दिवाली पर प्रदोष काल में करें मां लक्ष्मी के बीसा यंत्र की पूजा, जानें विधि और महत्व
दीपावली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के साथ लक्ष्मी बीसा यंत्र की आराधना भी की जाती है।
Lakshmi Beesa Yantra Puja: सनातन परंपरा में कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला प्रकाश पर्व दीपावली केवल दीप प्रज्वलित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धन, धान्य, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक उन्नति की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी के आह्वान का महापर्व है। इस पावन निशा में घरों, दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में विघ्नहर्ता भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजा की जाती है। इसी आराधना में एक अत्यंत चमत्कारी और प्रभावशाली तांत्रिक-वैदिक साधन माना जाता है मां लक्ष्मी का बीसा यंत्र। तंत्र और ज्योतिष शास्त्र में मान्यता है कि दीपावली की रात्रि, विशेष रूप से प्रदोष काल और स्थिर लग्न में, यदि लक्ष्मी बीसा यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा और विधिवत अर्चना की जाए, तो जातक के जीवन से दरिद्रता का नाश होता है और घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।
आइए विस्तार से समझते हैं कि लक्ष्मी बीसा यंत्र क्या है, दीपावली पर इसका तात्विक महत्व क्या है, और इस वर्ष 2026 में प्रदोष काल के दौरान इसकी पूजा कैसे संपन्न करें।
Lakshmi Beesa Yantra Puja: क्या है मां लक्ष्मी का बीसा यंत्र और इसका आध्यात्मिक रहस्य?
यंत्र का शाब्दिक अर्थ होता है किसी देवी या देवता की ऊर्जा को ज्यामितीय आकृतियों में संचित करना। ‘बीसा’ शब्द अंक 20 (बीस) का प्रतीक माना जाता है। इस यंत्र की संरचना में विशिष्ट गणितीय कोष्ठक (मैट्रिक्स) और बीजाक्षर इस प्रकार अंकित होते हैं कि उनकी किसी भी दिशा (क्षैतिज, लंबवत या विकर्ण) से गणना करने पर योग सदैव बीस ही आता है।
अंक शास्त्र और शाक्त परंपरा में बीस का यह अंक मां दुर्गा और महालक्ष्मी के अत्यंत प्रबल सुरक्षा और ऐश्वर्य का कारक माना गया है। सोने, चांदी, तांबे की धातु की प्लेट अथवा भोजपत्र पर अष्टगंध से निर्मित यह यंत्र मां लक्ष्मी की साक्षात ऊर्जा का केंद्र बिंदु माना जाता है। व्यापार में निरंतर हो रहे घाटे, आर्थिक अस्थिरता, कर्ज से मुक्ति और घर में बरकत बनाए रखने के लिए इस यंत्र को पूजा स्थल या तिजोरी में स्थापित किया जाता है।
दिवाली 2026 पर प्रदोष काल का महत्व और लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त
शास्त्रों में कार्तिक अमावस्या के दिन प्रदोष काल में की जाने वाली लक्ष्मी पूजा को सर्वोत्तम माना गया है। प्रदोष काल वह समय होता है जो सूर्यास्त के उपरांत लगभग 2 घंटे 24 मिनट तक व्याप्त रहता है। इस कालखंड में स्थिर लग्न (जैसे वृषभ लग्न) का संयोग बनने पर की गई आराधना से लक्ष्मी जी जातक के गृह में स्थायी रूप से वास करती हैं।
वर्ष 2026 में दीपावली का महापर्व 8 नवंबर, रविवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस दिन कार्तिक मास की अमावस्या तिथि विद्यमान रहेगी।
