Old Pension Scheme: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नियमितीकरण से पहले की सेवा भी पेंशन पात्रता में होगी मान्य
मौसमी और तदर्थ सेवा को 10 साल की पात्रता में जोड़ा जाएगा, पेंशन राशि नियमित सेवा पर आधारित होगी
Old Pension Scheme: उत्तर प्रदेश के राजस्व विभाग में दशकों तक सेवाएं देने वाले संग्रह अमीनों और कर्मचारियों के हित में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने पुरानी पेंशन योजना (OPS) के तहत पात्रता तय करने को लेकर स्पष्ट व्यवस्था देते हुए कहा है कि किसी भी कर्मचारी की नियमित नियुक्ति से पूर्व की गई मौसमी, तदर्थ (Ad-hoc) या वर्क-चार्ज सेवा को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसका नियमितीकरण काफी बाद में हुआ था। यदि किसी कर्मचारी ने विभाग में लंबा समय बिताया है, तो उसकी पिछली निरंतर सेवाओं को पेंशन के लिए अनिवार्य अर्हकारी सेवा (Qualifying Service) की गणना में जोड़ा जाना वैधानिक रूप से अनिवार्य है।
न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया है कि अर्हक सेवा और पेंशन की वास्तविक राशि के निर्धारण के बीच एक स्पष्ट कानूनी भेद है। पिछली अस्थायी सेवाओं का उपयोग केवल पेंशन की न्यूनतम 10 वर्षीय पात्रता सीमा को पार करने के लिए किया जाएगा, जबकि मासिक पेंशन की वास्तविक वित्तीय गणना कर्मचारी द्वारा पूरी की गई नियमित सेवा अवधि के आधार पर ही होगी। इस फैसले से राजस्व विभाग और अन्य सरकारी उपक्रमों के उन हजारों संविदा व मौसमी कर्मियों को बड़ी राहत मिली है, जो जीवन भर सेवा देने के बावजूद मात्र कुछ माह या वर्षों की नियमित सेवा के कारण पेंशन से वंचित कर दिए गए थे।
Old Pension Scheme: झांसी के अलख प्रकाश मिश्रा का मामला
यह पूरा न्यायिक विवाद झांसी जिले में संग्रह अमीन के पद से सेवानिवृत्त हुए कर्मचारी अलख प्रकाश मिश्रा की याचिका से जुड़ा है। सेवा अभिलेखों के अनुसार, उन्होंने फरवरी 1984 में राजस्व विभाग में मौसमी संग्रह अमीन (Seasonal Collection Amin) के रूप में कार्यभार ग्रहण किया था। इसके उपरांत विभाग की प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप वे विभिन्न अवधियों में मौसमी, अस्थायी और तदर्थ आधार पर लगातार राजस्व वसूली का कार्य करते रहे।
लंबी कानूनी लड़ाइयों और विभागीय प्रक्रियाओं के बाद सितंबर 2016 में उन्हें संग्रह अमीन के पद पर नियमित किया गया और नवंबर 2018 में उनकी सेवा की पुष्टि (Confirmation) हुई। इसके पश्चात 31 जुलाई 2019 को वे अधिवर्षता आयु पूर्ण कर सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्ति के उपरांत जब उन्होंने पेंशन और अन्य ग्रेच्युटी लाभों के लिए आवेदन किया, तो राजस्व विभाग के सक्षम प्राधिकारियों ने उनके दावे को यह कहकर सिरे से खारिज कर दिया कि उनकी नियमित सेवा सितंबर 2016 से जुलाई 2019 तक यानी मात्र 2 वर्ष 10 माह की ही है, जो पेंशन के लिए निर्धारित 10 वर्ष की न्यूनतम अर्हकारी सेवा से काफी कम है।
विभाग का कड़ा रुख और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का संदर्भ
विभागीय अधिकारियों ने अपने आदेश के बचाव में यह तर्क प्रस्तुत किया कि उत्तर प्रदेश में 1 अप्रैल 2005 के बाद नियुक्त होने वाले कर्मचारियों पर नवीन अंशदायी पेंशन योजना (NPS) लागू होती है और चूंकि याची का नियमितीकरण 2016 में हुआ था, इसलिए उन्हें पुरानी पेंशन नियमावली के तहत लाभ नहीं दिया जा सकता। विभाग का कहना था कि मौसमी और तदर्थ सेवा की प्रकृति आकस्मिक होती है और उसे नियमित सिविल पदों के समकक्ष नहीं माना जा सकता।
राज्य सरकार के अधिवक्ताओं ने अपनी दलीलों के समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘उदय प्रताप ठाकुर बनाम बिहार राज्य’ मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया। सरकार का कहना था कि शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि कार्य प्रभारित (Work-charged) या तदर्थ सेवाओं को नियमित सेवा के समतुल्य मानकर पेंशन लाभ का दावा नहीं किया जा सकता। इसी व्याख्या के आधार पर विभाग ने अलख प्रकाश मिश्रा के तीन दशक से अधिक के सेवाकाल को दरकिनार कर दिया था।
हाईकोर्ट की दो टूक: 10 वर्ष की अर्हक सेवा में जुड़ेगा पिछला सेवाकाल
