Edible Oil Import Duty Cut: त्योहारों से पहले सस्ता हो सकता है खाने का तेल, सरकार 5% तक घटा सकती है आयात शुल्क
सरकार 5% तक आयात शुल्क घटाने पर कर रही विचार, त्योहारी सीजन में मिल सकती है राहत
Edible Oil Import Duty Cut: आगामी त्योहारी और वैवाहिक सीजन से ठीक पहले रसोई के बजट को बेपटरी होने से बचाने के लिए केंद्र सरकार एक बड़े नीतिगत कदम पर विचार कर रही है। देश में बीते एक वर्ष के दौरान खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों में लगभग 20 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। ऐसे समय में जब गणेशोत्सव, नवरात्रि, करवा चौथ और दिवाली जैसे प्रमुख पर्वों के दौरान मिठाइयों, नमकीन और पारंपारिक व्यंजनों के लिए तेल की मांग अपने चरम पर पहुंच जाती है, सरकार खाद्य तेलों पर लगने वाली बेसिक इंपोर्ट ड्यूटी यानी बुनियादी सीमा शुल्क में लगभग 5 प्रतिशत तक की कटौती करने के विकल्प पर सक्रियता से मंथन कर रही है।
यदि वित्त मंत्रालय और खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा इस प्रस्ताव को औपचारिक स्वीकृति दी जाती है, तो विदेशी बाजारों से आने वाले कच्चे और रिफाइंड खाद्य तेलों की लैंडिंग लागत में तत्काल गिरावट आएगी। हालांकि इस नीतिगत निर्णय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार को आम उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत दिलाने के साथ-साथ खरीफ विपणन सत्र में अपनी सोयाबीन और मूंगफली की फसल लेकर मंडियों में पहुंचने वाले घरेलू तिलहन किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और आमदनी की रक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।
Edible Oil Import Duty Cut: त्योहारी सीजन में मांग का दबाव और खाद्य मुद्रास्फीति पर काबू पाने की रणनीति
भारत में सितंबर से लेकर दिसंबर तक का समय धार्मिक आयोजनों और शादी-ब्याह के चलते खाद्य तेलों की सर्वाधिक खपत वाला काल माना जाता है। व्यावसायिक हलवाईयों, रेस्टोरेंट उद्योग, पैकेज्ड फूड कंपनियों और सामान्य गृहणियों की ओर से मांग में भारी उछाल आने से खुदरा बाजारों में आपूर्ति की कमी और जमाखोरी का जोखिम बढ़ जाता है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी हालिया उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में भी खाद्य महंगाई के आंकड़ों में आई तेजी ने नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है।
सरकार का प्राथमिक उद्देश्य त्योहारी खरीदारी शुरू होने से पहले ही आयातित तेलों पर लगने वाले शुल्कों को घटाकर आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना है। बेसिक कस्टम ड्यूटी में 5 प्रतिशत की संभावित कटौती से पामोलिन, सोयाबीन और सनफ्लावर ऑयल के थोक मूल्यों में प्रति किलो उल्लेखनीय राहत मिल सकती है, जिससे पैकेज्ड ब्रांडेड तेलों के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर भी नीचे की ओर दबाव बनेगा।
5 प्रतिशत की संतुलित कटौती का प्रस्ताव: क्यों बचा जा रहा है गहरी छूट से
रॉयटर्स और उद्योग सूत्रों से प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, सरकार आयात शुल्क में किसी बड़ी या अनियंत्रित कटौती के बजाय केवल 5 प्रतिशत की नपी-तुली कमी पर विचार कर रही है। इसके पीछे एक ठोस आर्थिक और रणनीतिक तर्क मौजूद है। यदि भारत सरकार शुल्क में बहुत अधिक कटौती करती है, तो मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख निर्यातक देश अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे पाम तेल के बेस रेट बढ़ा देते हैं, जिससे घरेलू उपभोक्ताओं को टैक्स कटौती का पूरा लाभ नहीं मिल पाता और सरकारी राजस्व का भारी नुकसान होता है।
इसके अलावा आयात शुल्क को जरूरत से ज्यादा घटाने पर विदेशी पाम और सोया तेल बेहद सस्ते दामों पर भारतीय बंदरगाहों पर उतरने लगेंगे। इसका सीधा और घातक असर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के सोयाबीन व मूंगफली उत्पादक किसानों पर पड़ेगा, जिनकी नई फसल अगले कुछ हफ्तों में मंडियों में आने वाली है। यदि घरेलू मंडियों में तिलहन के दाम सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे गिर गए, तो किसानों में भारी असंतोष फैल सकता है। इसलिए 5 प्रतिशत की कटौती को उपभोक्ता राहत और किसान संरक्षण के बीच एक सटीक संतुलन माना जा रहा है।
विदेशी आयात पर भारी निर्भरता: दो-तिहाई जरूरतें होती हैं बाहर से पूरी
भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा वनस्पति तेल आयातक देश है। देश अपनी कुल वार्षिक खाद्य तेल खपत का लगभग 60 से 66 प्रतिशत (लगभग दो-तिहाई) हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आयात करके पूरा करता है। भारत की खाद्य तेल थाली काफी हद तक तीन प्रमुख तेलों पर निर्भर है: पाम तेल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल।
भारत कच्चे और रिफाइंड पाम तेल के लिए मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया पर निर्भर करता है। वहीं सोयाबीन तेल की अधिकांश खेप अर्जेंटीना और ब्राजील से मंगाई जाती है, जबकि सूरजमुखी तेल की आपूर्ति मुख्य रूप से रूस, यूक्रेन और कुछ हद तक अर्जेंटीना से होती है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा तेल विपणन वर्ष के शुरुआती 10 महीनों में भारत का खाद्य तेल आयात पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 5 प्रतिशत अधिक दर्ज हुआ है, जो घरेलू मांग के लगातार बढ़ने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
वैश्विक भू-राजनीति, अल-नीनो और अंतरराष्ट्रीय कीमतों का सीधा असर
घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की महंगाई केवल भारत के आंतरिक व्यापार का परिणाम नहीं है, बल्कि यह वैश्विक घटनाओं से सीधे जुड़ी हुई है। काला सागर क्षेत्र में रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण सूरजमुखी तेल की शिपिंग और लॉजिस्टिक्स लागत में लगातार अनिश्चितता बनी रही है। वहीं दक्षिण अमेरिका में चरम मौसमी परिस्थितियों और अल-नीनो प्रभाव के चलते सोयाबीन की फसल पर पड़े असर ने अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी एक्सचेंजों पर कीमतों को चढ़ाए रखा है।
इसके अतिरिक्त, इंडोनेशिया और मलेशिया में बायोडीजल निर्माण के लिए पाम तेल के अनिवार्य उपयोग (B35/B40 मैंडेट) के चलते वैश्विक निर्यात बाजार में पाम तेल की उपलब्धता सीमित हुई है। इस वैश्विक उछाल के चलते भारतीय आयातकों को विदेशों से तेल खरीदने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। यही कारण है कि केंद्र सरकार को घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर रखने के लिए टैरिफ और ड्यूटी समायोजन को एक रक्षात्मक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना पड़ रहा है।
क्या आम उपभोक्ताओं को तुरंत मिलेगा सस्ते तेल का फायदा?
