Sugar Price Hike: चीनी की बढ़ती कीमतों पर केंद्र का बड़ा दावा, इथेनॉल ब्लेंडिंग नहीं बल्कि कम उत्पादन और जमाखोरी को बताया असली वजह

सरकार ने कम उत्पादन, कीट प्रकोप और बढ़ी मांग को कीमत बढ़ने की मुख्य वजह बताया

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Sugar Price Hike: देशभर में आगामी प्रमुख त्योहारों के सीजन से ठीक पहले खुदरा और थोक बाजारों में चीनी की कीमतों में आई अचानक तेजी ने आम उपभोक्ताओं के घरेलू बजट और मिष्ठान उद्योग दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया है। बीते महज एक महीने के भीतर खुदरा बाजार में चीनी के दाम 48 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर से उछलकर 55 रुपये प्रति किलोग्राम के पार पहुंच गए हैं। इस मूल्य वृद्धि को लेकर बाजार विशेषज्ञों और विपक्षी दलों द्वारा यह कयास लगाए जा रहे थे कि सरकार की महत्वाकांक्षी इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के तहत गन्ने के रस और शीरे का भारी डायवर्जन होने से चीनी की घरेलू उपलब्धता घटी है। हालांकि, केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने शुक्रवार को आधिकारिक बयान जारी कर इन सभी दावों और आशंकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि चीनी की हालिया महंगाई के लिए इथेनॉल उत्पादन नीति कतई जिम्मेदार नहीं है, बल्कि इसके पीछे चालू पेराई सत्र में कुल उत्पादन में आई गिरावट, गन्ने की फसलों में लगे गंभीर कीट रोग, प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियां, त्योहारी सीजन की बढ़ी हुई मांग और व्यापारियों द्वारा की जा रही अनुचित जमाखोरी मुख्य कारण हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश में चीनी का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है और जमाखोरों व मुनाफाखोरों पर नकेल कसने के लिए कठोर प्रशासनिक कदम उठाए जा रहे हैं।

Sugar Price Hike: इथेनॉल नीति पर सरकार का रुख और आंकड़ों के जरिए भ्रम का निवारण

उपभोक्ता मामले मंत्रालय द्वारा जारी किए गए तुलनात्मक मूल्य आंकड़ों के अनुसार 20 जुलाई को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत लगभग 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम के उच्च स्तर पर पहुंच गई। इस तेज उछाल के बाद जब बाजार में इथेनॉल निर्माण को लेकर सवाल खड़े होने लगे, तो सरकार ने तथ्यात्मक आंकड़े सार्वजनिक किए। मंत्रालय के अनुसार इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के उपयोग का अनुपात वर्ष 2022-23 में कुल उत्पादन का लगभग 12 प्रतिशत था, जो वर्ष 2025-26 के मौजूदा सत्र में घटकर मात्र 9 प्रतिशत के करीब रह गया है।
इसके अतिरिक्त देश में उत्पादित होने वाले कुल इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब गन्ने के बजाय अनाजों, विशेष रूप से टूटे हुए चावल और मक्के (कॉर्न) से तैयार किया जा रहा है। सरकार के इस नीतिगत बदलाव ने इथेनॉल क्षेत्र की चीनी पर प्रत्यक्ष निर्भरता को काफी हद तक कम कर दिया है। ऐसे में बाजार में चीनी की किल्लत और मूल्य वृद्धि के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग को दोषी ठहराना पूरी तरह से निराधार और तथ्यात्मक रूप से गलत है।

गन्ना किसानों के बकाये का रिकॉर्ड भुगतान और मिलों की वित्तीय मजबूती

केंद्रीय खाद्य मंत्रालय ने रेखांकित किया कि सामान्य वर्षों में भारत में लगभग 320 से 340 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि देश की कुल वार्षिक घरेलू खपत लगभग 280 से 290 लाख मीट्रिक टन के आसपास रहती है। सामान्य दिनों में अतिरिक्त चीनी का इथेनॉल में रूपांतरण चीनी मिलों की वित्तीय सेहत को सुधारने में एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ है। पूर्व के वर्षों में जहां चीनी मिलों पर किसानों के हजारों करोड़ रुपये का गन्ना बकाया कई-कई महीनों तक अटका रहता था, वहीं अब इथेनॉल आपूर्ति से मिलने वाले त्वरित नकदी प्रवाह के कारण किसानों को समय पर भुगतान संभव हो सका है।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 20 अगस्त 2026 तक वर्तमान पेराई सत्र 2025-26 के कुल देय गन्ना बकाये का 97 प्रतिशत से अधिक भुगतान किसानों के बैंक खातों में सीधे हस्तांतरित किया जा चुका है। सरकार का कहना है कि इथेनॉल नीति ने न केवल मिलों की आर्थिक स्थिरता को बहाल किया है, बल्कि करोड़ों अन्नदाताओं को उनकी फसल का उचित और समयबद्ध मूल्य दिलाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी संबल प्रदान किया है।

