Jhajjar Court Verdict: झज्जर चिल्ड्रन कोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग के अपहरण और यौन उत्पीड़न के दोषी को 10 साल की कड़ी सजा
Jhajjar Court Verdict: नाबालिग से यौन उत्पीड़न, दोषी को 10 साल की सजा
Jhajjar Court Verdict: हरियाणा के झज्जर जिले से एक बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। झज्जर की एक विशेष चिल्ड्रंस कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की के अपहरण और उसका यौन उत्पीड़न करने के मामले में एक युवक को दोषी करार देते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया है और साफ किया है कि जुर्माने से मिलने वाली पूरी राशि सीधे पीड़िता को दी जाएगी।
यह मामला कानूनी तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जब दिसंबर 2022 में इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया गया था, तब दोषी की उम्र 18 साल से कम थी। कानूनी प्रक्रिया के तहत ऐसे किशोर को ‘चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ’ यानी कानून से संघर्षरत किशोर कहा जाता है। चूंकि अब सुनवाई पूरी होने तक दोषी की उम्र लगभग 20 वर्ष (वयस्क) हो चुकी है, इसलिए अदालत ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) के विशेष प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
Jhajjar Court Verdict: पीठासीन अधिकारी मोना सिंह की अदालत ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई झज्जर की स्थानीय चिल्ड्रंस कोर्ट की पीठासीन अधिकारी मोना सिंह की अदालत में चल रही थी। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने, गवाहों के बयान दर्ज करने और पुलिस द्वारा जुटाए गए पुख्ता सबूतों के आधार पर युवक को पोक्सो (POCSO) एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत दोषी पाया।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि समाज में न्याय की व्यवस्था को बनाए रखने और अपराधियों में कानून का डर पैदा करने के लिए ऐसे मामलों में कड़ा रुख अपनाना जरूरी है। दोषी को अलग-अलग धाराओं में जो सजाएं सुनाई गई हैं, वे सभी एक साथ चलेंगी। इसका मतलब है कि दोषी को अधिकतम 10 साल जेल की सलाखों के पीछे बिताने होंगे।
क्या होता है ‘चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ’? जानिए कानूनी पहलू
इस मामले के बाद कानूनी गलियारों में ‘चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ’ शब्द की चर्चा तेज हो गई है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुसार, भारतीय कानून व्यवस्था के तहत यदि 18 वर्ष से कम उम्र का कोई भी किशोर किसी अपराध में संलिप्त पाया जाता है या उस पर कोई आरोप लगता है, तो उसे अपराधी या कैदी नहीं कहा जाता। कानूनी भाषा में उसे ‘चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ’ (कानून से संघर्षरत किशोर) के रूप में संबोधित किया जाता है।
ऐसे किशोरों के लिए कानून में अलग से प्रावधान हैं:
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उन्हें सामान्य अपराधियों की तरह आम जेलों में बंद नहीं किया जाता।
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उन्हें सुधार गृहों या ‘सुरक्षित अभिरक्षा’ (Safe Custody) में रखा जाता है ताकि उनके भीतर सुधार की गुंजाइश बनी रहे।
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इस मामले में भी कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और समाज के प्रति न्यायिक जिम्मेदारी के बीच एक सटीक संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है।
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 21 का हवाला: फांसी और उम्रकैद पर रोक
अदालत ने सजा का निर्धारण करते समय जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा 21 का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस धारा के तहत यह अनिवार्य नियम है कि अपराध के समय नाबालिग रहे किसी भी व्यक्ति को मृत्युदंड (फांसी) या ऐसी उम्रकैद की सजा नहीं दी जा सकती जिसमें रिहाई की कोई संभावना न हो।
