Dry Eye Syndrome: आंखों में जलन और भारीपन कहीं ‘ड्राई आई सिंड्रोम’ तो नहीं? जानें लक्षण और बचाव के सटीक उपाय

Dry Eye Syndrome: लक्षण, कारण और बचाव के उपाय

0

Dry Eye Syndrome: अगर आप ऑफिस में घंटों कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बिताते हैं या मोबाइल पर सोशल मीडिया स्क्रॉल करना आपकी आदत बन चुका है, तो आपकी आंखों में होने वाली हल्की सी खुजली या जलन को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। हाल ही में सामने आए स्वास्थ्य आंकड़ों और मेडिकल रिपोर्ट्स की मानें तो देश के महानगरों में हर तीसरा व्यक्ति ‘ड्राई आई सिंड्रोम’ की चपेट में है। यह समस्या अब केवल उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवाओं और बच्चों में भी तेजी से फैल रही है। आंखों का भारीपन और बार-बार पलकें झपकाने की मजबूरी इस बात का संकेत है कि आपकी आंखों की प्राकृतिक नमी खत्म हो रही है, जो भविष्य में आपकी दृष्टि को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

आंखों के डॉक्टरों के पास इन दिनों ऐसे मरीजों की भीड़ बढ़ गई है जो काम के दौरान धुंधलापन या रोशनी के प्रति संवेदनशीलता की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। दरअसल, डिजिटल युग में हमारी बदलती जीवनशैली और एयर कंडीशनर के अत्यधिक उपयोग ने इस समस्या को घर-घर तक पहुंचा दिया है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों के आई क्लीनिकों में पिछले कुछ महीनों में ड्राई आई के मरीजों की संख्या में भारी उछाल देखा गया है। ओपीडी में आने वाले मरीजों में अक्सर यह देखा जा रहा है कि वे अपनी परेशानी को सामान्य थकान समझकर टाल देते हैं, जबकि असल में उनकी आंखों की आंसू बनाने वाली ग्रंथियां जवाब देने लगती हैं।

Dry Eye Syndrome: क्या है ड्राई आई सिंड्रोम और क्यों खत्म होती है आंखों की नमी

मेडिकल साइंस की भाषा में समझें तो ड्राई आई सिंड्रोम तब होता है जब हमारी आंखों की सतह को नम रखने वाली आंसू की परत यानी ‘टीयर फिल्म’ अपना संतुलन खो देती है। यह परत तीन चीजों से मिलकर बनी होती है तेल, पानी और श्लेष्मा। जब इन तीनों में से किसी भी एक तत्व की कमी होती है, तो आंसू जल्दी सूखने लगते हैं। आंसू केवल रोने के काम नहीं आते, बल्कि वे आंखों को बाहरी धूल और संक्रमण से बचाते हैं। जब यह सुरक्षा चक्र टूटता है, तो कॉर्निया पर सीधा दबाव पड़ता है।

इस समस्या के पीछे सबसे बड़ा हाथ हमारे स्क्रीन टाइम का है। जब हम किसी स्क्रीन को एकटक देखते हैं, तो हमारी पलक झपकाने की दर काफी कम हो जाती है। सामान्य तौर पर एक व्यक्ति मिनट में करीब 15 से 20 बार पलक झपकाता है, लेकिन स्क्रीन देखते समय यह संख्या गिरकर 5 से 7 रह जाती है। इसका सीधा नतीजा यह होता है कि आंखों की सतह हवा के संपर्क में ज्यादा देर तक रहती है और नमी गायब हो जाती है। प्रदूषण और जहरीली हवा भी इस आग में घी डालने का काम करती है।

बदलती लाइफस्टाइल और वातावरण ने बढ़ाया जोखिम

Dry Eye Syndrome
Dry Eye Syndrome

आजकल के आधुनिक दफ्तरों और घरों का वातावरण ड्राई आई के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। बंद कमरों में चलने वाले एयर कंडीशनर हवा से नमी सोख लेते हैं, जिससे आंखों पर बुरा असर पड़ता है। इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में बढ़ता वायु प्रदूषण आंखों में जलन और सूजन पैदा करता है। डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ वातावरण ही नहीं, बल्कि कुछ स्वास्थ्य स्थितियां भी इसे ट्रिगर करती हैं। उदाहरण के तौर पर, डायबिटीज और थायराइड के मरीजों में आंखों का सूखापन अधिक पाया जाता है।

