Dry Eye Syndrome: आंखों में जलन, खुजली और चुभन को न करें नजरअंदाज
लंबे समय तक मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल, एसी की हवा, बढ़ती उम्र, दवाओं के साइड इफेक्ट और पोषण की कमी से ड्राई आई सिंड्रोम का खतरा बढ़ सकता है।
Dry Eye Syndrome: डिजिटल युग में कंप्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन हमारी दैनिक जीवनशैली के अनिवार्य अंग बन चुके हैं। दफ्तर के लंबे कामकाजी घंटों से लेकर घर पर मनोरंजन तक, आंखों का स्क्रीन के सामने अत्यधिक समय बिताना अब एक सामान्य बात हो गई है। किंतु स्क्रीन से निकलने वाली कृत्रिम रोशनी और अप्राकृतिक कार्यशैली का सबसे भारी मूल्य हमारी दृष्टि और आंखों की सेहत को चुकाना पड़ रहा है। आज के समय में अधिकांश लोग आंखों में लगातार जलन, खुजली, चुभन, भारीपन और बार-बार अवांछित पानी आने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। अक्सर लोग इसे सामान्य थकान या नींद की कमी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, किंतु चिकित्सकीय दृष्टि से यह ‘ड्राई आई सिंड्रोम’ (Dry Eye Syndrome) यानी आंखों की सतह पर नमी की गंभीर कमी का स्पष्ट लक्षण हो सकता है।
Dry Eye Syndrome: क्या है ड्राई आई सिंड्रोम और यह कैसे उत्पन्न होता है?
सामान्य परिस्थितियों में हमारी आंखों की पुतलियों के ऊपर आंसुओं की एक अत्यंत सूक्ष्म, चिकनी और सुरक्षात्मक त्रि-स्तरीय परत (टियर फिल्म) मौजूद होती है। इस टियर फिल्म में पानी, वसायुक्त तेल (लिपिड्स) और म्यूकस का सटीक रासायनिक संतुलन होता है। यह परत न केवल आंखों को चिकनाई और नमी प्रदान करती है, बल्कि बाहरी धूल, बैक्टीरिया और संक्रमण से कॉर्निया की रक्षा भी करती है।
जब किसी कारणवश लेक्रिमल और मीबोमियन ग्रंथियों से आंसुओं का निर्माण धीमा हो जाता है, या फिर आंसुओं में तेल की कमी के कारण वे हवा के संपर्क में आकर बहुत तेजी से वाष्पीकृत होने लगते हैं, तब आंखें रूखी और खुरदुरी हो जाती हैं। इसी स्थिति को ड्राई आई सिंड्रोम कहा जाता है। इस अवस्था में आंखों में लालिमा, रेत जैसा चुभने का अहसास और दृष्टि में धुंधलापन होने लगता है। कई बार सूखेपन की प्रतिक्रिया में आंखें तेजी से अतिरिक्त पानी छोड़ती हैं, जिससे मरीज को भ्रम होता है कि उसकी आंखें नम हैं, जबकि वास्तविकता में वह आंसू की कमजोर गुणवत्ता के कारण उपजा सूखापन ही होता है।
1. अत्यधिक स्क्रीन टाइम और पलकों के कम झपकने का दुष्प्रभाव
आधुनिक जीवनशैली में ड्राई आई का सबसे प्रमुख और सार्वभौमिक कारण डिजिटल स्क्रीन का अनियंत्रित उपयोग है। सामान्य अवस्था में एक स्वस्थ व्यक्ति एक मिनट में लगभग पंद्रह से बीस बार अपनी पलकें झपकाता है। जब पलकें झपकती हैं, तो आंसू पूरी आंख की सतह पर समान रूप से फैल जाते हैं।
किंतु जब कोई व्यक्ति मोबाइल, टैबलेट या कंप्यूटर पर ध्यान केंद्रित करके काम करता है, पढ़ता है या गेम खेलता है, तो पलक झपकने की दर स्वतः ही घटकर प्रति मिनट महज पांच से सात बार रह जाती है। लंबे समय तक पलकें खुली रहने से आंखों की प्राकृतिक नमी तीव्र गति से सूखने लगती है। यही कारण है कि लगातार कई घंटे स्क्रीन के सामने बैठने के बाद आंखों में तनाव, लाल डोरे और तीव्र जलन का अनुभव होने लगता है।
2. एयर कंडीशनर, ब्लोअर और वायु प्रदूषण का प्रतिकूल वातावरण
व्यक्ति के आसपास का भौतिक पर्यावरण भी आंखों की नमी को बनाए रखने में सीधी भूमिका निभाता है। कार्यालयों और घरों में दिन-रात चलने वाले एयर कंडीशनर हवा से प्राकृतिक नमी को पूरी तरह सोख लेते हैं, जिससे कमरे का वातावरण शुष्क हो जाता है। जब एसी या तेज पंखे की सीधी ठंडी हवा सीधे चेहरे और आंखों से टकराती है, तो टियर फिल्म का वाष्पीकरण कई गुना तेज हो जाता है।
इसके साथ ही सड़कों पर मौजूद वाहनों का धुआं, धूल-कण, औद्योगिक प्रदूषण और जहरीली स्मॉग आंखों की नाजुक झिल्ली में सूक्ष्म सूजन पैदा कर देते हैं। यह पर्यावरणीय दबाव आंखों की तेल बनाने वाली ग्रंथियों के छिद्रों को बंद कर देता है, जिससे आंखों का सूखापन और अधिक गंभीर रूप धारण कर लेता है।
3. बढ़ती उम्र और महिलाओं में हार्मोनल बदलाव
