High Cholesterol: जिम जाने और फिट दिखने वालों को भी हो सकता है हाई कोलेस्ट्रॉल, डॉक्टर से पूछें ये 3 सवाल

आनुवंशिकता और पारिवारिक इतिहास के कारण फिट युवाओं में भी बढ़ सकता है LDL कोलेस्ट्रॉल

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High Cholesterol: समकालीन दौर में फिटनेस, सिक्स-पैक एब्स और सुडौल शरीर को अक्सर संपूर्ण स्वास्थ्य का अचूक पैमाना मान लिया जाता है। दैनिक जीवन में यह आम धारणा बन चुकी है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन जिम जाता है, भारी वजन उठाता है, दौड़ता है और बाहर से बिल्कुल फिट दिखाई देता है, वह हृदय रोगों और कोलेस्ट्रॉल के जोखिम से पूरी तरह सुरक्षित है। किंतु चिकित्सा विज्ञान और कार्डियोलॉजी विशेषज्ञ इस धारणा को सिरे से खारिज करते हैं। कई बार बाहर से बेहद सक्रिय और स्वस्थ दिखने वाले युवाओं के शरीर के भीतर भी रक्त वाहिकाओं में ‘बैड कोलेस्ट्रॉल’ यानी एलडीएल (LDL) का स्तर अत्यधिक खतरनाक सीमा तक पहुंच जाता है।

हाई कोलेस्ट्रॉल को चिकित्सा जगत में एक ‘साइलेंट किलर’ माना जाता है, क्योंकि यह प्रारंभिक अवस्था में शरीर में किसी भी प्रकार का दर्द, थकावट या स्पष्ट लक्षण उत्पन्न नहीं करता। व्यक्ति सामान्य रूप से अपनी दिनचर्या पूरी करता रहता है और वर्कआउट करता रहता है, जबकि भीतर ही भीतर उसकी धमनियों में मोम जैसा चिपचिपा पदार्थ (प्लाक) जमा होकर रक्त संचार को अवरुद्ध करने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार उम्र, आहार और शारीरिक श्रम के अलावा आनुवंशिकी (Genetics) और पारिवारिक इतिहास भी कोलेस्ट्रॉल के स्तर को निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए केवल बाहरी फिटनेस के भरोसे रहकर आंतरिक स्वास्थ्य की अनदेखी करना जानलेवा साबित हो सकता है।

High Cholesterol: पतले और मस्कुलर शरीर में भी क्यों बढ़ जाता है बैड कोलेस्ट्रॉल?

आमतौर पर समाज में यह समझा जाता है कि हाई कोलेस्ट्रॉल केवल उन लोगों को होता है जिनका वजन अधिक है, जो मोटापे से ग्रस्त हैं या जो अत्यधिक तैलीय और जंक फूड का सेवन करते हैं। हालांकि ये कारक निस्संदेह कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं, किंतु यह पूरी सच्चाई नहीं है। चिकित्सा अनुसंधानों में यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि शरीर में कोलेस्ट्रॉल का लगभग 75 से 80 प्रतिशत उत्पादन यकृत (लिवर) द्वारा स्वयं किया जाता है, जो आनुवंशिक संकेतों से नियंत्रित होता है।

अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन और वैश्विक हृदय विशेषज्ञों के अनुसार, ‘फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया’ (Familial Hypercholesterolemia) जैसी आनुवंशिक स्थितियों के शिकार व्यक्तियों के शरीर में जन्मजात रूप से रक्त से एलडीएल को फिल्टर करने की क्षमता कम होती है। ऐसे लोग चाहे कितना भी कड़ा वर्कआउट कर लें या संतुलित शाकाहारी भोजन ले लें, उनका लिवर आवश्यकता से अधिक बैड कोलेस्ट्रॉल बनाता रहता है। यही कारण है कि 25 से 35 वर्ष के नियमित जिम जाने वाले एथलीट और युवा भी अचानक दिल के दौरे (Heart Attack) का शिकार हो जाते हैं।