एक बड़ा वर्ग उन लोगों का भी है जो लंबे समय तक कॉन्टैक्ट लेंस पहनते हैं। कॉन्टैक्ट लेंस आंसुओं की ऑक्सीजन आपूर्ति को बाधित कर सकते हैं। वहीं, सिगरेट की लत भी आंखों की सेहत के लिए घातक साबित हो रही है। धूम्रपान न केवल फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि इसके धुएं से आंखों की टीयर फिल्म अस्थिर हो जाती है। मेडिकल विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जो लोग प्रतिदिन 8 घंटे से ज्यादा डिजिटल स्क्रीन का उपयोग करते हैं, उन्हें अपनी आंखों की नियमित जांच कराते रहनी चाहिए।

महिलाओं और बुजुर्गों पर इस समस्या का सबसे अधिक असर

आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ड्राई आई का खतरा अधिक होता है। खासकर 40 से 50 वर्ष की आयु के बीच, जब महिलाएं मेनोपॉज या पेरीमेनोपॉज के दौर से गुजरती हैं, तो उनके शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव आंसुओं के उत्पादन को प्रभावित करते हैं। शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का गिरता स्तर सीधे तौर पर आंखों की नमी को कम कर देता है।

वहीं, उम्र बढ़ने के साथ आंसू बनाने वाली ग्रंथियां कमजोर होने लगती हैं। 40 की उम्र पार करने के बाद शरीर की रिकवरी दर धीमी हो जाती है। बुजुर्गों में यह समस्या इसलिए भी गंभीर हो जाती है क्योंकि वे अक्सर ब्लड प्रेशर या मेंटल हेल्थ से जुड़ी दवाएं ले रहे होते हैं, जिनके साइड इफेक्ट्स के रूप में आंखों का सूखापन सामने आता है। वृद्धाश्रमों और वरिष्ठ नागरिक केंद्रों में किए गए हेल्थ चेकअप कैंप्स में यह पाया गया कि अधिकांश बुजुर्ग इसे मोतियाबिंद का शुरुआती लक्षण समझ लेते हैं, जबकि यह ड्राई आई की समस्या होती है।

Dry Eye Syndrome: बचाव के लिए अपनाएं 20-20-20 का जादुई नियम

अगर आप इस गंभीर समस्या से बचना चाहते हैं, तो आपको अपनी आदतों में कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे। नेत्र रोग विशेषज्ञ ’20-20-20′ के नियम को सबसे कारगर मानते हैं। इसका मतलब है कि हर 20 मिनट के स्क्रीन वर्क के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और करीब 20 फीट दूर रखी किसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करें। यह छोटी सी कवायद आंखों की मांसपेशियों को आराम देती है और पलक झपकाने की प्राकृतिक प्रक्रिया को बहाल करती है।

इसके अलावा, शरीर को हाइड्रेटेड रखना बहुत जरूरी है। दिनभर में पर्याप्त पानी पीने से आंखों में नमी बनी रहती है। अगर आप एयर कंडीशनर में बैठते हैं, तो ध्यान रखें कि उसकी हवा सीधे आपकी आंखों पर न लगे। लैपटॉप या कंप्यूटर स्क्रीन को अपनी आंखों के स्तर से थोड़ा नीचे रखें, ताकि आंखें पूरी तरह न खुलें और नमी कम वाष्पित हो। लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का उपयोग भी तुरंत राहत दे सकता है, लेकिन बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी आई ड्रॉप का इस्तेमाल करना खतरनाक हो सकता है।

Dry Eye Syndrome: कब हो जाना चाहिए सावधान और डॉक्टर से मिलना जरूरी

कई बार लोग घर में रखे गुलाब जल या किसी पुराने आई ड्रॉप से इलाज शुरू कर देते हैं, जो संक्रमण को बढ़ा सकता है। अगर आपको लगातार नजर में धुंधलापन महसूस हो रहा हो, तेज रोशनी में आंखें खोलने में दिक्कत आ रही हो या सुबह उठते समय आंखों में भारीपन लग रहा हो, तो यह डॉक्टर से मिलने का समय है। समय पर इलाज न मिलने पर कॉर्निया पर घाव (अल्सर) हो सकते हैं, जिससे दृष्टि हमेशा के लिए धुंधली हो सकती है।

डॉक्टर अक्सर ऐसी स्थिति में ‘वार्म कंप्रेस’ यानी हल्की गर्म सिकाई की सलाह देते हैं, जिससे रुकी हुई तेल ग्रंथियां खुल जाती हैं और आंसुओं की गुणवत्ता बेहतर होती है। आधुनिक चिकित्सा में अब इसके लिए ‘प्लग्स’ और लेजर ट्रीटमेंट जैसे विकल्प भी मौजूद हैं, जो गंभीर मरीजों के लिए जीवनदायी साबित हो रहे हैं। याद रखें, आंखें शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा हैं और डिजिटल दुनिया के इस दौर में इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

Read More Here:- 

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.