 के प्लॉट संख्या 135 की भूमि को लेकर स्थानीय पक्षों के मध्य पूर्व से ही दीवानी विवाद चल रहा था और यह प्रकरण सिविल कोर्ट में विचाराधीन था।

आरोप है कि विवादित प्रकृति की इस भूमि पर सुमन देवी, उर्मिला देवी और शकुंतला देवी नामक आवेदकों के पक्ष में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत पक्के मकानों की तकनीकी व वित्तीय स्वीकृति प्रदान कर दी गई। नियमों के अनुसार किसी भी सरकारी कल्याणकारी योजना के तहत निर्माण कार्य हेतु स्पष्ट स्वामित्व और विवाद-रहित भूमि का होना प्राथमिक और अनिवार्य मानदंड है, किंतु इस मामले में स्थापित विधिक प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर वित्तीय लाभ जारी किया गया।

कर्मचारी की प्रतिकूल टिप्पणी के बावजूद अधिकारी ने दी अंतिम मंजूरी

लोकायुक्त द्वारा नगर विकास एवं आवास विभाग के माध्यम से कराई गई उच्चस्तरीय प्रशासनिक जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि नगर परिषद के क्षेत्रीय जांच कर्मचारी ने आवेदन पत्रों पर स्पष्ट रूप से प्रतिकूल टिप्पणी अंकित की थी।

अभिलेखों के परीक्षण से प्रमाणित हुआ कि सुमन देवी और उर्मिला देवी के आवेदनों पर संबंधित नगर निकाय कर्मी ने लाल स्याही से दर्ज किया था कि प्रस्तावित भूमि अत्यधिक विवादास्पद है और इसका मामला न्यायालय में लंबित है। इसके बावजूद तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी राजीव कुमार मिश्रा ने कनिष्ठ कर्मी की चेतावनी और विधिक रिपोर्ट को पूरी तरह दरकिनार करते हुए पत्रावली पर स्वीकृति के हस्ताक्षर किए। जांच रिपोर्ट में इसे केवल मानवीय भूल न मानकर गंभीर प्रशासनिक कदाचार और योजना के नियमों का सीधा उल्लंघन करार दिया गया है।

2017 में बरमसिया निवासी अनिल चौहान ने दर्ज कराई थी शिकायत

इस प्रकरण की विधिक पृष्ठभूमि लगभग नौ वर्ष पुरानी है। 22 अगस्त 2017 को गिरिडीह के चिरैयाघाट रोड, बरमसिया निवासी अनिल चौहान ने लोकायुक्त कार्यालय में शपथ पत्र के साथ परिवाद पत्र दायर किया था। परिवादी का कहना था कि वह अपनी पैतृक व रैयती भूमि पर मकान बनाकर सपरिवार निवास कर रहे हैं। उनके घर के समीप स्थित सार्वजनिक गली और सीमांकन से जुड़ी जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करने की नीयत से कुछ लोगों ने गलत दस्तावेजों के सहारे नगर परिषद में आवेदन दाखिल किया था।

शिकायतकर्ता ने अपने परिवाद में यह भी दावा किया था कि उन्होंने सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमे और निषेधाज्ञा से जुड़े अभिलेख व्यक्तिगत रूप से तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किए थे। इसके बावजूद प्रभावशाली व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से आवासों की स्वीकृति दी गई। शिकायत में वित्तीय लेन-देन के आरोप भी लगाए गए थे, हालांकि लोकायुक्त की संस्तुति का मुख्य आधार प्रशासनिक जांच में स्थापित हुई प्रक्रियात्मक अवैधता और नियमों की अवहेलना बनी है।

पूर्व कार्यपालक पदाधिकारी का पक्ष और लोकायुक्त का निष्कर्ष

जांच प्रक्रिया के दौरान लोकायुक्त पीठ ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी राजीव कुमार मिश्रा को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर प्रदान किया। अधिकारी ने अपने स्पष्टीकरण में सभी आरोपों को निराधार बताते हुए तर्क दिया कि आवासों की स्वीकृति तत्कालीन परिस्थितियों, सर्वे रिपोर्ट और विभागीय दिशा-निर्देशों के आधार पर जनहित में की गई थी और उनका कोई दुर्भावनापूर्ण मंतव्य नहीं था।

तथापि, नगर विकास विभाग की स्वतंत्र जांच समिति द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों, स्थल निरीक्षण रिपोर्ट और मूल पत्रावली में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों के विश्लेषण के पश्चात लोकायुक्त पीठ इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अधिकारी ने अपने पदीय दायित्वों के निर्वहन में घोर लापरवाही बरती है। यदि आवेदन पर ही न्यायालय में मामला लंबित होने की सूचना दर्ज थी, तो विधिक राय लिए बिना योजना की अंतिम राशि स्वीकृत करना सीधे तौर पर अनियमितता के दायरे में आता है।

तीन माह के भीतर कार्रवाई की एक्शन टेकन रिपोर्ट तलब

लोकायुक्त जस्टिस अमिताभ कुमार गुप्ता ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग को कड़े शब्दों में आदेश जारी किया है। राज्य सरकार को निर्देशित किया गया है कि तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी के विरुद्ध झारखंड सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के अंतर्गत तत्काल विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की जाए।

लोकायुक्त कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मनमानी पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक है। अतः संबंधित प्रशासनिक विभाग को तीन महीने के भीतर आरोप पत्र गठन, जांच पदाधिकारी की नियुक्ति और अंतिम दंडात्मक निर्णय की संपूर्ण प्रगति रिपोर्ट लोकायुक्त न्यायालय में दाखिल करनी होगी।

Jharkhand PM Awas Yojana: कल्याणकारी योजनाओं में पात्रता और पारदर्शिता पर उठे सवाल

प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य उद्देश्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े बेघर और भूमिहीन नागरिकों को सुरक्षित आश्रय प्रदान करना है। गिरिडीह नगर परिषद का यह मामला दर्शाता है कि किस प्रकार जमीनी स्तर पर प्रशासनिक संवेदनहीनता और नियमों की अनदेखी के चलते विवादित भूखंडों पर योजना का दुरुपयोग किया जाता है। लोकायुक्त की इस सख्त सिफारिश से न केवल दोषी अधिकारियों में जवाबदेही का भाव पैदा होगा, बल्कि राज्य भर के नगर निकायों को यह स्पष्ट संदेश भी जाएगा कि सरकारी धन का मनमाना आवंटन विधिक दंड से बच नहीं सकता।

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