चीनी उत्पादन में गिरावट के वास्तविक कारण: कीट प्रकोप और मौसमी मार

चालू सत्र में चीनी उत्पादन के आंकड़े अनुमान की तुलना में काफी कम दर्ज किए गए हैं, जो हालिया मूल्य वृद्धि का एक बड़ा बुनियादी कारण है। सत्र की शुरुआत में प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों के कृषि विभागों और मिल संघों ने कुल राष्ट्रीय उत्पादन लगभग 343 लाख मीट्रिक टन रहने का प्रारंभिक अनुमान लगाया था। हालांकि, बाद में संशोधित आकलन में यह आंकड़ा घटकर लगभग 306 लाख मीट्रिक टन के स्तर पर आ गया। इस भारी गिरावट के पीछे मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में फैला ‘रेड रॉट’ (लाल सड़न रोग) और ‘टॉप बोरर’ (शीर्ष प्ररोह भेदक) जैसे विनाशकारी कीटों का गंभीर प्रकोप रहा है।
इसके अलावा मानसूनी सीजन के दौरान प्रमुख गन्ना बेल्टों में अत्यधिक भारी वर्षा और लंबे समय तक बने रहे जलभराव की स्थिति ने गन्ने में सुक्रोज यानी चीनी की रिकवरी दर को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते पेराई के दौरान गन्ने से निकलने वाली चीनी की मात्रा में भारी कमी दर्ज की गई। त्योहारी मांग के चरम पर होने के समय उत्पादन में आई इस कमी का फायदा उठाकर कुछ असामाजिक तत्वों और बड़े थोक कारोबारियों ने बाजार में कृत्रिम अभाव का माहौल तैयार करना शुरू कर दिया, जिससे कीमतें तेजी से ऊपर चढ़ गईं।

वैश्विक बाजार में चीनी का संकट और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी उछाल

भारतीय घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में आई तेजी केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक कमोडिटी बाजार में चल रहे गंभीर आपूर्ति संकट का भी प्रतिबिंब है। अंतरराष्ट्रीय चीनी संगठन और वैश्विक विश्लेषकों के अनुसार वर्ष 2026-27 के वैश्विक सत्र में दुनिया भर में लगभग 33 लाख मीट्रिक टन चीनी की शुद्ध कमी रहने का अनुमान लगाया गया है। ब्राजील और थाईलैंड जैसे दुनिया के अग्रणी चीनी निर्यातक देशों में सूखे और चरम मौसमी घटनाओं के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतें 30 जून को जहां 474 डॉलर प्रति मीट्रिक टन थीं, वहीं 20 अगस्त तक उछलकर 552 डॉलर प्रति मीट्रिक टन के स्तर पर पहुंच गईं। मात्र दो महीने की अल्पावधि में अंतरराष्ट्रीय वायदा और हाजिर भावों में 16 प्रतिशत से अधिक की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि भारत ने घरेलू आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए चीनी के अनियंत्रित निर्यात पर पहले से ही कड़े अंकुश लगा रखे हैं, फिर भी वैश्विक बाजार में मची इस अफरातफरी और उच्च मूल्य प्रवृत्तियों ने घरेलू थोक व्यापार में सट्टेबाजी को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया है।

