ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाएगी कांग्रेस, जानें क्या है पूरी प्रक्रिया और किसके पक्ष में है नंबर गेम
Gyanesh Kumar impeachment: ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग की तैयारी
Gyanesh Kumar impeachment: देश में निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी संभालने वाला चुनाव आयोग इन दिनों खुद अपनी निष्पक्षता को लेकर विवादों के घेरे में है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, और अब मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने उन्हें पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए पार्टी ने अन्य राजनीतिक दलों से संपर्क साधना भी शुरू कर दिया है। कांग्रेस ज्ञानेश कुमार की भूमिका को देशद्रोह तक करार दे चुकी है, वहीं हाल के जेन-जी आंदोलन से चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी ने भी सीईसी को इस्तीफे का अल्टीमेटम दिया है। दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा खुलकर ज्ञानेश कुमार के बचाव में उतर आई है। इस पूरे विवाद की जड़ में वोटर लिस्ट से जुड़ी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया और चुनाव आयोग के भीतर कथित असहमति के आरोप हैं। सवाल यह है कि क्या केवल आरोपों के आधार पर CEC को हटाया जा सकता है, और अगर हां तो इसकी प्रक्रिया क्या है।
ज्ञानेश कुमार पर लगे हैं क्या गंभीर आरोप
एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और वोटर लिस्ट में बदलाव से जुड़े विवाद का दावा किया गया है। रिपोर्ट में उन पर मुख्य रूप से दो गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पहला आरोप स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसके तहत मतदाता सूची को दोबारा जांचा और अपडेट किया जा रहा है, और रिपोर्ट के मुताबिक तीस राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब तेरह करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। दूसरा आरोप यह है कि आयोग के दो अन्य आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता डेटा के केंद्रीकरण और नाम हटाने-जोड़ने से जुड़े मामलों पर पिछले दस महीनों में कम से कम चौदह बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं, जिन्हें कथित तौर पर नजरअंदाज किया गया।
राहुल गांधी ने बताया ‘वोट चोरी’ और ‘देशद्रोह’
इन आरोपों को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है। पार्टी ने उन पर वोट चोरी, संस्था चोरी और जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला करने का आरोप लगाते हुए इसे देशद्रोह तक करार दिया है। हालांकि चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है और स्पष्ट किया है कि आयोग के सभी फैसले तीनों आयुक्तों की आपसी सहमति से ही लिए गए हैं।
विपक्ष की मुख्य मांगें क्या हैं
CEC ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों को लेकर कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के कई दलों के नेताओं ने उनके इस्तीफे के साथ-साथ पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने 24 सितंबर को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए एसआईआर और वोटर लिस्ट से जुड़े मामलों में कथित आपराधिक आचरण की जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग की, हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त को कानूनी इम्युनिटी प्राप्त होने के कारण उनके खिलाफ सीधे मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता।
CJP का देशव्यापी आंदोलन का ऐलान
इसी विवाद के बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने भी देशव्यापी आंदोलन का ऐलान कर दिया है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा है कि अगर ज्ञानेश कुमार 26 सितंबर तक इस्तीफा नहीं देते हैं, तो 2 अक्टूबर से मुंबई से विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा। इस तरह की सक्रियता यह दिखाती है कि यह विवाद अब केवल कांग्रेस या पारंपरिक विपक्षी दलों तक सीमित न रहकर नए राजनीतिक संगठनों तक भी फैल चुका है।
भाजपा खुलकर आई CEC के बचाव में
इस पूरे विवाद में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की अगुवाई कर रही भारतीय जनता पार्टी खुलकर ज्ञानेश कुमार के समर्थन में उतर आई है। बंगाल भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने तो इससे भी आगे बढ़कर ज्ञानेश कुमार को पद्मश्री देने तक की मांग कर दी है। इस तरह की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि सत्ताधारी दल इस मुद्दे पर विपक्ष के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए CEC के साथ मजबूती से खड़ा है।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत हटाने की प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त को किसी सामान्य प्रशासनिक आदेश के जरिए पद से नहीं हटाया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसका मतलब यह है कि CEC को हटाने के लिए स्पष्ट आरोपों के साथ संसद में एक प्रस्ताव लाना अनिवार्य होता है, जो एक जटिल और लंबी संवैधानिक प्रक्रिया मानी जाती है।
लोकसभा और राज्यसभा में NDA के पक्ष में है नंबर गेम
कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक विपक्ष लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन इस प्रक्रिया में केवल एनडीए बनाम विपक्ष की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि हटाने के प्रस्ताव को दोनों सदनों में अलग-अलग बहुमत की जरूरत होती है। 543 सदस्यों वाली लोकसभा में मौजूदा राजनीतिक समीकरण के अनुसार एनडीए के पास 318 सांसद हैं, जबकि इंडिया गठबंधन के पास 184 सांसद हैं। वहीं राज्यसभा की 242 सीटों में एनडीए के पास कम से कम 152 सदस्य हैं, जबकि विपक्षी दलों के पास 63 सदस्य हैं। डीएमके, बीजेडी, वाईएसआरसीपी और बीआरएस जैसे दलों के कुल 22 सदस्यों का रुख इस पूरे गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
क्या पहले भी हुई है ऐसी कोशिश
भारत के इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए पद से नहीं हटाया गया है। CEC को हटाने की प्रक्रिया को संविधान में बेहद मजबूत सुरक्षा दी गई है, ताकि निर्वाचन आयोग के प्रमुख को राजनीतिक दबाव के चलते आसानी से न हटाया जा सके। हालांकि मार्च 2026 में भी विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्ताव दिए थे, जिनमें एसआईआर और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए थे, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने उन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया था।
आगे क्या हो सकता है इस मामले में
मौजूदा राजनीतिक हालात और संख्याबल को देखते हुए यह स्पष्ट है कि कांग्रेस और विपक्षी दलों के लिए महाभियोग प्रस्ताव को दोनों सदनों में पारित कराना आसान काम नहीं होगा। फिर भी विपक्ष इस मुद्दे को लगातार जिंदा रखते हुए जनता के बीच ले जाने की रणनीति पर काम कर रहा है, ताकि आने वाले समय में इस पर व्यापक राजनीतिक दबाव बनाया जा सके। दूसरी ओर सत्तापक्ष का मजबूत समर्थन यह संकेत देता है कि निकट भविष्य में ज्ञानेश कुमार के पद से हटने की संभावना फिलहाल कम ही नजर आती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर छिड़ा यह विवाद आने वाले दिनों में देश की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बना रह सकता है। कांग्रेस की महाभियोग लाने की तैयारी, CJP के देशव्यापी आंदोलन का ऐलान और भाजपा का खुला समर्थन, ये सभी घटनाक्रम इस मामले की गंभीरता को दर्शाते हैं। संवैधानिक प्रक्रिया की जटिलता और संसद में मौजूदा संख्याबल को देखते हुए यह तय है कि यह लड़ाई आसान नहीं होगी। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले शीतकालीन सत्र में यह मुद्दा किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या विपक्ष अपने प्रयासों में कोई सफलता हासिल कर पाता है।
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