LDL बनाम HDL: धमनियों में कैसे बनता है मौत का जाल

मानव शरीर की कोशिकाओं के निर्माण, विटामिन-डी के संश्लेषण और हार्मोन संतुलन के लिए कोलेस्ट्रॉल एक अनिवार्य लिपिड है, किंतु रक्त में इसकी संरचना और संतुलन बिगड़ते ही यह घातक बन जाता है। मुख्य रूप से कोलेस्ट्रॉल को दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन (LDL) को ‘बैड कोलेस्ट्रॉल’ कहा जाता है। जब रक्त में इसकी सांद्रता अधिक हो जाती है, तो यह कोरोनरी धमनियों की आंतरिक दीवारों पर चिपकने लगता है, जिसे ‘एथेरोस्क्लेरोसिस’ कहा जाता है। धीरे-धीरे यह प्लाक सख्त हो जाता है और हृदय की मांसपेशियों तक पहुंचने वाले रक्त व ऑक्सीजन के प्रवाह को बाधित कर देता है। दूसरी ओर, हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन (HDL) को ‘गुड कोलेस्ट्रॉल’ माना जाता है क्योंकि यह अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को समेटकर लिवर तक वापस ले जाता है। हालांकि केवल उच्च एचडीएल होना बढ़े हुए एलडीएल के जानलेवा जोखिम को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, इसलिए संपूर्ण लिपिड प्रोफाइल की गहन समीक्षा आवश्यक है।

पहला सवाल: मेरा LDL कोलेस्ट्रॉल कितना है और नॉन-HDL का स्तर क्या है?

जब भी आप नियमित स्वास्थ्य जांच के तहत लिपिड प्रोफाइल ब्लड टेस्ट कराएं, तो रिपोर्ट मिलने के बाद डॉक्टर से सीधे यह पूछें कि आपके रक्त में एलडीएल और नॉन-एचडीएल कोलेस्ट्रॉल का सटीक स्तर क्या है। चूंकि उच्च कोलेस्ट्रॉल का कोई बाहरी लक्षण—जैसे सिरदर्द, पसीना या सांस फूलना—प्रारंभिक वर्षों में प्रकट नहीं होता, इसलिए केवल रक्त जांच के आंकड़े ही आपकी वास्तविक आंतरिक स्थिति का खुलासा कर सकते हैं।

डॉक्टर से यह समझना आवश्यक है कि क्या आपका एलडीएल सामान्य सीमा (100 mg/dL से नीचे) में है अथवा यह बॉर्डरलाइन हाई (130-159 mg/dL) या अत्यंत खतरनाक श्रेणी (160-189 mg/dL या उससे अधिक) में पहुंच चुका है। प्रयोगशाला की सामान्य संदर्भ सीमाओं पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय विशेषज्ञ चिकित्सक से उन आंकड़ों का व्यावहारिक विश्लेषण कराना चाहिए।

दूसरा सवाल: मेरे समग्र कार्डियोवैस्कुलर जोखिम के आधार पर मेरा व्यक्तिगत लक्ष्य क्या होना चाहिए?

यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि दुनिया भर में सभी इंसानों के लिए कोलेस्ट्रॉल का कोई एक निश्चित और सार्वभौमिक सुरक्षित नंबर नहीं होता। आधुनिक कार्डियोलॉजी में ‘वन साइज फिट्स ऑल’ का सिद्धांत लागू नहीं होता। एक सामान्य 25 वर्षीय स्वस्थ व्यक्ति, जिसके परिवार में हृदय रोग का कोई इतिहास नहीं है, उसके लिए 110 mg/dL का एलडीएल सुरक्षित माना जा सकता है; किंतु यदि उसी व्यक्ति को डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, धूम्रपान की लत है या उसके माता-पिता में से किसी को 50 वर्ष से पूर्व दिल का दौरा पड़ा था, तो उसके लिए एलडीएल का सुरक्षित लक्ष्य 70 mg/dL या 55 mg/dL से भी नीचे निर्धारित किया जा सकता है।

इसलिए क्लिनिक में डॉक्टर से यह स्पष्ट पूछें कि आपकी उम्र, पारिवारिक इतिहास, जीवनशैली और अन्य मेडिकल पैरामीटर्स को मिलाकर आपके लिए ‘व्यक्तिगत एलडीएल लक्ष्य’ (Personalized LDL Target) क्या होना चाहिए। हृदय रोग विशेषज्ञ हमेशा मरीज के 10-वर्षीय एथेरोस्क्लेरोटिक कार्डियोवैस्कुलर रोग (ASCVD) जोखिम का आकलन करके ही लक्ष्य तय करते हैं।

तीसरा सवाल: यदि जीवनशैली में बदलाव से लक्ष्य प्राप्त न हुआ, तो आगे की रणनीति क्या होगी?

