Jamia Millia Islamia Protest: छात्रसंघ चुनाव की मांग पर प्रदर्शन तेज, दीवारों पर नारों से बढ़ा विवाद
जामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर आंदोलन की खबरों के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्रों और राजनीतिक दलों के रुख पर चर्चा तेज।
Jamia Millia Islamia Protest: देश के प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शुमार जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI) में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर छिड़ा आंदोलन अब एक व्यापक राष्ट्रीय व राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। लगभग दो सप्ताह से अधिक समय से धरने पर बैठे विद्यार्थियों की लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मांग के बीच परिसर की दीवारों पर लिखे गए विवादित नारों और विपक्षी नेताओं की सक्रिय मौजूदगी ने इस पूरे मामले को एक नया वैचारिक मोड़ दे दिया है। जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने परिसर में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस और विपक्षी दलों से जवाब मांगा है, वहीं प्रदर्शनकारी छात्र इस पूरे विवाद को मूल मांग से ध्यान भटकाने की साजिश बता रहे हैं। ऐसे में यह सवाल बेहद प्रासंगिक हो उठा है कि जिस विश्वविद्यालय में वर्ष 2006 से ही छात्रसंघ चुनाव पूरी तरह निलंबित हैं, वहां अचानक इस मुद्दे को लेकर केंद्र की मौजूदा सरकार की भूमिका और नीतियों पर अंगुलियां क्यों उठाई जा रही हैं।
Jamia Millia Islamia Protest: जामिया में क्यों भड़का छात्र असंतोष और क्या हैं मूल मांगें?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया परिसर में छात्रसंघ चुनाव की औपचारिक बहाली को लेकर 12 अक्टूबर 2026 से छात्रों ने चरणबद्ध आंदोलन की शुरुआत की थी। आंदोलनकारी छात्र संगठनों और सामान्य विद्यार्थियों का कहना है कि विश्वविद्यालय में विगत दो दशकों से कोई चुनी हुई छात्र परिषद या छात्रसंघ नहीं है। इसके अभाव में आम छात्रों की समस्याएं, फीस वृद्धि, छात्रावास आवंटन, बुनियादी शैक्षणिक सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए कोई वैध लोकतांत्रिक मंच उपलब्ध नहीं है।
छात्रों का तर्क है कि जब दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) जैसे पड़ोसी केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में नियमित रूप से लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत छात्रसंघ चुनाव संपन्न कराए जा सकते हैं, तो जामिया के विद्यार्थियों को इस बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित क्यों रखा जा रहा है। इसी मांग को लेकर छात्रों ने प्रशासनिक ब्लॉक (सेंट्रल कैंटीन व रजिस्ट्रार कार्यालय) के समीप अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया था।
वर्ष 2006 में क्यों बंद हुए थे चुनाव और केंद्र पर सवाल क्यों?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया स्टूडेंट्स यूनियन (JMISU) को वर्ष 2006 में तत्कालीन कुलपति और विश्वविद्यालय कार्यपरिषद द्वारा परिसर में हुई हिंसक झड़पों, बाहरी तत्वों के हस्तक्षेप और शैक्षणिक माहौल में बढ़ते व्यवधान का हवाला देकर भंग कर दिया गया था। इसके बाद से ही परिसर में छात्र राजनीति पर अघोषित प्रतिबंध लागू रहा और मामला कानूनी विवादों में भी उलझा रहा।
जहां तक वर्तमान सरकार पर उठ रहे सवालों का सवाल है, विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में लंबे समय तक छात्रों की लोकतांत्रिक भागीदारी रुकी रहती है, तो केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की नीतिगत उदासीनता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि केंद्र सरकार विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र छात्र आवाजों और राजनीतिक चेतना को कुंद करना चाहती है। हालांकि, विधिक और प्रशासनिक दृष्टि से विश्वविद्यालय एक स्वायत्त विधायी निकाय (Autonomous Statutory Body) के तहत संचालित होता है, जहां चुनाव कराने का अंतिम निर्णय जामिया अधिनियम, विश्वविद्यालय के नियमों और उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वीकृत ‘लिंगदोह समिति’ की सिफारिशों के अनुरूप कार्यपरिषद द्वारा ही लिया जाता है।