नीतिगत स्तर पर आयात शुल्क में कटौती की घोषणा होते ही बंदरगाहों पर आयातित तेल सस्ता होना शुरू हो जाएगा, किंतु खुदरा बाजार में इसका प्रत्यक्ष असर दिखाई देने में आमतौर पर 10 से 15 दिनों का समय लगता है। रिफाइनिंग कंपनियों, थोक व्यापारियों और खुदरा दुकानों के पास पहले से मौजूद पुराने स्टॉक पर तत्कालीन उच्च शुल्क चुकाया गया होता है।
जैसे ही नए आयातित स्टॉक की रिफाइनिंग और पैकेजिंग होकर खुदरा दुकानों तक आपूर्ति पहुंचेगी, तेल कंपनियों को एमआरपी में कमी करनी होगी। खाद्य मंत्रालय पहले भी प्रमुख खाद्य तेल विनिर्माताओं और उद्योग संगठनों को वैश्विक कीमतों में गिरावट का लाभ तुरंत अंतिम उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के सख्त निर्देश देता रहा है। त्योहारी सीजन को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि अक्टूबर के पहले पखवाड़े तक सरसों, सोयाबीन और पामोलिन तेल के एक लीटर पाउच की कीमतों में 5 से 8 रुपये तक की नरमी देखने को मिल सकती है।
राष्ट्रीय तिलहन मिशन और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की अनिवार्यता
खाद्य तेलों की महंगाई पर काबू पाने के लिए आयात शुल्क में कटौती एक तात्कालिक और अस्थायी राहत मात्र है। भारत सरकार इस बात को भलीभांति समझती है कि जब तक देश तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं बनता, तब तक भारतीय रसोई वैश्विक कमोडिटी बाजारों के झटकों के प्रति संवेदनशील बनी रहेगी।
इसी के दृष्टिगत केंद्र सरकार ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल-ऑयल पाम मिशन’ (NMEO-OP) और तिलहन संवर्धन योजनाओं पर तेजी से काम कर रही है। इसके तहत पूर्वोत्तर राज्यों और अंडमान-निकोबार में पाम की खेती का रकबा बढ़ाने, किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले संकर बीज उपलब्ध कराने, आधुनिक ड्रिप सिंचाई सुविधाएं देने और तिलहन पर सुनिश्चित खरीद तंत्र विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य आयात पर भारत की 66 प्रतिशत की मौजूदा निर्भरता को अगले पांच से सात वर्षों में घटाकर 30 से 40 प्रतिशत के स्तर पर लाना है।
Edible Oil Import Duty Cut: निष्कर्ष
त्योहारी सीजन से ठीक पहले खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में 5 प्रतिशत तक की संभावित कटौती उपभोक्ताओं की जेब को राहत देने की दिशा में एक बेहद जरूरी और स्वागत योग्य कदम साबित हो सकता है। इस सीमित कटौती के माध्यम से सरकार ने एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की है: एक तरफ उत्सवों के दौरान मिठाई और खाद्य उद्योग पर महंगाई का बोझ कम होगा, वहीं दूसरी तरफ न्यूनतम समर्थन मूल्य के समीप खड़ी घरेलू सोयाबीन और तिलहन फसलों को भी विदेशी डंपिंग के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकेगा। अब सबकी निगाहें वित्त मंत्रालय की अंतिम अधिसूचना पर टिकी हैं कि यह कटौती किस तारीख से और किन विशिष्ट श्रेणियों (कच्चे अथवा रिफाइंड तेल) पर लागू की जाती है।
Read more here
Skin Care Tips: कड़वा खीरा भी है काम का, फेंकने की बजाय बना लें ये 5 स्किन केयर चीजें
Besan Laddoo Recipe: घर पर देसी घी से बनाएं खस्ता और सोंधे बेसन के लड्डू, जानें आसान तरीका
Ola Uber Rapido: राइड से पहले नहीं दे सकेंगे ₹10-₹50 की टिप, सरकार का बड़ा फैसला