अधिकांश युवा यह मानते हैं कि यदि कोलेस्ट्रॉल बढ़ भी गया है, तो वे कुछ अतिरिक्त किलोमीटर दौड़कर, जिम में भारी पसीना बहाकर या सलाद खाकर इसे पूरी तरह नियंत्रित कर लेंगे। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) और सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के दिशानिर्देश स्पष्ट करते हैं कि नियमित एरोबिक एक्सरसाइज और संतृप्त वसा (Saturated Fat) मुक्त आहार एलडीएल को 5 से 10 प्रतिशत तक ही कम कर सकते हैं।

यदि आपका एलडीएल आनुवंशिक कारणों से बहुत अधिक बढ़ा हुआ है, तो केवल डाइट और वर्कआउट इसे सुरक्षित दायरे में लाने के लिए कभी पर्याप्त नहीं होंगे। ऐसे में डॉक्टर से तीसरे सवाल के रूप में यह पूछना जरूरी है कि यदि 3 से 6 महीने तक सख्त जीवनशैली बदलावों के बाद भी कोलेस्ट्रॉल स्तर सामान्य न हुआ, तो क्या स्टेटिन्स (Statins) या अन्य कोलेस्ट्रॉल-लोअरिंग दवाओं की आवश्यकता होगी? समय पर दवा शुरू करने के लाभ, उनकी सुरक्षा और संभावित भ्रांतियों पर डॉक्टर से खुलकर चर्चा करना आपके जीवन की रक्षा कर सकता है।

खान-पान की छिपी गलतियां: सप्लीमेंट्स और संतृप्त वसा का जाल

कई बार जिम जाने वाले युवा अनजाने में अपनी डाइट में ऐसी चीजों का समावेश कर लेते हैं जो कोलेस्ट्रॉल को तेजी से बढ़ा देती हैं। मसल बिल्डिंग के नाम पर अत्यधिक लाल मांस (Red Meat), फुल-फैट डेयरी उत्पाद, मक्खन, घी का अनियंत्रित सेवन और बाजार में मिलने वाले असत्यापित प्रोटीन पाउडर्स व मास गेनर्स में मौजूद प्रच्छन्न ट्रांस-फैट्स एलडीएल को तेजी से ट्रिगर करते हैं।

कोलेस्ट्रॉल को अनुकूल रखने के लिए दैनिक आहार में घुलनशील फाइबर (Soluble Fiber) जैसे ओट्स, अलसी के बीज, चिया सीड्स, सेब, दालें और हरी पत्तेदार सब्जियों की मात्रा बढ़ानी चाहिए। खाना पकाने के लिए पाम ऑयल या वनस्पति घी के स्थान पर मोनोअनसैचुरेटेड फैट (MUFA) युक्त तेलों जैसे जैतून का तेल या सरसों का तेल सीमित मात्रा में उपयोग करना चाहिए।

High Cholesterol: नियमित जांच और जागरूकता ही है सबसे मजबूत ढाल

सुडौल मांसपेशियां, कम बॉडी फैट और भारी वजन उठा लेना निश्चित रूप से शारीरिक अनुशासन का सराहनीय प्रमाण है, किंतु यह हृदय की धमनियों के पूरी तरह स्वस्थ और स्वच्छ होने का पक्का प्रमाण पत्र नहीं है। फिटनेस केवल बाहर दिखने वाले शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपकी रक्त वाहिकाओं की आंतरिक शुचिता और अंगों की कार्यप्रणाली से परिभाषित होती है।

20 वर्ष की आयु के बाद प्रत्येक व्यक्ति को, चाहे वह कितना भी सक्रिय और छरहरा क्यों न हो, हर दो से तीन वर्ष में एक बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट अवश्य कराना चाहिए। यदि परिवार में कम उम्र में हार्ट अटैक या स्ट्रोक की हिस्ट्री रही हो, तो यह जांच प्रतिवर्ष अनिवार्य रूप से कराई जानी चाहिए। अपने डॉक्टर से सही समय पर सही सवाल पूछना, भ्रांतियों को तोड़ना और समय रहते चिकित्सीय हस्तक्षेप स्वीकार करना ही आपको एक लंबी, स्वस्थ और दिल से सुरक्षित जिंदगी की गारंटी दे सकता है।

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