Hariyali Teej 2026: हरियाली तीज पर कलश स्थापना में न करें ये 7 गलतियां, गलत मुहूर्त से लेकर दिशा और विसर्जन तक जानें सही नियम

कलश स्थापना के दौरान इन 7 गलतियों से बचें, जानें सही मुहूर्त, दिशा और पूजा विधि

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Hariyali Teej 2026: सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला हरियाली तीज का त्योहार सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने अखंड सुहाग, पति की दीर्घायु और सुखद दांपत्य जीवन की कामना के लिए मनाया जाता है। इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। महिलाएं निर्जला व्रत रखकर नए वस्त्र धारण करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और झूले झूलकर उत्सव मनाती हैं। शास्त्रों के अनुसार, हरियाली तीज की पूजा को पूर्ण और फलदायी बनाने के लिए घर में कलश स्थापना करने का विशेष विधान है।

धार्मिक मान्यताओं में कलश को त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और सर्व देव-देवियों का निवास स्थान माना गया है। हालांकि, कई बार अनजाने में या सही जानकारी न होने के कारण महिलाएं कलश स्थापना के दौरान कुछ बड़ी गलतियां कर बैठती हैं। ज्योतिष शास्त्र और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा-पाठ में हुई छोटी सी भूल भी अनुष्ठान को अधूरा बना सकती है और उसके शुभ फल में कमी ला सकती है। यदि आप भी इस हरियाली तीज पर घर में सुख-समृद्धि के लिए कलश स्थापित करने जा रही हैं, तो इन सात प्रमुख गलतियों को करने से बचें।

Hariyali Teej 2026: राहुकाल या अनुचित समय पर कलश स्थापना करना

हरियाली तीज के दिन कलश स्थापना करने के लिए शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना सबसे महत्वपूर्ण चरण है। अक्सर महिलाएं अपनी सुविधानुसार सुबह उठते ही या दोपहर में किसी भी समय कलश स्थापित कर देती हैं। शास्त्रों के अनुसार, राहुकाल या भद्रा काल के दौरान कोई भी मांगलिक कार्य या कलश स्थापना करना वर्जित माना जाता है। गलत समय पर स्थापित किया गया कलश पूजा की आध्यात्मिक ऊर्जा को प्रभावित करता है और घर में नकारात्मकता ला सकता है।

इसलिए, हमेशा स्थानीय पंचांग के अनुसार सावन माह के नक्षत्रीय संयोग और चौघड़िया मुहूर्त को देखकर ही शुभ घड़ी में कलश स्थापित करें। यदि किसी कारणवश पंडित जी से संपर्क न हो सके, तो अभिजीत मुहूर्त या शुभ चौघड़िया में ही यह कार्य संपन्न करें। सही समय का चुनाव पूजा की नींव को मजबूत करता है और घर में रिद्धि-सिद्धि का आगमन सुनिश्चित करता है।

अशुद्ध जल का प्रयोग और सामग्री का अधूरा होना

कलश में भरा जाने वाला जल उसकी पवित्रता का प्रतीक होता है। कई बार लोग जल्दबाजी में नल का साधारण या बासी पानी कलश में भर देते हैं, जो कि धार्मिक दृष्टि से अनुचित है। कलश में हमेशा गंगाजल, किसी पवित्र नदी का जल या साफ फिल्टर किया हुआ जल ही भरना चाहिए। यदि गंगाजल कम हो, तो शुद्ध जल में थोड़ा सा गंगाजल और तुलसी के पत्ते मिलाकर उसे पवित्र कर लें।

जल के अलावा कलश के अंदर रखी जाने वाली सामग्री का भी अपना एक विशेष आध्यात्मिक महत्व है। कलश के जल में साबुत सुपारी, तांबे या चांदी का सिक्का, हल्दी की गांठ, अक्षत (अखंडित चावल) और रोली डालना अनिवार्य है। इनमें से किसी भी सामग्री को छोड़ देने से कलश की पूजा अधूरी मानी जाती है। सभी पूजन सामग्रियों को पूर्व संध्या पर ही एकत्रित कर लें और उन्हें स्वच्छ करके ही कलश में अर्पित करें। पूर्ण सामग्री से भरा कलश ही देवताओं को आकर्षित करता है।

गलत दिशा और जमीन पर सीधे कलश स्थापित करना

वास्तु शास्त्र और पूजा विधान के अनुसार, कलश स्थापना के लिए दिशा का सही चयन करना अत्यंत आवश्यक है। कई बार घरों में स्थान का अभाव होने के कारण कलश को किसी भी कोने में रख दिया जाता है। शास्त्रों में ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को देवताओं का स्थान माना गया है। इसलिए कलश को हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा में ही स्थापित करना चाहिए।

दूसरी सबसे बड़ी भूल कलश को सीधे फर्श या जमीन पर रख देना है। कलश को कभी भी सीधे धरातल पर नहीं रखना चाहिए। सबसे पहले लकड़ी की एक साफ चौकी या पाटा रखें, उस पर लाल या हरा रेशमी कपड़ा बिछाएं। इसके बाद उस पर सप्तधान्य (सात प्रकार के अनाज) या अक्षत की ढेरी बनाएं और उसके ऊपर कलश की स्थापना करें। गलत दिशा में रखा गया कलश वास्तु दोष उत्पन्न कर सकता है, इसलिए सही दिशा और आधार का विशेष ध्यान रखें।

