Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी पर क्यों की जाती है गन्ने और मूली की पूजा? जानें शुभ मुहूर्त और धार्मिक मान्यता

अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना के लिए रखा जाता है।

0

Ahoi Ashtami 2026: सनातन हिंदू धर्म में संतानों के दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुरक्षा और समृद्धि की मंगलकामना के लिए रखे जाने वाले व्रतों में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि यानी ‘अहोई अष्टमी’ का व्रत सर्वोपरि माना गया है। यह पावन पर्व करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद और दीपावली से ठीक आठ दिन पूर्व मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा और उन्नति के लिए निर्जला उपवास रखती हैं तथा संध्याकाल में आकाश में तारों के उदित होने पर उन्हें करवे अथवा लोटे से अर्घ्य देकर व्रत का पारण करती हैं। वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी का यह व्रत 1 नवंबर, रविवार को पूरे देश में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। इस व्रत की पूजन परंपरा में अहोई माता के चित्र, सई (साही) के अंकन, रोली, अक्षत और दूध-भात के साथ-साथ गन्ने और कच्ची मूली का पूजन करना अत्यंत अनिवार्य और फलदायी माना गया है।

Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी पर गन्ने की पूजा और स्थापना का आध्यात्मिक महत्व

अहोई अष्टमी के पूजन विधान में साबुत गन्ने (ईख) को पूजा चौकी के समीप स्थापित करने अथवा माता को अर्पित करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। भारतीय कृषि संस्कृति और वैदिक परंपरा में गन्ना मिठास, अखंड वंश वृद्धि, लचीलेपन और दीर्घकालिक समृद्धि का प्रत्यक्ष प्रतीक माना गया है। जिस प्रकार गन्ना कठोर धूप और बदलते मौसम को सहन करते हुए भी भीतर से रसदार और मधुर बना रहता है, उसी प्रकार माताएं अहोई माता से प्रार्थना करती हैं कि उनकी संतान का स्वभाव मधुर रहे और वह जीवन की हर कठिन परिस्थिति में धैर्यपूर्वक आगे बढ़े।

इसके अतिरिक्त, गन्ने में अनेक गांठें और पोरियां होती हैं, जो वंश के निरंतर विस्तार और परिवार की जड़ों के मजबूत होने का संकेत देती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता को गन्ना भेंट करने से कुल में खुशहाली आती है और संतान को जीवन में कभी भी अभाव का सामना नहीं करना पड़ता।

पूजन में मूली चढ़ाने की परंपरा और अच्छे स्वास्थ्य की कामना

गन्ने के साथ-साथ अहोई अष्टमी की थाली में हरी पत्तियों वाली ताजी मूली रखना भी शास्त्रसम्मत और लोक परंपरा का अभिन्न अंग है। आयुर्वेद और धार्मिक दृष्टिकोण से भूमि के भीतर उगने वाली कंद-मूल सब्जियां शुद्धता, सात्विकता और शारीरिक निरोगता का प्रतिनिधित्व करती हैं। कार्तिक मास के आगमन के साथ ही शरद ऋतु की शुरुआत होती है और इस मौसम में पहली ताजी उपज के रूप में मूली खेतों से आती है।

प्राचीन काल से यह परंपरा रही है कि मौसम की किसी भी नई फसल या सब्जी का उपभोग करने से पहले उसे देवताओं और कुलदेवी को अर्पित किया जाता है। अहोई माता के चरणों में पत्तों सहित कच्ची मूली अर्पित करने के पीछे यह गहरी भावना निहित है कि संतान को मौसमी व्याधियों से मुक्ति मिले, उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता सुदृढ़ रहे और वह दीर्घायु प्राप्त करे। लोक विश्वास है कि यह अर्पण संतान के शारीरिक बल और मानसिक तेज को सुरक्षित रखता है।

अहोई माता को अर्पित किए जाने वाले सात्विक भोग और सात प्रकार के अनाज

पूजन सामग्री में गन्ने और मूली के अतिरिक्त कई पारंपरिक सात्विक व्यंजनों का भोग लगाने का शास्त्रीय विधान है। इस दिन विशेष रूप से शुद्ध घी में बने हलवा-पूरी, आटे और गुड़ से तैयार मीठे पुए, गुलगुले तथा दूध की खीर का नैवेद्य लगाया जाता है। इसके साथ ही सिंघाड़े, सीताफल और ऋतु फलों को भी पूजा की थाली में शामिल किया जाता है।

अनेक परिवारों में इस दिन सात प्रकार के अनाजों (सप्तधान्य) का अर्घ्य और दान करने की विशेष प्रथा है, जिसमें गेहूं, चावल, जौ, चना, मूंग, मसूर और काले अथवा सफेद तिल शामिल होते हैं। यह सप्तधान्य अन्नपूर्णा की कृपा और घर में कभी भी अन्न-धन की कमी न होने का प्रतीक माने जाते हैं। सायंकालीन पूजा संपन्न होने के बाद यह समस्त भोग और फल संतान को प्रसाद स्वरूप खिलाए जाते हैं और परिवार के अन्य सदस्यों में बांटे जाते हैं।

अहोई अष्टमी 2026: पूजन का सटीक शुभ मुहूर्त और तारों के दर्शन का समय

ज्योतिषीय पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर हो रहा है, जो अगले दिन 2 नवंबर 2026 को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक प्रभावी रहेगी। चूंकि अहोई अष्टमी की पूजा प्रदोष काल और गोधूलि वेला में की जाती है तथा तारों को देखकर व्रत खोला जाता है, इसलिए शास्त्रीय नियमों के अनुसार यह व्रत 1 नवंबर 2026, रविवार को ही रखा जाएगा।

इस दिन अहोई माता की विधिवत पूजा-अर्चना करने का सबसे शुभ और फलदायी मुहूर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालुओं को पूजा के लिए कुल 1 घंटा 18 मिनट की समयावधि प्राप्त होगी। शाम को तारों के उदय और दर्शन का अनुमानित समय लगभग 6 बजकर 05 मिनट रहेगा, जिसके पश्चात माताएं तारों को अर्घ्य देकर अपने उपवास का पूर्ण नियम से पारण कर सकती हैं।

Ahoi Ashtami 2026: मातृप्रेम और परिवार की खुशहाली का पावन पर्व

अहोई अष्टमी केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक मां के अपनी संतान के प्रति निस्वार्थ प्रेम, आत्मिक त्याग और अगाध विश्वास की अभिव्यक्ति है। इस दिन माताएं चांदी के अहोई पेंडेंट (स्याहू) की माला धारण करती हैं, जिसमें चांदी के दाने पिरोए जाते हैं। गन्ने की मिठास और मूली की पवित्रता से जुड़ा यह लोकपर्व प्रकृति और मानव जीवन के अटूट रिश्ते को भी दर्शाता है। आस्था और भक्ति के साथ किया गया यह पूजन परिवार के ताने-बाने को मजबूत करता है और संतानों के जीवन में आने वाली हर नकारात्मक बाधा को दूर कर उनके पथ को आलोकित करता है।

Read More Here

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.