उम्र का बढ़ना भी आंसुओं के उत्पादन में कमी आने का एक प्रमुख प्राकृतिक जैविक कारक है। जैसे-जैसे उम्र पचास वर्ष के पार पहुंचती है, शरीर के अधिकांश अंगों की तरह अश्रु ग्रंथियों की कार्यप्रणाली भी शिथिल पड़ने लगती है। यही वजह है कि वरिष्ठ नागरिकों में ड्राई आई की शिकायत अपेक्षाकृत काफी अधिक देखी जाती है।
इसके अतिरिक्त महिलाओं में यह समस्या पुरुषों की तुलना में अधिक तीव्रता से सामने आती है। गर्भावस्था, स्तनपान, ओरल गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन और विशेष रूप से रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन्स के स्तर में बड़े उतार-चढ़ाव आते हैं। ये हार्मोनल असंतुलन सीधे तौर पर अश्रु ग्रंथियों को प्रभावित करते हैं, जिससे आंखों में रूखापन बढ़ जाता है।
4. रक्तचाप, अवसाद और एलर्जी की दवाओं के दुष्प्रभाव
अनेक ऐसी सामान्य और नियमित रूप से खाई जाने वाली एलोपैथिक दवाएं हैं, जिनका एक अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) आंखों के सूखेपन के रूप में सामने आता है। मौसमी एलर्जी और सर्दी-जुकाम के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीहिस्टामाइन दवाएं, बंद नाक खोलने वाले डिकॉन्गेस्टेंट, उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने वाली बीटा-ब्लॉकर्स और मूत्रवर्धक (डाइयूरेटिक्स) दवाएं शरीर से तरल पदार्थों को कम करती हैं।
इसी प्रकार अवसाद और अनिद्रा के उपचार में प्रयुक्त एंटीडिप्रेसेंट्स तथा त्वचा के मुहांसों के लिए ली जाने वाली रेटिनोइड्स आधारित औषधियां भी आंसुओं के स्राव को धीमा कर देती हैं। यदि किसी विशेष दवा के नियमित सेवन के बाद आंखों में असामान्य सूखापन या गड़न महसूस होने लगे, तो अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करना चाहिए।
5. पोषण की कमी और अंतर्निहित ऑटोइम्यून बीमारियां
शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी भी आंखों की संरचना को कमजोर करती है। आहार में विटामिन ए और ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी से आंसुओं की गुणवत्ता खराब हो जाती है। विटामिन ए आंखों की कॉर्निया की कोशिकाओं को स्वस्थ रखने के लिए अपरिहार्य है, जबकि ओमेगा-3 फैटी एसिड ग्रंथियों में सूजन को रोकता है।
इसके अतिरिक्त कई गंभीर दीर्घकालिक बीमारियां भी ड्राई आई का कारण बनती हैं। अनियंत्रित डायबिटीज, थायरॉइड विकार और विशेष रूप से रूमेटाइड अर्थराइटिस व स्जोग्रेन सिंड्रोम (Sjögren’s Syndrome) जैसी ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली अपनी ही स्वस्थ ग्रंथियों पर हमला कर देती है। स्जोग्रेन सिंड्रोम के रोगियों में आंखों के साथ-साथ मुंह और गले में भी गंभीर सूखापन देखा जाता है।
Dry Eye Syndrome: ड्राई आई सिंड्रोम से बचाव के व्यावहारिक उपाय और चिकित्सकीय परामर्श
इस गंभीर विकार से सुरक्षित रहने के लिए दैनिक दिनचर्या में कुछ सरल और प्रभावी आदतों को शामिल करना चाहिए। डिजिटल स्क्रीन पर काम करते समय विश्व प्रसिद्ध ’20-20-20 नियम’ का पालन करें; यानी प्रत्येक 20 मिनट के स्क्रीन वर्क के बाद 20 सेकंड के लिए अपनी नजरें स्क्रीन से हटाकर कम से कम 20 फीट की दूरी पर रखी किसी वस्तु पर टिकाएं और सामान्य रूप से पलकें झपकाएं। एसी या हीटर की सीधी हवा के संपर्क में बैठने से बचें और जरूरत पड़ने पर कमरे में ह्यूमिडिफायर का प्रयोग करें।
घर से बाहर निकलते समय धूप और धूल से बचाव के लिए सुरक्षात्मक चश्मों का उपयोग करें तथा दिनभर में भरपूर मात्रा में पानी पीकर शरीर को हाइड्रेटेड रखें। यदि आंखों में लगातार लाली, असहनीय चुभन या रोशनी के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता बनी रहे, तो मेडिकल स्टोर से स्वयं कोई भी स्टेरॉयड या केमिकल युक्त ड्रॉप डालने के बजाय तुरंत किसी योग्य नेत्र विशेषज्ञ (ऑप्थल्मोलॉजिस्ट) से जांच कराएं। चिकित्सक की संस्तुति पर प्रिजर्वेटिव-फ्री लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स और ऑइंटमेंट्स का सही उपयोग ही कॉर्निया को स्थायी क्षति से सुरक्षित रख सकता है।
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