परिसर की दीवारों पर आपत्तिजनक नारों से भड़का राजनीतिक संग्राम
छात्रों के आंदोलन के बीच उस समय भारी आक्रोश और विवाद खड़ा हो गया जब विश्वविद्यालय की बाहरी और आंतरिक दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ जैसे देशविरोधी व भड़काऊ नारे लिखे हुए पाए गए। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन नारों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कड़ी निंदा करते हुए इसे संस्थान के शैक्षणिक माहौल और गरिमा पर सीधा प्रहार बताया।
इन नारों के सामने आने के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कांग्रेस पार्टी को घेरा। भाजपा प्रवक्ताओं ने आरोप लगाया कि छात्रों की लोकतांत्रिक मांगों की आड़ में राष्ट्रविरोधी एजेंडे को हवा दी जा रही है। विशेष रूप से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के प्रदर्शन स्थल पर पहुंचकर छात्रों से मिलने को लेकर भाजपा ने तीखा सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस पार्टी ऐसे विभाजनकारी नारों का परोक्ष रूप से समर्थन कर रही है। दूसरी तरफ, सांसद इमरान मसूद ने अपनी सफाई में कहा कि वे केवल छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन में गए थे और भारत का अभिन्न अंग होने के नाते कश्मीर पर किसी भी प्रकार के संशय का कोई स्थान नहीं है।
प्रशासन की सख्ती: कक्षाएं ऑनलाइन और अनुशासनात्मक कार्रवाई का टकराव
प्रदर्शन के दौरान छात्रों और सुरक्षा गार्डों के बीच धक्का-मुक्की और धरने के कारण प्रशासनिक कार्यों में आए ठहराव को देखते हुए जामिया प्रशासन ने एहतियातन सभी नियमित पाठ्यक्रमों की कक्षाओं को ऑनलाइन माध्यम में स्थानांतरित कर दिया था। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि छात्रों को विरोध दर्ज कराने के लिए पूर्व-निर्धारित और चिन्हित स्थानों का ही उपयोग करना चाहिए ताकि आम विद्यार्थियों की पढ़ाई और शोध कार्य प्रभावित न हों।
विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के प्रतिनिधिमंडल के बीच 26 अक्टूबर को हुई वार्ता में प्रशासन ने यह प्रस्ताव रखा कि छात्रसंघ के प्रारूप और संविधान को सक्षम समितियों से मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव प्रक्रिया की अधिसूचना जारी कर दी जाएगी। इसके बावजूद आंदोलनकारी छात्रों ने इस आश्वासन को अस्पष्ट बताते हुए आंदोलन समाप्त करने से इनकार कर दिया। छात्र यह मांग भी कर रहे हैं कि आंदोलन में शामिल विद्यार्थियों के खिलाफ जारी कारण बताओ नोटिस और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को पूरी तरह वापस लिया जाए।
Jamia Millia Islamia Protest: लोकतांत्रिक अधिकार बनाम शांति व्यवस्था
जामिया मिल्लिया इस्लामिया का यह गतिरोध वर्तमान में छात्र राजनीति, कानूनी संप्रभुता और राष्ट्रीय विमर्श के चौराहे पर खड़ा है। विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण को नुकसान पहुंचाए बिना और परिसर की शांति को बाधित किए बगैर छात्रों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को कैसे बहाल किया जाए, यह प्रशासन के लिए एक बड़ी परीक्षा बन चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे मामले को अनावश्यक राजनीतिक ध्रुवीकरण और विवादित नारों की छाया से अलग रखकर देखने की आवश्यकता है। छात्रसंघ चुनाव की बहाली के लिए एक निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध रोडमैप तैयार करना ही इस संकट का एकमात्र व्यावहारिक समाधान है, जिसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन, सक्षम न्यायालय और छात्र प्रतिनिधियों के बीच सार्थक व निष्पक्ष संवाद की निरंतरता अत्यंत आवश्यक है।
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