मंत्रोच्चारण और गणेश पूजन का अभाव

कलश केवल एक पात्र नहीं, बल्कि आह्वान किए गए देवी-देवताओं का प्रतीक होता है। कई महिलाएं बिना कोई मंत्र बोले या बिना गणेश स्मरण के केवल कलश रखकर पूजा प्रारंभ कर देती हैं। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, किसी भी पूजा में सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश का स्मरण और आह्वान करना अनिवार्य है।

कलश स्थापित करते समय ‘ॐ गं गणपतये नमः’ या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर जाप करना चाहिए। यदि आपको कठिन संस्कृत मंत्र याद न हों, तो आप सरल हिंदी में हाथ जोड़कर भगवान शिव और माता पार्वती से कलश में विराजमान होने की प्रार्थना कर सकती हैं। भाव और एकाग्रता सबसे महत्वपूर्ण हैं। बिना मंत्र या भक्ति भाव के किया गया अनुष्ठान निष्फल माना जाता है।

कलश को खुला छोड़ना या अधूरा नारियल रखना

स्थापना के पश्चात कलश के मुख को खुला छोड़ देना एक बड़ी गंभीर त्रुटि है। कलश स्थापन की विधि के अनुसार, कलश के मुख पर आम या अशोक के 5 या 7 पल्लव (पत्ते) लगाए जाते हैं। इन पत्तों के ऊपर चावल से भरा एक पात्र रखा जाता है और उसके ऊपर नारियल स्थापित किया जाता है।

नारियल रखते समय यह ध्यान रखें कि नारियल को लाल या हरे रंग के कपड़े या चुनरी में लपेटकर और कलावा (मौली) बांधकर ही रखा जाए। नारियल का मुख हमेशा अपनी तरफ या ऊपर की ओर होना चाहिए, नीचे की ओर नहीं। बिना नारियल या बिना पत्तों के कलश अधूरा माना जाता है। यह आवरण कलश के भीतर प्रवाहित होने वाली दिव्य ऊर्जा को सुरक्षित रखता है और वातावरण में सकारात्मकता फैलाता है।

अशौच अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा सामग्री को स्पर्श करना

पूजा-पाठ में शारीरिक और मानसिक पवित्रता सर्वोपरि है। कई बार महिलाएं गृहकार्य की जल्दबाजी में बिना स्नान किए या रोजमर्रा के वस्त्रों में ही पूजा की तैयारी शुरू कर देती हैं। कलश स्थापना से पूर्व स्नान करके पूर्णतः स्वच्छ वस्त्र (अधिमानतः लाल, पीले या हरे रंग के) धारण करने चाहिए।

इसके अतिरिक्त, यदि मन में अशांति, क्रोध या घर में किसी प्रकार का अशौच (सूतक आदि) हो, तो कलश स्थापना से बचना चाहिए। शांत और पवित्र मन से की गई आराधना ही भगवती पार्वती स्वीकार करती हैं। स्वच्छता न केवल धार्मिक नियमों के अनुकूल है, बल्कि यह पूजा स्थल के वातावरण को भी शुद्ध और दिव्य बनाती है।

Hariyali Teej 2026: पूजा समापन के बाद कलश सामग्री का अनुचित विसर्जन

व्रत और पूजा संपन्न होने के बाद कलश का क्या किया जाए, इसे लेकर भी अक्सर अनभिज्ञता देखने को मिलती है। कुछ लोग कलश के जल को नाली या कूड़े के आसपास बहा देते हैं और सामग्री को अनुचित स्थान पर फेंक देते हैं। यह पूजा का सबसे बड़ा अनादर माना जाता है।

पूजा की समाप्ति (व्रत पारण के बाद) पर कलश के पवित्र जल का छिड़काव पूरे घर में करें ताकि नकारात्मक ऊर्जा दूर हो। शेष जल को तुलसी के पौधे या किसी पवित्र वृक्ष (जैसे पीपल या बरगद) की जड़ में अर्पित कर दें। कलश के ऊपर रखे नारियल और आम के पत्तों को किसी बहती नदी या स्वच्छ जलस्रोत में विसर्जित करें या फिर अपने घर के बगीचे में स्वच्छ मिट्टी के नीचे दबा दें। कलश में रखे सिक्के को अपनी तिजोरी में रख लें, इससे धन-धान्य में वृद्धि होती है। सही विसर्जन से ही अनुष्ठान का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

हरियाली तीज का यह पावन पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि समर्पण, भक्ति और पारिवारिक सौहार्द का प्रतीक है। विधिवत और बिना किसी भूल-चूक के की गई कलश स्थापना आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि का विस्तार करती है। इस बार तीज पर इन सभी बातों का ध्यान रखते हुए माता पार्वती और भोलेनाथ का पूजन करें और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करें।

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