लखनऊ और उत्तर भारत के पंचांगीय समय के अनुसार, इस वर्ष दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के लिए प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त शाम 5:44 बजे से रात्रि 7:40 बजे तक रहेगा। इस समयावधि में स्थिर वृषभ लग्न का प्रभाव रहने से मां लक्ष्मी, कुबेर देव और लक्ष्मी बीसा यंत्र की स्थापना व पूजन विशेष रूप से फलदायी माना जाएगा।
प्रदोष काल में लक्ष्मी बीसा यंत्र की चरणबद्ध पूजा विधि
दीपावली के दिन प्रातः काल से ही घर में पवित्रता और स्वच्छता का विशेष वातावरण तैयार करें। सायंकाल में प्रदोष काल प्रारंभ होने से पूर्व पूजा की तैयारी पूर्ण कर लें।
पूजा चौकी पर लाल या पीले रंग का रेशमी वस्त्र बिछाएं और उस पर अक्षत की ढेरी बनाकर गणेश जी और लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करें। उनके सम्मुख एक स्वच्छ ताम्र अथवा चांदी की थाली में अष्टदल कमल बनाकर उस पर ‘लक्ष्मी बीसा यंत्र’ को स्थापित करें।
सर्वप्रथम स्वयं और पूजा सामग्री पर गंगाजल छिड़ककर पवित्रीकरण करें। इसके उपरांत हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपने नाम, गोत्र और अभीष्ट मनोकामना का स्मरण करते हुए पूजन का संकल्प लें।
सबसे पहले भगवान गणेश का पंचोपचार पूजन करें। उन्हें रोली, दुर्वा, मोदक और जनेऊ अर्पित करें। इसके बाद मां लक्ष्मी का ध्यान करें और कमल का पुष्प, गुलाब की माला, सिंदूर, इत्र और कमलगट्टे की माला अर्पित करें।
लक्ष्मी बीसा यंत्र को पहले गंगाजल और फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं। तत्पश्चात स्वच्छ कपड़े से पोंछकर उस पर कुमकुम, चंदन और अक्षत से तिलक करें। यंत्र पर लाल गुलाब या कमल का फूल अर्पित करें।
यंत्र के समक्ष शुद्ध देसी घी का एक चौमुखा दीपक और सुगंधित धूपबत्ती प्रज्वलित करें। मां लक्ष्मी को खीर, बताशे, पंचमेवा और ऋतुफलों का नैवेद्य अर्पित करें।
इसके पश्चात कमलगट्टे की माला से मां लक्ष्मी के बीज मंत्र “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्ध लक्ष्म्यै नमः” अथवा “ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्” का कम से कम 108 बार (एक माला) एकाग्रचित्त होकर जप करें।
पूजन के समापन पर परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की आरती गाएं। आरती के उपरांत शंखनाद और घंटी बजाकर घर के कोने-कोने में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें। अंत में सभी में प्रसाद वितरित करें।
दीपावली की पूरी रात इस यंत्र को पूजा स्थान पर ही रहने दें। अगले दिन प्रातः स्नान के उपरांत इस सिद्ध लक्ष्मी बीसा यंत्र को अपने घर की तिजोरी, अलमारी, कैश लॉकर अथवा अपने व्यापारिक गल्ले में लाल रेशमी कपड़े में लपेटकर स्थापित कर लें।
Lakshmi Beesa Yantra Puja: पूजन के समय इन नियमों का रखें विशेष ध्यान
दीपावली की पूजा में पवित्रता सर्वोपरि है। पूजा स्थल के आसपास किसी भी प्रकार का पुराना कबाड़, खंडित मूर्तियां या जूते-चप्पल नहीं होने चाहिए। घर के मुख्य द्वार पर रोली से स्वास्तिक और ॐ के शुभ चिह्न बनाएं तथा आम के पत्तों का तोरण अवश्य लगाएं।
पूजा के दौरान मन में किसी भी प्रकार का क्रोध, द्वेष या चिंता न लाएं। संपूर्ण अनुष्ठान शांत चित्त और अगाध श्रद्धा के साथ संपन्न करें। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी यंत्र का वास्तविक प्रभाव तब जागृत होता है जब जातक का आचरण पवित्र हो और वह परिश्रम, ईमानदारी तथा भक्ति के मार्ग पर अग्रसर रहे।
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