गर्भ में ही बच्चे के दिल की बीमारी का पता लगाना संभव, समय पर जांच से बच सकती है नवजात की जान

गर्भावस्था के दौरान फिटल इकोकार्डियोग्राफी से शिशु के दिल की संरचना और रक्त प्रवाह की जांच की जा सकती है।

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Fetal Heart Defects: गर्भावस्था के दौरान गर्भस्थ शिशु (Fetus) के समुचित शारीरिक विकास और उसके आंतरिक अंगों की बनावट की समय-समय पर चिकित्सकीय निगरानी अत्यंत आवश्यक होती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और उन्नत रेडियोलॉजी तकनीकों ने आज यह संभव कर दिया है कि प्रसव से कई माह पूर्व ही शिशु के हृदय में मौजूद संरचनात्मक अथवा क्रियात्मक विसंगतियों की सटीक पहचान की जा सके। इसके बावजूद, जनसामान्य में जागरूकता के अभाव, नियमित प्रसवपूर्व जांचों (Antenatal Care) की अनदेखी और सुदूर ग्रामीण अंचलों में विशेषज्ञ बाल हृदय रोग चिकित्सकों (Pediatric Cardiologists) तक सीमित पहुंच के कारण प्रतिवर्ष हजारों नवजात शिशु जन्मजात हृदय दोष (Congenital Heart Defects – CHD) के साथ जन्म लेते हैं और समय पर पहचान न होने के कारण गंभीर जटिलताओं का सामना करते हैं।

हृदय रोग विशेषज्ञों और स्त्री रोग विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में ही दिल की गड़बड़ियों को चिन्हित कर लिया जाए, तो प्रसव के तुरंत बाद नियोनेटल आईसीयू (NICU) और पीडियाट्रिक कार्डियक सर्जरी की पूर्व तैयारी कर नवजात की जान बचाई जा सकती है।

Fetal Heart Defects: जन्मजात हृदय रोग (CHD) क्या है और यह क्यों बनता है गंभीर खतरा?

जन्मजात हृदय रोग एक ऐसी चिकित्सकीय स्थिति है, जिसमें गर्भ में भ्रूण के विकास के प्रारंभिक हफ्तों के दौरान ही दिल की आंतरिक बनावट, वाल्व, रक्त वाहिकाओं या उसके चारों कक्षों (Atria और Ventricles) का निर्माण सामान्य रूप से नहीं हो पाता। इसके परिणामस्वरूप हृदय से फेफड़ों और शरीर के शेष हिस्सों में होने वाला शुद्ध व अशुद्ध रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है।

चिकित्सकीय आंकड़ों के अनुसार, यह समस्या विभिन्न श्रेणियों में देखी जाती है। कुछ शिशुओं में हृदय के पर्दों में छोटे छिद्र (जैसे VSD या ASD) होते हैं, जो कई बार समय के साथ स्वतः ठीक हो जाते हैं या सामान्य निगरानी की मांग करते हैं। वहीं दूसरी ओर, टेट्रालॉजी ऑफ फैलो (Tetralogy of Fallot) या ट्रांसपोजिशन ऑफ ग्रेट आर्टरीज (TGA) जैसी जटिल विसंगतियों में जन्म के चंद घंटों या दिनों के भीतर ही ओपन-हार्ट सर्जरी की दरकार होती है। वैश्विक स्तर पर प्रति 1,000 जीवित जन्मों में लगभग 8 से 9 शिशु जन्मजात हृदय रोग से ग्रस्त पाए जाते हैं। भारत में घनी आबादी और जन्म दर को देखते हुए यह आंकड़ा स्वास्थ्य प्रणाली के समक्ष एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है।

सामान्य अल्ट्रासाउंड और फिटल इकोकार्डियोग्राफी में क्या अंतर है?