जमाखोरी पर अंकुश के लिए सख्त स्टॉक लिमिट और मिलों की भौतिक जांच

कृत्रिम कमी पैदा करके अनुचित लाभ कमाने वाले बिचौलियों, थोक व्यापारियों और सिंडिकेट्स पर नकेल कसने के लिए केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अत्यंत कड़े प्रशासनिक कदम उठाए हैं। सरकार ने 1 अगस्त से आगामी 30 नवंबर 2026 तक सभी चीनी थोक कारोबारियों, वितरकों और खुदरा श्रृंखलाओं के लिए 400 मीट्रिक टन की अनिवार्य स्टॉक सीमा लागू कर दी है। इसके अतिरिक्त 1 सितंबर से सभी बड़े संस्थागत खरीदारों, जिनमें शीतल पेय निर्माता, बिस्कुट कंपनियां और बड़े कन्फेक्शनरी उद्योग शामिल हैं, के लिए यह नियम तय किया गया है कि वे अपनी 15 दिनों की अधिकतम खपत से अधिक का स्टॉक भंडारित नहीं कर सकेंगे।
बाजार में वास्तविक स्टॉक की स्थिति परखने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रवर्तन दलों ने देश भर की निजी व सहकारी चीनी मिलों के गोदामों में जाकर भौतिक सत्यापन शुरू कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि किसी मिल या व्यापारी के पास निर्धारित सीमा से अधिक या अघोषित चीनी का भंडार पाया जाता है, तो उसके खिलाफ आवश्यक वस्तु कानून के तहत कड़ी दंडात्मक कार्रवाई और जब्ती की प्रक्रिया अमल में लाई जाएगी। इस सघन निगरानी से कालाबाजारी और सट्टेबाजी पर प्रभावी अंकुश लगने की पूरी उम्मीद है।

घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क मुक्त आयात

घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और आगामी त्योहारी सीजन जैसे रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान कीमतों को पूरी तरह नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने आपूर्ति बढ़ाने के कई रणनीतिक निर्णय लिए हैं। इसके अंतर्गत देश में 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी (रॉ शुगर) के शून्य सीमा शुल्क पर आयात की अनुमति प्रदान कर दी गई है। यह कच्ची चीनी तटीय और आंतरिक रिफाइनरियों में त्वरित रूप से प्रोसेस होकर घरेलू खुदरा बाजार में उतारी जाएगी, जिससे स्थानीय आपूर्ति में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं रहेगा।
साथ ही केंद्र सरकार ने सभी प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों—उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु की राज्य सरकारों व संबंधित मिलों को निर्देश जारी किए हैं कि वे आगामी पेराई सत्र की शुरुआत पारंपरिक समय से पहले यानी 15 अक्टूबर से अनिवार्य रूप से शुरू करें। सामान्यतः अक्टूबर के शुरुआती पखवाड़े में देश में मात्र तीन से चार लाख टन चीनी का उत्पादन हो पाता है, किंतु इस बार अग्रिम पेराई प्रबंधन के चलते अक्टूबर माह में ही 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक नई चीनी का उत्पादन होने का अनुमान है। नई फसल की यह प्रारंभिक आवक सीधे बाजार में पहुंचकर मूल्य दबाव को पूरी तरह शांत कर देगी।

Sugar Price Hike: उपभोक्ताओं और किसानों के हितों का संतुलन तथा भविष्य की कार्ययोजना

केंद्र सरकार का दृढ़ संकल्प है कि वह 140 करोड़ आम उपभोक्ताओं को उचित और वहन करने योग्य दरों पर आवश्यक खाद्य वस्तुएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ देश के करोड़ों गन्ना किसानों के आर्थिक हितों की रक्षा भी सुनिश्चित करेगी। सरकार की त्रिस्तरीय रणनीति—कच्ची चीनी का समयबद्ध आयात, मिलों पर सख्त निगरानी के साथ स्टॉक लिमिट का क्रियान्वयन और पेराई सत्र का समय से पूर्व आरंभ—आने वाले हफ्तों में चीनी की कीमतों को वापस 45 से 48 रुपये प्रति किलोग्राम के सामान्य दायरे में लाने में पूरी तरह सक्षम होगी।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय और खाद्य विभाग का विशेष नियंत्रण कक्ष 24 घंटे देश के सभी प्रमुख व्यापारिक केंद्रों, थोक मंडियों और खुदरा दुकानों में चीनी के दैनिक आवक और भावों की सूक्ष्म निगरानी कर रहा है। सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि देश में चीनी की कोई वास्तविक कमी नहीं है और आम नागरिकों को अफवाहों या घबराहट में आकर अतिरिक्त खरीदारी करने की आवश्यकता नहीं है। सरकार द्वारा उठाए गए इन ठोस नीतिगत और प्रशासनिक उपायों के परिणामस्वरूप आने वाले दिनों में खुदरा बाजार में चीनी की कीमतों में स्पष्ट नरमी और स्थिरता देखने को मिलेगी।

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