पीठासीन अधिकारी ने अपने आदेश में बहुत ही मार्मिक और गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सजा तय करते समय न्यायपालिका को पीड़ित पक्ष के आंसुओं और समाज में न्याय के लिए उठने वाली आवाज के प्रति पूरी तरह संवेदनशील होना चाहिए। अदालत का कर्तव्य है कि वह दोषी किशोर के अधिकारों और पीड़ित बच्ची के साथ हुए जघन्य अन्याय के बीच एक ऐसा संतुलन बनाए, जिससे समाज में एक कड़ा संदेश भी जाए और कानून की गरिमा भी सुरक्षित रहे।
जानिए किस धारा में मिली कितनी सजा और कितना लगा जुर्माना
अदालत ने दोषी को केवल पोक्सो एक्ट ही नहीं, बल्कि अपहरण और धमकी देने से जुड़ी आईपीसी की कई धाराओं के तहत भी सजा मुकर्रर की है। सजा का पूरा विवरण इस प्रकार है:
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पोक्सो एक्ट की धारा 4: इसके तहत दोषी को 10 वर्ष के कारावास की सजा और 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना न भरने पर 3 महीने की अतिरिक्त कैद काटनी होगी।
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आईपीसी की धारा 366 (शादी या अन्य उद्देश्य के लिए महिला का अपहरण): इसमें 5 वर्ष की कैद और 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना न देने पर 1 महीने की अतिरिक्त सजा का प्रावधान है।
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आईपीसी की धारा 365 (गुप्त रूप से बंधक बनाने के इरादे से अपहरण): इसके तहत 3 वर्ष की कैद और 3,000 रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना न चुकाने पर 1 महीने की अतिरिक्त जेल होगी।
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आईपीसी की धारा 363 (अपहरण की सामान्य सजा): इसमें दोषी को 2 वर्ष की कैद और 3,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई है। जुर्माना न भरने पर 1 महीने की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी।
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आईपीसी की धारा 506 (जान से मारने की धमकी देना): इस धारा के तहत अदालत ने दोषी को 1 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है।
महत्वपूर्ण बिंदु: अदालत के आदेशानुसार यह सभी मूल सजाएं एक साथ (Concurrently) चलेंगी, जिससे दोषी को जेल में कुल 10 वर्ष का समय काटना होगा।
Jhajjar Court Verdict: जुर्माना नहीं देने पर कुर्क होगी संपत्ति, पीड़िता को दी जाएगी राशि
इस फैसले में अदालत ने पीड़ित बच्ची के पुनर्वास और उसकी आर्थिक सुरक्षा को लेकर बेहद सराहनीय और सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि दोषी पर लगाया गया कुल आर्थिक जुर्माना यदि वसूल हो जाता है, तो वह पूरी राशि सहायता के रूप में पीड़िता को सौंप दी जाएगी।
यदि दोषी या उसका परिवार इस जुर्माने की राशि को जमा करने में आनाकानी करता है या भुगतान नहीं करता है, तो कोर्ट ने अपने रीडर को विशेष जिम्मेदारी सौंपी है। आदेश के मुताबिक, ऐसी स्थिति में कानून के तहत दोषी और उसके परिवार की संपत्तियों को चिन्हित कर उनके खिलाफ तुरंत रिकवरी (कुर्की और वसूली) की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाएगी, ताकि हर हाल में पीड़िता को उसका हक और मुआवजा दिलाया जा सके।
Jhajjar Court Verdict: दिसंबर 2022 का है मामला, स्कूल जाने के दौरान हुई थी वारदात
यह पूरा मामला दिसंबर 2022 का है। झज्जर जिले के आसौदा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक गांव की रहने वाली एक महिला ने 20 दिसंबर 2022 को स्थानीय पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में बताया गया था कि उसकी नाबालिग बेटी, जो गांव के ही एक स्कूल में पढ़ती थी, रोजाना की तरह स्कूल के लिए घर से निकली थी। लेकिन स्कूल का समय बीत जाने के बाद भी वह वापस घर नहीं लौटी और रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गई।
परिजनों ने अपनी स्तर पर रिश्तेदारियों और आस-पास के सभी संभावित इलाकों में बच्ची की काफी तलाश की। जब उसका कहीं भी कोई सुराग नहीं मिला, तो हताश होकर परिवार ने पुलिस की मदद ली। मामले की गंभीरता और लड़की के नाबालिग होने के कारण आसौदा थाना पुलिस ने तुरंत तत्परता दिखाई और मुकदमा नंबर 398 दर्ज कर मामले की तफ्तीश शुरू कर दी।
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