गर्भावस्था के दौरान आमतौर पर महिलाओं का नियमित अल्ट्रासाउंड और 18 से 20 सप्ताह के बीच ‘लेवल-2 एनॉमली स्कैन’ कराया जाता है। यह स्कैन भ्रूण के मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी, चेहरे, पेट और अंगों की सामान्य बनावट को देखने के लिए अनिवार्य होता है। इसमें शिशु के दिल का फोर-चेंबर व्यू भी जांचा जाता है, जिससे दिल की बड़ी और प्रत्यक्ष विसंगतियों का प्राथमिक संदेह सामने आ सकता है।

किंतु जब दिल की सूक्ष्म संरचनाओं, रक्त प्रवाह की गति, धमनियों के जुड़ाव और वाल्वों की कार्यप्रणाली की बारीक जांच करनी हो, तो सामान्य अल्ट्रासाउंड पर्याप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में फिटल इकोकार्डियोग्राफी (Fetal Echocardiography) की आवश्यकता होती है। यह एक विशेष प्रकार का अत्यधिक संवेदनशील अल्ट्रासाउंड परीक्षण है, जो विशेष रूप से भ्रूण के हृदय पर केंद्रित होता है। इसमें कलर डॉपलर तकनीक के माध्यम से हृदय के भीतर रक्त के परिसंचरण, महाधमनी (Aorta) और पल्मोनरी आर्टरी के जुड़ाव तथा दिल की धड़कनों की लय (Fetal Arrhythmia) का अत्यंत सटीक विश्लेषण किया जाता है।

जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा

जन्मजात हृदय रोगों की समय पर पहचान न हो पाने के पीछे मुख्य कारण सामाजिक और ढांचागत चुनौतियां हैं। अधिकांश परिवारों में यह धारणा बनी रहती है कि सामान्य सोनोग्राफी से शरीर के सभी अंगों की संपूर्ण जांच हो चुकी है, जबकि हृदय की सूक्ष्म विसंगतियों को पकड़ने के लिए विशेष दक्षता की आवश्यकता होती है।

इसके अलावा टियर-2, टियर-3 शहरों और ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में फिटल मेडिसिन के प्रशिक्षित विशेषज्ञ, उच्च गुणवत्ता वाली सोनोग्राफी मशीनें और पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट सुलभ नहीं हैं। जांच करने वाले रेडियोलॉजिस्ट के अनुभव और कभी-कभी गर्भ में बच्चे की शारीरिक स्थिति (Fetal Position) या मां के वजन के कारण भी अल्ट्रासाउंड तरंगें दिल की गहराई तक स्पष्ट चित्र नहीं बना पातीं, जिससे जटिल विकार प्रसव से पहले पकड़ में आने से छूट जाते हैं।

Fetal Heart Defects: प्रसवपूर्व पहचान से नवजात के जीवन की सुरक्षा

गर्भ में ही हृदय विकार का पता चलने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि इससे नवजात शिशु को जन्म के तुरंत बाद मिलने वाले ‘गोल्डन ऑवर’ (Golden Hour) का समुचित उपयोग हो पाता है। यदि किसी जटिल विसंगति की पुष्टि गर्भावस्था के दौरान हो जाती है, तो परिवार और चिकित्सक पहले से ही योजना बना सकते हैं कि प्रसव किसी सामान्य नर्सिंग होम में कराने के बजाय ऐसे टर्शियरी केयर अस्पताल में कराया जाए, जहां उन्नत एनआईसीयू (NICU) और शिशु हृदय शल्य चिकित्सा की चौबीसों घंटे सुविधा उपलब्ध हो।

समय पर तैयारी होने से जन्म लेते ही शिशु को आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं (जैसे प्रोस्टाग्लैंडिन इन्फ्यूजन) दी जा सकती हैं, जो सर्जरी होने तक हृदय की नलियों को खुला रखती हैं। इस पूर्व नियोजन से आपातकालीन स्थिति में नवजात को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने के दौरान होने वाले जीवन के जोखिम से पूरी तरह बचा जा सकता है।

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