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की विस्तृत बहस सुनने और सेवा पंजिका का अवलोकन करने के उपरांत विभाग के निर्णय को मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत करार दिया। अदालत ने पाया कि याची ने वर्ष 1984 से 2008 तक और पुनः वर्ष 2012 से 2016 तक विभाग में वास्तविक रूप से कार्य किया है। न्यायालय ने माना कि जब राज्य सरकार ने स्वयं कर्मचारी की दीर्घकालिक निष्ठा को स्वीकार करते हुए 2016 में उसे नियमित पद पर समायोजित किया था, तो उसकी पूर्ववर्ती सेवा को शून्य नहीं माना जा सकता।
पीठ ने स्पष्ट किया कि पेंशन नियमावली के अंतर्गत ‘क्वालिफाइंग सर्विस’ का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी कर्मचारी ने लोक सेवा में अपना जीवन समर्पित किया है या नहीं। यदि 1984 से 2016 के बीच की गई मौसमी और तदर्थ सेवा को गणना में शामिल किया जाए, तो याची पेंशन के लिए आवश्यक 10 वर्ष की अनिवार्य न्यूनतम सेवा सीमा को सहजता से पार कर लेता है। इसलिए उसे केवल इस तकनीकी आधार पर पेंशनविहीन नहीं छोड़ा जा सकता कि उसकी नियमित सेवा तीन वर्ष से कम थी।
प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के सिद्धांत पर मुहर
अपने इस युगांतरकारी निर्णय में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ और वृहद पीठों द्वारा स्थापित न्यायिक नजीरों को आधार बनाया। अदालत ने विशेष रूप से ‘प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019)’ के ऐतिहासिक फैसले का उद्धरण दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सिविल सेवा नियमावली के उन प्रावधानों को निरस्त कर दिया था जो पेंशन के लिए कार्य-प्रभारित और तदर्थ कर्मचारियों की पूर्व सेवा को जोड़ने पर रोक लगाते थे।
इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने ‘उदय प्रताप ठाकुर’ मामले की सही विधिक व्याख्या करते हुए संतुलन साधा। अदालत ने रेखांकित किया कि प्रेम सिंह और उदय प्रताप ठाकुर दोनों फैसलों का संयुक्त निष्कर्ष यही है कि पूर्ववर्ती गैर-नियमित सेवा का उपयोग कर्मचारी को पेंशन के ‘पात्र’ बनाने यानी अर्हक सेवा की गणना तक ही सीमित रहेगा। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि अलख प्रकाश मिश्रा को पुरानी पेंशन का पात्र माना जाएगा, किंतु उनकी पेंशन की मूल राशि की गणना 5 सितंबर 2016 से 31 जुलाई 2019 तक की नियमित सेवा अवधि के आधार पर ही नियमानुसार की जाएगी।
आठ सप्ताह में भुगतान की समयसीमा: अधिकारियों को सख्त निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रशासनिक हीलाहवाली पर अंकुश लगाते हुए राज्य सरकार और संबंधित सक्षम अधिकारियों को एक निश्चित समयसीमा के भीतर आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने आदेशित किया है कि निर्णय की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से अधिकतम आठ सप्ताह के भीतर याची के पेंशन, पारिवारिक पेंशन, उपदान (Gratuity) और अन्य समस्त सेवानिवृत्ति देयों की विधिवत गणना कर संस्वीकृति आदेश जारी किया जाए।
न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित आठ सप्ताह की अवधि में प्रक्रिया पूर्ण नहीं की जाती है, तो राज्य सरकार को देय राशियों पर संबंधित सेवा नियमों के अनुसार नियत ब्याज का भुगतान भी करना पड़ सकता है। इस आदेश के साथ ही अदालत ने याची की रिट याचिका को पूरी तरह स्वीकार करते हुए विभागीय अस्वीकृति आदेश को निरस्त कर दिया।
Old Pension Scheme: उत्तर प्रदेश के संविदा और मौसमी कर्मियों पर दूरगामी प्रभाव
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फैसला उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर माना जा रहा है। सिंचाई, लोक निर्माण, वन और राजस्व जैसे विभागों में आज भी हजारों ऐसे कर्मचारी कार्यरत हैं या हाल के वर्षों में सेवानिवृत्त हुए हैं, जिनका नियमितीकरण सेवा के अंतिम पड़ाव में जाकर हुआ था।
अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य एक कल्याणकारी नियोक्ता होने के नाते अपने कर्मचारियों के उस लंबे सेवाकाल को नकार नहीं सकता जो उन्होंने नियमित होने से पूर्व विभाग की सेवा में खपाया था। यद्यपि वित्तीय गणना केवल नियमित अवधि तक सीमित रहेगी, किंतु न्यूनतम पेंशन की सुरक्षा मिलना भी इन सेवानिवृत्त बुजुर्ग कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए जीवन यापन का एक सम्मानजनक और स्थायी संबल साबित होगा।
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